सपने

सपने मेरे नहीं आपके सपने, हमारे सपने, समाज में व्याप्त विसंगतियां मन को व्यथित करती हैं. संवेदनाओं की पृष्ठभूमि से जन्मी रचनाएँ मेरीनहीं आपकी आवाज हैं. इन आँखों में एक ख्वाब पलता है, सुकून हो हर दिल में इक दिया आश का जलता है. - शशि.
शशि का अर्थ है -- चन्द्रमा, तो चाँद सी शीतलता प्रदान करने का नाम है जिंदगी .
शब्दों की मिठास व रचना की सुवास ताउम्र अंतर्मन महकातें हैं. मेरे साथ सपनों की हसीन वादियों में आपका स्वागत है.

follow on facebook

FOLLOWERS

Sunday, February 16, 2014

राग रंग का रोला .... !

सपन सलोने,
नैनो में

जिया, भ्रमर सा डोला है
छटा गुलाबी, गालो को
होले -हौले  सहलाये
सुर्ख मेंहदी हाथो की
प्रियतम की याद दिलाये

बिना  कहे,
हाल जिया का
दो अँखियो ने, खोला है

हँसी ठिठोली, मंगल-गीत
गूँज  रहे है घर, अँगना
हल्दी,उबटन,तेल हिना
खनके हांथो का कंगना

खिला शगुन के
चंदन  से
चंचल मुखड़ा भोला है

छेड़े सखियाँ, थिरक रही
फिर, पैरों की पैंजनियां
बालो में गजरा महके
माथे झूमर ओढ़नियाँ

खुसुर फुसुर की
बतियों ने
कानो में रस घोला है

सखी- सहेली छूट  रही
कल पिय के घर है जाना
फिर ,रंग भरे सपनो  को
स्नेह उमंगो से सजाना

मधुर,
तरानो से बिखरा
राग रंग का रोला है।
-- शशि पुरवार
३० /१ / २०१४

चित्र -  गूगल से आभार 

Wednesday, February 12, 2014

गजल -- फूल बागो में खिले। ....




फूल बागों में खिले ये सबके मन भाते भी हैं।
मंदिरों के नाम तोड़े रोज ये जाते भी हैं।

चाहे  माला में गुंथे या केश की शोभा बने
टूट कर फिर डाल से ये फूल मुरझाते भी हैं।

इन का हर रूप-रंग  और  सुरभि भी पहचान है
डालियों पर खिल के ये भौरों को ललचाते भी हैं।

फूल चंपा के खिलें या फिर चमेली के खिले 
गुल ये सारे बाग़ के मधुबन को महकाते भी हैं।

भोर उपवन की सदा तितली से ही गुलजार है
फूलों का मकरंद पीने भौरे  मँडराते भी हैं।

पेड़ पौधों से सदा हरियाली जीवन में रहे 
फूल पत्ते पेड़ का सौन्दर्य दरसाते भी  हैं।
---- शशि पुरवार

Wednesday, February 5, 2014

बासंती रंग



1
सपने पाखी
इन्द्रधनुषी रंग
होरी के संग
2
रंग अबीर
फिजा में लहराते
प्रेम के रंग
3
सपने हँसे
उड़ चले गगन
बासंती रंग
4
दहके टेसू
बौराई अमराई
फागुन डोले
5
अनुरक्त मन
गीत फागुनी गाये
रंगों की धुन .

23.03.13
शशि पुरवार
---------------------------------
सदोका ----
1हवा  उडाती
अमराई की जुल्फे
टेसू हुए आवारा
हिय का पंछी 
उड़ने को बेताब
रंगों का समां प्यारा .

2
  डोले मनवा
 ये  पागल जियरा
 गीत गाये बसंती
 हर डाली  पे
खिल गए पलाश
भीगी ऋतू सुगंधी .

3
 झूमे बगिया
दहके है  पलाश
भौरों को ललचाये
कोयल कूके
कुंज गलियन में
पाहुन क्यूँ न आये .

4
झूम रहे है
हर गुलशन में
नए नवेले फूल
हँस रही है
डोलती पुरवाई
रंगों की उड़े धूल .

5
 लचकी डाल
यह कैसा  कमाल
मधुऋतू है आई
 सुर्ख पलाश
मदमाए फागुन
कैरी खूब मुस्काई .

6
जोश औ जश्न
मन  में  है उमंग 
गीत होरी  के गाओ
भूलो मलाल
उमंगो का त्यौहार
झूमो जश्न मनाओ .
24.03.13
शशि पुरवार

linkwith

sapne-shashi.blogspot.com