सपने

सपने मेरे नहीं आपके सपने, हमारे सपने, समाज में व्याप्त विसंगतियां मन को व्यथित करती हैं. संवेदनाओं की पृष्ठभूमि से जन्मी रचनाएँ मेरीनहीं आपकी आवाज हैं. इन आँखों में एक ख्वाब पलता है, सुकून हो हर दिल में इक दिया आश का जलता है. - शशि.
शशि का अर्थ है -- चन्द्रमा, तो चाँद सी शीतलता प्रदान करने का नाम है जिंदगी .
शब्दों की मिठास व रचना की सुवास ताउम्र अंतर्मन महकातें हैं. मेरे साथ सपनों की हसीन वादियों में आपका स्वागत है.

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Friday, December 21, 2012

ताल का जल


बढ़ रहा शैवाल बन
व्यापार काला
ताल का जल
आँखें मूंदे सो रहा

रक्त रंजित हो गए
सम्बन्ध सारे
फिर लहू जमने लगा है
आत्मा पर
सत्य का सूरज
कहीं गुम गया है

झोपडी में बैठ
जीवन रो रहा

हो गए ध्वंसित यहाँ के
तंतु सारे
जिस्म पर ढाँचा कोई
खिरने लगा है
चाँद लज्जा का
कहीं गुम हो गया

मान भी सम्मान
अपना खो रहा .

-- शशि पुरवार

Monday, December 10, 2012

एक सवाल - विकृत दर्पण समाज का .......... ? बाल शोषण




1 -- लघुकथा ---                        ख्वाब

 रोज छोटू को सामने वाली दूकान पर काम करते हुए देखती थी , रोज ऑफिस में चाय देने आता था , हँसता , बोलता  पर आँखों में कुछ  ख्वाब से तैरते थे .एक दिन मैंने उससे कहा
" छोटू पढने नहीं जाते "
"नहीं दीदी समय नहीं मिलता "
"क्यूँ घर में कौन कौन है  "
"माँ ,बापू बड़ी बहन ,छोटी बहन "
"तो सब क्या करते है "
"सभी काम करते है "
"तुम्हे पढना नहीं अच्छा लगता ?"
वह चुप हो गया ,और नीहिर भाव आँखों में था  ,धीरे से बोला ---
" हाँ बहुत मन करता है पढूं , अच्छे अच्छे कपडे पहनू , स्कूल जाऊ  और मै भी एक दिन ऐसे ही नौकरी कर बड़ा इंसान बनू , पर इतने पैसे नहीं है ,जो मिलता है सब मिलकर उससे खाना ले कर आते है ,".........काश  में भी बड़े घर में जन्म लेता .......
             शब्द खामोश हो गए और नयन सजल ,यह सजा भगवान् ने नहीं दी , इंसानों ने ही तो अमीर गरीब बनाये है ,स्वप्न तो सभी की आँखों में एक जैसे ही आते है .
     

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2 लघुकथा ---
स्कूल की अध्यापिका ने बाल शोषण के खिलाफ बहुत कुछ भाषण में कहा , कि बाल श्रम अपराध है , बाल शोषण नहीं करना चाहिए , सबको इसके खिलाफ मिलकर आवाज उठानी चाहिए  .वगैरह ,....!
उनकी बातो से सभी बहुत प्रभावित हुए , सभी बच्चो  के माता पिता ने भी बहुत प्रसन्नता व्यक्त करी कि हमारे बच्चे कितने अच्छे स्कूल में पढ़ते है .मै  उन अध्यापिका से परिचित थी ,बहुत सौम्य स्वाभाव की थी ,हर कोई प्रभावित हो जाता था उनसे , एक दिन किसी कार्यवश एक परिचित के साथ उनके घर जाने का मौका मिला , वह अविवाहित थी और अकेले रहती थी , जब हम पहुचे कोई 10 वर्ष की लड़की ने दरवाजा खोला , ठीक ठाक  कपड़ो में थी वह लड़की , तो वह कोई सदस्य तो नहीं लग रही थी परिवार की ,हम बैठे तो तो उन महोदया ने आवाज  दी ---
"रानी पानी लेकर आओ  और काम हो गया हो तो घर चली जाओ "
" जी मैडम , हो गया "
हम आश्चर्य से देखते रह गए उन्हें , मुझसे रहा नहीं गया मैंने पूछ ही लिया
"क्या यह आपके यहाँ काम करती है ?"
 "अरे नहीं , वह तो मै इसे पढ़ा देती हूँ , स्कूल की फ़ीस भी भरती  हूँ इसकी , कपडे खाना सभी करती हूँ वक़्त आने पर , अब इतना कुछ करती हूँ , तो थोडा घर का काम करा लेने से क्या फर्क पड़ेगा ,आखिर पैसे देती हूँ . इसके माँ -बाप गरीब है , बर्तन का ही काम करते है , वह तो अच्छा है कि यह मेरे पास है तो इसका भला हो गया ,अब यही रहती है मेरे पास , ख़ुशी से ही करती है यह सब   ,वैसे भी तो काम क्या होता है हम दोनों का ....!

मै चकित थी इस दोहरे व्यक्तिव से , एक तरफ बाल श्रम के लिए उनके विचार एवं दूसरी तरफ ऐसा कार्य , क्या समझे इसे  ....दोहरा व्यक्तिव जो आम है आजकल ?

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3 लघु कथा ---  शोषण
 आज आरती के घर में बहुत चहल पहल थी ,9 साल की आरती और 11 प्रकाश  साल का कजिन दोनों अपने नाना के घर पर थे , आज मेहमान भी घर पर आये  थे  , माँ , नानी ,व परिवार के अन्य सदस्य  रिश्तेदारों में व्यस्त थे , बच्चे उधम मचा रहे थे , एक दूर का रिश्तेदार उम्र 24  होगी वह भी था और बीच बीच  में बच्चो  के साथ भी खेल लेता था . इतनी चहलपहल थी कि  ठहाको की आवाजे ही बाहर आती थी . एक दिन सभी आराम कर रहे थे ,बच्चे छत पर खेल रहे थे , आरती वैसे ही खेल रही थी और प्रकाश पतंग उड़ा रहा था ,अपने दोस्त के साथ . थोड़ी देर में  वह लड़का जिसे मामा कह रहे थे बच्चे  ,छत  पर आया और बच्चो के साथ खेलने लगा , फिर खेलते खेलते आरती से बोला ---
 "चलो हम थोड़ी देर बैठते है और चाकलेट खाते है इनको पतग उड़ाने  दो , "
" नहीं मामा यही पर खेलना है , मुझे नहीं बैठना "
" अब यह तो नहीं खेल रहे है फिर ....." बात काट कर आरती बोली --
" नहीं मुझे कहीं नहीं जाना , मै  यही खेलूंगी "
"ओह हो....... तो खेलना है तुम्हे ,चलो हम कुछ और खेलेंगे "
" सच्ची में ......"
"हाँ , चलो वहां छत  के कोने में ,अब प्रकाश  तुम्हे  पतंग नहीं दे रहा है  तो , हम भी उसे नहीं खिलाएंगे "
" ठीक है मामा ,हम क्या खेलेंगे ?
" आओ मै  बताता हूँ , पर किसी से कुछ नहीं कहना , नहीं तो सब मारेंगे  तुम्हे और मै फिर नहीं खेलूंगा ,
" जैसा मै कहता हूँ वैसा ही करो ....."
         और  छत  पर उस तथाकथित मामा ने  जो खेल खेला वह  आरती समझ ही नहीं सकी ,और दर्द ,डर से पीड़ित हो गयी , और मामा ने कहा --
"   अरे डरो मत सब ठीक हो जायेगा , पर किसी से कुछ कहना नहीं ." धीरे से धमकी .
 आज रिश्तो का खून हो चूका था , कैसे अपनों पर भी विश्वास किया जाये ,आज रिश्ते नाते भी कठघरे में है ,जो अपनी गन्दी  विकृत मानसिकता के चलते  मासूम बचपन के मन व जीवन और रिश्तो  पर काले  घाव  के निशाँ अंकित कर  देते है . 
-----       शशि पुरवार


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4 कथा ------  स्वाहा

रामू चाय की दुकान पर काम करता था  पढने का बहुत शोक था  दिन में काम करता  और रात के समय पढता था , पिता ने उसे काम करने के लिए कहा था ,वह कहते थे की पढने से पैसे नहीं मिलते ,पर झुग्गी छोपडी में एक स्कूल था जो मुफ्त शिक्षा देता था ,तो रामू की लगन से वहां उसे दाखिला मिल गया था ,सिर्फ परीक्षा के समय पैसे भरने होते थे फॉर्म के ,तो रामू के पिता ने उसे कह दिया
" ठीक है देखेंगे.......... "
हर महीने की पगार वह आजकर रामू के सेठ से ले जाते थे .आज कप धोते धोते रामू को याद आया कि कल स्कूल में कहा गया है कि  अगर आज रूपये नहीं भरे तो परीक्षा नहीं दे सकते  . उसने सेठ से कहा
 काका जल्दी से आता हूँ घर से .........वह घर की तरफ भागा ,और अपने पिता से बोला --
" बाबा फ़ीस भरनी है आज ,"
" पैसे नहीं है मेरे पास ............. पता नहीं  सा पहाड़ मिल जायेगा पढ़ कर .."कड़कती आवाज में जबाब आया ,फिर वह सड़क पर निकल गए .

रामू को कुछ समझ नहीं आया ,आँखों में आंसू आ गए , सोचा रात को अम्मा  से कहूँगा ,नहीं तो स्कूल वाले भगा देंगे स्कूल से ,
रात को जब  अम्मा घर आई वह  कुछ कह पाता उससे पहले पिता शराब की बोतल पीते  हुए लडखडाते ,गन्दी गलियां देते हुए घर में घुसे  , आज सन्नाटा सा छा गया झोपड़ी में .........आज खाने में लात घुसे ही मिले , निरीह  आँखे तक रही थी अँधेरे को , एक खामोश चीत्कार थी रामू के मन में .आशाएं , इक्छाएं  धू धू कर जल रही थी . शराब में सब कुछ स्वाहा  हो गया .

------- शशि पुरवार


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बाल शोषण ----- एक नजर


          बाल  शोषण यह एक ऐसी समस्या है जिसका निदान ही नहीं निकल रहा  ,अक्सर  इसके बारे में हम  समाचार पत्रों में पढ़ते रहते है  ,यह  शोषण  समाज में बुरी तरफ मकडजाल  के जैसा फैला  हुआ है , बाल  शोषण सिर्फ काम करवाने  से ही नहीं  होता अपितु शारीरिक , मानसिक शोषण भी जघन्य अपराध है एवं शोषण की  श्रेणी में  ही आता है  , इसे आप दबे रूप में कहीं न कहीं देख ही सकते है , गरीब माँ बाप तो इस महंगाई की मार से परेशान होकर अपने बच्चो को काम पर लगा देते है , निम्न वर्ग  को सरकार जो रूपये देती है वह भी उन बच्चो पर खर्च न होकर जेबों में ही जाता है  . निम्न वर्ग तो सभी बच्चो को भीख मांगने के लिए गलियों ,चौराहे  या मंदिर के बार खड़ा कर देते है ,नहीं तो सर्कस या करतब दिखाकर पैसे का कमाने का कार्य सौंप देते है . एक बार जब मुझे कार्य वश होलसेल बाजार में जाने का काम पड़ा , चौराहे पर चाट का एक  ठेला खड़ा था और थोड़ी दूर पर  5, 6 -8 -10 साल के 6-7 बच्चे बैठे थे ,करीब 22  साल  का  एक लड़का कुछ  दूरी पर बैठ  कर सब पर नजर रखे हुए था .  2 -2 बच्चे आगे एक गन्दी सी छोटी सी चादर पर बारी बारी आकर बैठते , एक बाजा बजाता तो दूसरा करतब दिखाता , जब 5-6 साल के बच्चो ने आँखों से सुई उठाई , बांस पर चले , शरीर को तोड़ मोड़ कर प्रस्तुत किया तो वहां ठेले पर खड़े कुछ लोगो ने  1 -1 रूपए डाल  दिए ,परन्तु किसी ने भी उन्हें यह कार्य करने से नहीं रोका , और धीरे धीरे वह पैसा बड़े लड़के की जेब में जा रहा था .इस अपराध के हिस्सेदार वह लोग भी है जो ऐसे खेल को देख आनंदित होते है ,और बढ़ावा देते है . जो इन बातों का विरोध करते है उन्हें स्वयं समाज का विरोध झेलना पड़ता है .
     , बच्चो का शोषण सिर्फ श्रम से ही नहीं होता अपितु स्कूल में  शिक्षक द्वारा , एवं घर में  परिचित या रिश्तेदार भी उनका शोषण कर लेते है ,जो बात सामान्यतः खुलकर बाहर नहीं आ पाती . बच्चो को चाकलेट या मिठाई के बहाने बुलाकर ,फुसलाकर उनका शोषण कर लिया जकता है और उन्हें जान से मरने की धमकी देकर डराया जाता है .....और  उन्हें इस बहाने लगातार शोषित किया जाता है , चाहे लड़का हो या लड़की सभी इसका शिकार होते है ,कई बार सुनने में आया कि फलां टीचर ने विद्यार्थी के साथ अनुचित व्यवहार किया है , कई शिक्षक  ऐसे होते है जो बालउम्र  को  ध्यान  में न रखकर सजा के रूप में उनकी  इतनी पीटाई करते है  ,जिससे कई बार बच्चो की हालत ख़राब हो जाती है  और उन्हें अस्पताल तक ले जाना पडा . कई बार देखने को मिला जैसा कि आरती के साथ हुआ , उसके घर में उसके दूर के मामा ने उसका शारीरिक शोषण किया और डरा कर चुप करा दिया , वह डर के कारण  कुछ नहीं कह पायी और  यह डर हमेशा ही  मुसीबत में डाल  देता है , बाल्यावस्था में आरती के साथ जो कुछ भी  हुआ ,उसका दुःख और  परेशानी की काली छाया उसके जीवन पर सदा के लिए अंकित हो गयी .इसके विपरीत साहसी  नीलम  की  दाद देनी पड़ेगी  ,वह कोचीन क्लास में पढने जाती थी 10 -11 में थी , वहां  पर प्रश्न कक्षा के बाद पूछे जाते थे ,एक दिन उसके टीचर ने उसके साथ अशोभनीय व्यवहार किया , पहले तो वह कुछ नहीं बोली ,पर यह सिलसिला अक्सर होने लगा तो उसने विरोध किया , जबाब में उस शिक्षक ने  उसे धमकी दी यदि ज्यादा आवाज करोगी तो तुम्हे बदनाम कर दूंगा ,पर नीलम की समझदारी उसे कोई कांड होने से पहले ही बचा कर ले गयी . उसने माता -पिता को यह बात बताई और पुलिस की मदद से बालबाल बच गयी .  तो  हर बच्चे को बचपन से ही यह शिक्षा देनी  चाहिए कि डरो मत अपितु अपनों का सहारा लो . अनजान पर विश्वास मत करो .
                      अपराध तो ख़त्म होते ही नहीं , इसका यह अंजाम किसी ने न सोचा होगा .  कुछ न्रहंस्कारी युवको ने शराब  के नशे में न जाने कितनी मासूम  कन्याओ को अपना शिकार बनाया , यह सबसे ज्यादा खेद जनक  है  कि इतने  जघन्य कार्य में  उन्होंने 3-- 6 महीने की  नवजात शिशु  को भी नहीं बक्क्षा , यह जघन्य कार्य सिर्फ  परिचित या जानकार  विकृत मनोदशा वाले लोग ही करते है ,आज नन्हे शिशु अपने घर में भी सुरक्षित नहीं है , कई लोग पुलिस की गिरफ्त में भी आये और सजा भी मिली , पर अपराध इतने है कि सभी की जानकरी नहीं हो पाती . लोग समाज के डर से यह बात ही छुपा लेते है .खासकर जब कन्या हो , कहीं उसकी शादी में ही अड़चन न हो जाये ...ऐसा विचार अपराधी के नीच कार्य को बढ़ावा दे जाता है . कितना नीचे गिर चूका है इंसान , अक्सर ऐसे केस न्यायालाओ में आती  रहती है , क्या अपराध होता है नवजात बच्चो और बच्चियों का जो यह सजा उन्हें मिलती है , कई बार सुनने में आया कि  छोटे बच्चो का शोषण कुछ शिक्षको ने किया है , जब गुरु ही इतना गलत कार्य करेगा तो क्या शिक्षा मिलेगी ......!  शोषण सिर्फ शारीरिक ही नहीं मानसिक भी होता है , एक स्कूल में एक शिक्षिका ने 1-2 बच्चो को बहुत मारा , नंबर भी काट लेने की बात कही ........क्रोध में बहुत ज्यादा होमेवोर्क दिया , सजा दी . एक बार  एक लड़की इस पीड़ा को न सह सकी और डर के कारण घर पर भी किसी को भी नहीं बता सकी , अंत में आत्महत्या कर ली और नोट छोड़ दिया .............. एक जिंदगी हमेशा के लिए मिट गयी . इस तरह के हालात पैदा ही क्यूँ किये जाते है , नन्हे हाथ ,नन्हे कदम जो दुनिया को ठीक तरह से नहीं देख पाते ,यदि ऐसे वक़्त में उनके साथ कोई हादसा हो जाये तो उनके जीवन पर इसका बुरा प्रभाव देखने को मिलता है , वह भी बदला लेने के लिए भविष्य में वही कार्य कर दोहरा देते है . ऐसी कई  घटनाए हमारे समाज में हो चुकी है . आजकल लोग घर में  काम के लिए छोटे बच्चो को  इसीलिए रखते है ,क्यूंकि वह परेशान नहीं करते और सारा काम  चन्द  पैसे और खाने के लालच में  कर देते है .
   बचपन एक फूल के सामन है जिसे प्यार भरे संरक्षण की जरूरत होती है , जब नीव अच्छी रखी  जाएगी तो पौधा बन कर वह अच्छे फल देगा . आज यह शोषण राष्ट्रिय समस्या का रूप ले चूका है जिससे सभी को साथ में मिलकर समाप्त करना होगा .  चंद पंक्तियाँ  कहना चाहूंगी अपने शब्दों में ---

बेटी हो या बेटा ,
बचपन एक समान
न मसलो नन्ही पौधों को 
अधरों पे दो मुस्कान
वर्ना खिलने से पहले
जीवन  मुरझा जायेगा
सीचों इन्हें प्यार से तो
बनेगा सुन्दर गुलिस्तां .

--शशि पुरवार

Wednesday, December 5, 2012

एक भूल और .............................!



1 लघुकथा ----

अनिरुद्ध अपनी पत्नी और दो बच्चो के साथ  हंसी ख़ुशी जीवन  कर रहा था , वह सॉफ्टवेर   मेनेजर था , और अक्सर काम के सिलसिले में बाहर जाता था . इस बार जब वह वापिस आया तो पत्नी नेहा  की तबियत ठीक नहीं दिखी रही थी ,बुखार था व  थोड़ी कमजोरी  दिख रही थी . अनिरुद्ध चिंतित हो गया और उसने  नेहा से पूछा --

"नेहा क्या हुआ , डाक्टर को दिखाया ...?"
" कुछ नहीं , ठीक हूँ , बुखार के कारण  कमजोरी आ गयी है , आजकल वायरल भी तो फैला है "
" हाँ यह तो है  , परन्तु अपना ध्यान रखो ....... "
परन्तु बुखार कभी कम होता तो कभी बढ़ जाता . इधर  आजकल कुछ दिनों से बेटे की तबियत भी बिगड़ने लगी थी , चेहरे और शरीर पर दाने निकलने लगे और बुखार भी बार बार आ रहा था , उधर  निशा का स्वास्थ धीरे -धीरे बिगड़ता जा रहा था , और वह दिन पर दिन कमजोर होती जा रही थी , एक दिन तो वह काम करते करते  गिर गयी ,अनिरुद्ध दोनों को  अस्पताल   लेकर गया तो वहां नेहा एवं बेटे  को एडमिट कर लिया गया ,  सभी प्रकार की जांच शुरू हो गयी .  शाम को डाक्टर ने अनिरुद्ध से कहा कि --

" आप धीरज रखें , और अपनी पत्नी को भी हिम्मत दें , और एक बार आप अपनी और बेटी  के  भी खून की भी जाँच करा लें "
" क्यूँ डाक्टर  ......... क्या हुआ है मेरी नेहा को , और हम सभी भी .........?"
" मै एतिहात के तौर पर सभी की एच . आई , वी टेस्ट करवा रहा हूँ , आपकी पत्नी और बेटे की रिपोर्ट  पॉजिटिव रिपोर्ट आई है और आखिरी स्टेज पर पहुच चुकी है "
" यह सुनते ही अनिरुद्ध जड़  हो गया , उसके मन मस्तिष्क ने जैसे काम करना ही बंद कर दिया हो ..."

        परिवार के सभी सदस्य की जांच हुई तो पता चला कि सभी इस बीमारी से ग्रसित  है , वह ग्लानी से भर गया , उसके रंगीन मिजाज स्वाभाव और असंयम के कारण  आज पूरा परिवार काल के द्वार पर खड़ा था और सभी की निगाहे उससे खामोश  सवाल कर रही थी ...जिससे वह नजर भी नहीं उठा पा रहा था .
-----शशि पुरवार .

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2 लघुकथा ---

सुलोचना स्वयं को बुद्धिमान समझती थी और हमेशा पैसे बचाने  के चक्कर में रहती थी , एक बार उसकी तबीयत  जरा नासाज थी , तो पास में ही डाक्टर को दिखाने  चली गयी .वहां डाक्टर ने उसे दवा  और इंजेक्शन  लेने के लिख कर दिया  , वह कम्पाउंडर  के पास गयी तो देखा वहां बहुत से लोग लाइन में बैठे है और वह सभी को एक एक करके  सुई लगा रहा था , हर सुई को वह वहां के रखें बर्तन में जिसमे गर्म पानी था उसमे  डाल देता और दूसरी को निकालकर उससे इंजेक्शन लगाता .सुलोचना ने सोचा गर्म पानी में तो सभी कीटाणु  मर जाते है तो नयी डिस्पोजेबल सुई में क्यूँ फालतू में पैसे खर्च करना ,
जब  सुलोचना की बारी आई तो कम्पाउंडर ने कहा --
" आपका परचा .........?"
" हाँ यह लीजिये .....आप लगा दीजिये , यह इंजेक्शन है "
" ठीक है ......"
फिर  वह  गर्वित भाव से घर आ गयी ....
".कुछ नहीं होता है , आजकल मेडिकल वालों ने भी सामान बेचने के लिए धंधा बना लिया है ......क्या पहले नहीं लगती थी सभी यह सुई ....... सोचते सोचते घर आ गया "

बिमारी तो ठीक हो गयी , परन्तु जो हुआ उसकी कल्पना किसी को नहीं थी . 2-3 महीने बाद जब सुलोचना थकी थकी सी रहने लगी तो घर वालो को चिंता हुई , उसे डाक्टर के पास ले गए , सारी  जांच हुई तो पता चला की एच . आई .वी . के कीटाणु खून में पाए गए , यह जानकर सभी सदमे में आ गए की यह कैसे हो गया . सुलोचना विचलित हो गयी . डाक्टर ने कहा --
" आप चिंता मत करो शुरुआत है , आपका इलाज हो सकता है "
" पर डाक्टर यह कैसे हो गया ....हम कितनी सावधानी बरतते है , ....."
" यह संक्रमण का रोग है ,  यह किसी से भी हो सकती है ,  इस बीमारी से पीड़ित व्यक्ति  के संपर्क में आने पर , या संक्रमित व्यक्ति का खून यदि दिये जाने पर या संक्रमित व्यक्ति को लगाईं  हुई सुई का उपयोग करने पर भी यह बीमारी  हो जाती है ....अनेक ऐसी सावधानियां हमें बरतनी चाहिए ...    आप ध्यान कीजिये ऐसा कुछ आपके साथ घटित हुआ है क्या ........? "

डाक्टर की बातें सुनकर सुलोचना शांत हो गयी और स्वयं की गलती का अहसास उसे हो गया , थोड़ी सी बचत करने के चक्कर में उसने अपनी ही जान का खतरा मोल ले लिए , शर्म आ गयी स्वयं के शिक्षित होने पर ...........  बुरा वक़्त कभी भी  कह कर नहीं आता , स्वयं सावधानी लेना आवश्यक है .

-----शशि पुरवार 

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