सपने

सपने मेरे नहीं आपके सपने, हमारे सपने, समाज में व्याप्त विसंगतियां मन को व्यथित करती हैं. संवेदनाओं की पृष्ठभूमि से जन्मी रचनाएँ मेरीनहीं आपकी आवाज हैं. इन आँखों में एक ख्वाब पलता है, सुकून हो हर दिल में इक दिया आश का जलता है. - शशि.
शशि का अर्थ है -- चन्द्रमा, तो चाँद सी शीतलता प्रदान करने का नाम है जिंदगी .
शब्दों की मिठास व रचना की सुवास ताउम्र अंतर्मन महकातें हैं. मेरे साथ सपनों की हसीन वादियों में आपका स्वागत है.

follow on facebook

FOLLOWERS

Wednesday, April 9, 2014

गजल -- मेरी साँसों में तुम बसी हो क्या।



मेरी साँसों  में तुम बसी हो क्या
पूजता हूँ जिसे वही  हो क्या

थक गया, ढूंढता रहा तुमको
नम हुई आँख की नमी हो क्या

धूप सी तुम खिली रही मन में
इश्क में मोम सी जली हो क्या

राज दिल का,कहो, जरा खुलकर
मौन संवाद की धनी हो क्या

आज खामोश हो गयी कितनी
मुझसे मिलकर  भी अनमनी हो क्या

लोग कहते है बंदगी मेरी 
प्रेम ,पूजा,अदायगी  हो क्या

दर्द बहने लगा नदी बनकर
पार सागर बनी खड़ी हो क्या

जिंदगी, जादुई इबारत हो
राग शब्दो भरी गनी हो क्या

गंध बनकर सजा हुआ माथे
पाक चन्दन में भी ढली हो क्या
-------- शशि पुरवार

Saturday, April 5, 2014

अंतर्मन की विडम्बना ....






आशा की किरण

अंतर्मन के बंद घर में
रहती है
जिजीविषा
कुछ ना कर पाने की कसक
घुटन भरी साँसे
कसमसाते विचार और
झंझोड़ते हुए जज्वात

झरोखे की झिरी से आती हुई
रौशनी की एक किरण
तोडती है अंतस की पीड़ा
बेड़ियों के बंधन
और तड़प फूट पड़ती है
लावा बनकर

पीड़ा की बंजर धरती पर
खारे पानी की एक सूखती नदी है
वहाँ हर बार वह रोप देती है
आशा के कुछ बिरबे
जिनसे जीवन पायेगा शीतल ताजगी

फिर इस घर में होंगी
झूमती खुशियों की बगिया
नए शब्दों की महकती आवाजें
दीवारों पर नए विचारो की चमक
कलुषित विकारो के किरायेदार छोड़ जायेंगे शहर
रहेगी मन की शांति हर पहर.
२५ /मार्च २०१४

linkwith

sapne-shashi.blogspot.com