सपने

सपने मेरे नहीं आपके सपने, हमारे सपने, समाज में व्याप्त विसंगतियां मन को व्यथित करती हैं. संवेदनाओं की पृष्ठभूमि से जन्मी रचनाएँ मेरीनहीं आपकी आवाज हैं. इन आँखों में एक ख्वाब पलता है, सुकून हो हर दिल में इक दिया आश का जलता है. - शशि.
शशि का अर्थ है -- चन्द्रमा, तो चाँद सी शीतलता प्रदान करने का नाम है जिंदगी .
शब्दों की मिठास व रचना की सुवास ताउम्र अंतर्मन महकातें हैं. मेरे साथ सपनों की हसीन वादियों में आपका स्वागत है.

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Tuesday, February 19, 2013

एक चुभन ...........सत्य घटना



      

चुभन - एक सत्य कथा
       मनोज  और  डिंपल  दोनों उच्चशिक्षित थे.  दोनों के मन में  समाज के लिए कुछ करने का जज्बा था. मनोज विधि सेवा अधिकारी थे.  धनी व्यक्तिव के स्वामी, थोड़े अंतर्मुखी, शांत और काम के लिए समर्पित  जीवन . अक्सर  गाँव गाँव जाकर लोगों  को उनके अधिकारों के लिए  जागरूक करते थे. अक्सर अनाथालय व अस्पताल भी  जाया करते थे. इसी  सिलसिले में एक बार रविवार को  वृद्धाआश्रम ये  और वहां 4 घंटे व्यतीत किये. शाम को घर पर आकर शांत बैठे थे और थोड़े व्यथित लग रहे थे . डिम्पल ने मनोज को  चाय दी और वहीँ  पास में  ही बैठ गयी . वार्तालाप  शुरू करने के उदेश्य से बोली --
" क्या हुआ .. , कैसा रहा प्रोग्राम , बहुत थके भी लग रहे ....? "
" हाँ अच्छा रहा , पर देखो ज़माना कितना ख़राब हो गया है "
" हाँ ... वह तो है  ...... पर क्या हुआ आश्रम में सब ठीक था न  ..? " एक डर था डिंपल की आवाज में .
" हाँ ,  आज जिस आश्रम में गया था,वह गाँव के बाहर है.  दूर दूर तक कोई बस्ती नहीं हैं ,सुनसान सी जगह थी . जब आश्रम गया तो वहां अजीब सी शांति थी, जैसे उस शांति के पीछे कोई तूफ़ान छुपा हो. उनको उनके अधिकारों को जानकारी देने के बाद उनसे बातचीत के लिए रुका, फिर सभी को खाने पीने का सामान  दिया  तो सभी  बुजुर्ग खुश हो गए  और बोले --- कितने महीनों बाद कोई आया है, जो हमारे बीच बैठ कर हमसे बात कर रहा है, वर्ना यहाँ तो अपने भी नहीं आते हैं और हम भी बाहर नहीं जाते हैं,  हमारी जिंदगी कैद सी हो गयी है. सभी ने अपने अपने दुःख मेरे साथ बाँटें, मुझे चाय बनाकर पिलायी "
बोलते बोलते कुछ क्षणों के लिए रुक गए, आँखों में वेदना साफ़ नजर आ रही थी
 पुनः बोले ----
        " पता है डिंपल एक दो लोग ऐसे है जो इसी शहर के है. जिनका  काफी बड़ा बंगला है, लम्बा चौड़ा कारोबार फैला हुआ है, पर आज घर वालो को बड़े बुजुर्ग  बोझ लग रहे है, एक दम्पति तो ऐसे हैं, जिनका सिर्फ एक ही पुत्र है, बहुत तम्मना से उसकी  शादी की, आशाएँ बाँधी, परन्तु  एक दिन  बेटे ने सारी सम्पति अपने नाम  करवा ली और उन्हें आश्रम भेज दिया।  बहु उनके साथ नहीं रहना चाहती थी, 2 वर्ष हो गए है कभी कोई  मिलने भी नहीं आया . वह दोनों बहुत दुखी थे कि उन्होंने अपने पुत्र के लिए इतना कुछ किया, हर सुख सुविधा का पूरा ध्यान रखा फिर भी वह आज  उन्हें इस हाल में छोड़ गया है. ......... उनकी पीड़ा आँखों से झर झर बहाने लगी, वह तड़प ह्रदय  में  चुभ सी रही है, देखा नहीं जा रहा था ...... " चुभन  मनोज की आँखो में साफ़ नजर आ रही थी.
" ओह, कोई अपने माता पिता के साथ ऐसा कैसे कर सकता है  ......, उसकी आत्मा उसे  धिक्कारती  नहीं है ...."  डिंपल की आवाज में रोष भरा हुआ था .
" क्या करें आजकल परिवार बनते ही कहाँ है, कैसी लड़की बहु बनकर आएगी कोई नहीं जानता , आजकल की लड़कियों को सिर्फ पति से ही मतलब होता है, परिवार उनके लिए गौण रहता है . एक लड़की ही घर बना सकती है और वही घर को बिगाड़ भी सकती है "
"हाँ वह तो है , पर वह बेटा  कैसा,  जिसे सही गलत कुछ नहीं दीखता ...."
" अब क्या कर सकते है  ........आजकल  शादी के बाद लड़के भी साथ कहाँ रहते है ."
" हाँ वह तो है "
" आज मुझे ऐसा लग रहा है जो होता है अच्छे के लिए होता है . ऊपर वाले ने हमें बेटी का अनमोल तोहरा  देकर   भविष्य में मिलने वाली बेटे - बहु की इस मौन पीड़ा को सहने से बचा लिया है . हम हमारी बेटी को ही अच्छे संस्कार देंगे . उसे अच्छी शिक्षा और एक दिशा प्रदान करेंगे . हमें बेटा  नहीं चाहिए ".........कहकर मनोज ने एक दीर्घ सांस ली .
" हाँ, आपकी बात से  सहमत हूँ ......." डिंपल ने कहा और फिर कमरे में गहन सन्नाटा  छा गया. कर्ण  सिर्फ साँसों के चलने की दीर्घ आवाज  सुन रहे थे .
------शशि पुरवार

29 comments:

  1. चुभन.. कथाकार द्वारा वरिष्ठ आयु के व्यक्तियों की पारिवारिक उपेक्षा परिवेश जनित संक्षिप्त प्रयास है..कथाशिल्प से कहीं अधिक महत्व कथ्य का है। इस दृष्टि से शशि पुरवार जी का प्रयास सराहनीय है।

    शुभकामना

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    1. abhaar srikant ji , yah ek satye ghatna hai jise roobaroo vaise ki kiya hai .bas baat ko saamne laana mera maksad tha

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  2. ख्याल बहुत सुन्दर है और निभाया भी है आपने उस हेतु बधाई, सादर वन्दे,,,,,,

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    1. abhaar madan ji ,yah ek satye ghatna hai jise aap sab tak pahuchaaya hai

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  3. बेटों से ज्यादा बेटियाँ माँ-बाप का ख्याल रखती है ,,,
    बहुत सुंदर सराहनीय अभिव्यक्ति


    Recent Post दिन हौले-हौले ढलता है,

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  4. सुन्दर कहानी, सबको यह सोचना चाहिये कि एक दिन वे भी वृद्ध होंगे।

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  5. सार्थक कथा...
    बेटियाँ अच्छी होती हैं....
    मगर किसी की बहु भी होती हैं.....उसमें दोनों रूप में सेवाभाव और स्नेह हो तब बात बने...

    सस्नेह
    अनु

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    1. anu ji bilkul sahi kaha aapne , beti bhi bahu banati hai , use yadi sanskaar aur sahi disha mile to wah dono parivaaro ki beti ban apna dayitwa acche se nibha sakti hai .

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  6. sundar aur vicharniy prastuti,budhapa to aayega hi, sabko yah nahi bhoolna chahiye ki agar ham upeksha karenge to hamari bhi upeksha ki jaygi

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    1. bilkul sahi kaha aapne par aaj yah soch rakhne walo ki sankhya me kami aayi hai

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  7. बहुत ही सार्थक ओर सामयिक भी ...
    आज जितना साथ बेटियां देती हैं उतना बेटे नहीं दे पाते ...

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  8. शशि जी उत्तम कथा शिल्प और अच्छी समसामयिक कथावस्तु के लिए साधुवाद ,समस्या बेटे बेटियाँ नहीं स्वार्थपरक सोंच है ,बेटी ही बहू बनती है घर में विवाद का कारण भी ,हम बेटे बेटियों को शिक्षित तो करना चाहते है पर संस्कारित नहीं करना चाहते ,सामाजिक और पारिवारिक जीवन में शिक्षा और संस्कार का समन्वय आवश्यक है ,बहुत बहुत साधुवाद

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    1. lokesh ji shikshit karna aur ek disha pradaan karan usme sanskaar bhi shamil hote hai , yadi wahi sahi disha me mile to beti dono parivaaro ki neev majboot kar sakti hai .

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  9. sahi hai hame bete beti dono ko sanskaar dene honge .ek achchhe samaj ke liye sirf achchhi beti hi nahi achchhi bahu bhi use banana hoga.

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    1. ji sahi kaha aapne kavita ji beti to bahu banegi hi , parantu yadi sanskaar acche ho to wah sasuraal me bhi beti ban sakti hai . bete beti dono hi samaan hai , par kya kar koi apni beti ko wah shiksha de sakta hai ,ki saas ko maa maan sake , to sabhi ka jeevan sarthak ho jaye

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    2. जी बिलकुल सही कहा आपने कविता जी , यह कदम सभी को उठाना होगा , बेटी और बेटे दोनों को सही संस्कार देने होंगे

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  10. बहुत ही सार्थक प्रस्तुति,आभार.

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  11. सार्थक संदेश देती हुई लघुकथा...शशि जी आपकी कलम यूं ही चलती रहे। शाभ कामनाएँ....

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  12. wastvikta samjhte-samajhte badi der ho jaati hai ...par hamen auron se sikh lekar apne bacchon men wo sanskar dalne honge.........

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  13. अच्छी रचना के लिए बधाई। आप सर्वदा सृजनरत रहें एवं मेरे पोस्ट पर आपकी सादर उपस्थिति बनी रहे। धन्यवाद ।

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  14. shrijan ke aayam ko sarthak karti sundar prastuti,NEW POSTS- FURSHAT HO TO NAZAR

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  15. आज का कटु सत्य दिखाती बहुत मर्मस्पर्शी लघु कथा...

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  16. यह वर्तमान के वैश्वीकरण युग की यह सत्य अंतरपीड़ा है....बच्चों को सही संस्कार देने की आवश्यकता है फिर बेटा-बेटी-दामाद-बहू सब रूप अच्छे बन जाएँगे....
    इस विचारपूर्ण तथ्य के प्रस्तुतीकरण के लिए धन्यवाद एवं बधाई!
    सादर/सप्रेम,
    सारिका मुकेश

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  17. बहुत सार्थक प्रस्तुति आपकी अगली पोस्ट का भी हमें इंतजार रहेगा महाशिवरात्रि की हार्दिक शुभकामनाये

    आज की मेरी नई रचना आपके विचारो के इंतजार में
    अर्ज सुनिये

    कृपया आप मेरे ब्लाग कभी अनुसरण करे

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  18. शशि जी
    मार्मिक किन्तु सटीक सामयिक अभिव्यक्ति हेतु बधाई. संस्कारों का मिटाते जाना समाज को पतन के गर्त में पंहुचा रहा है वाकई चिंताजनक है.
    sanjiv 'salil'
    divyanarmada.blogspot.in

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  19. मार्मिक कहानी शशि जी।

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नमस्कार मित्रों, आपके शब्द हमारे लिए अनमोल है यहाँ तक आ ही गएँ हैं तो अपनी अनमोल प्रतिक्रिया व्यक्त करके हमें अनुग्रहित करें. स्नेहिल धन्यवाद ---शशि पुरवार



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sapne-shashi.blogspot.com