सपने

सपने मेरे नहीं आपके सपने, हमारे सपने, समाज में व्याप्त विसंगतियां मन को व्यथित करती हैं. संवेदनाओं की पृष्ठभूमि से जन्मी रचनाएँ मेरीनहीं आपकी आवाज हैं. इन आँखों में एक ख्वाब पलता है, सुकून हो हर दिल में इक दिया आश का जलता है. - शशि.
शशि का अर्थ है -- चन्द्रमा, तो चाँद सी शीतलता प्रदान करने का नाम है जिंदगी .
शब्दों की मिठास व रचना की सुवास ताउम्र अंतर्मन महकातें हैं. मेरे साथ सपनों की हसीन वादियों में आपका स्वागत है.

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Monday, August 25, 2014

आदमी की आज है दरकार क्या



जंग दौलत की छिड़ी है रार क्या
आदमी की आज है दरकार क्या १

जालसाजी के घनेरे मेघ है
हो गया जीवन सभी बेकार क्या२

लुट रही है राह में हर नार क्यों
झुक रहा है शर्म से संसार क्या ३

छल रहे है दोस्ती की आड़ में
अब भरोसे का नहीं किरदार क्या ४

गुम हुआ साया भी अपना छोड़कर
हो रहा जीना भी अब दुश्वार क्या ५

धुंध आँखों से छटी जब प्रेम की
घात अपनों का दिखा गद्दार क्या६

इन निगाहों में खलिस थी पल रही
आइना भी खोलता है सार क्या  ७

खिड़कियाँ तो बंद हिय की खोलिए
माफ़ अपनों को करो ,तकरार क्या८

धड़कने क्यों हो रही है अजनबी 
रंग जीवन के सभी उपहार  क्या ९

बाँट लो खुशियाँ  सभी जीवन है कम
ख्वाब अँखियों के करे साकार क्या १०

"शशि " कहे तुम रंज अपने भूलकर
बढ़ चलो राहों में अपनी ,वार क्या ११
----------- शशि पुरवार

Wednesday, August 20, 2014

विषैला हमराही

ताँका --

स्वार्थ में अंधे
नोच रहे बोटियाँ
धूर्त सियार
मुख से टपकती
छलिया निशानियाँ

स्वार्थ का चश्मा
सूट बूट पहने
आया है प्राणी
चाटुकार ललना
नित नयी कहानी।
भगवा वस्त्र
हाथों में कमंडल
शीश पे शिखा
अंधी श्रद्धा से लूटे
बिखरी काली निशा।

सेदोका -

१ 
धवल वस्त्र
पहन इठलाये
मन के कारे जीव
मुख में पान
खिसियानी हंसी
अनृत कहे जीभ।  
भोले चहरे
कातिलाना अंदाज
शब्द  गुड की डली
मौकापरस्त
डसते  है जीवन
इनसे दूरी भली।
३ 
साँचा   है साथी 
हर पल का साथ
कोई बूझ न सका
दिल के राज
विषैला हमराही 
आस्तीन का है साँप।
 -- शशि पुरवार

नमस्कार मित्रो कुछ व्यक्तिगत कारणों से नियमित पोस्ट नहीं कर सकी थी परन्तु अब से नियमित प्रति सोमवार सपने पर प्रकाशन होगा , आप अपना स्नेह और अमूल्य टिप्पणी से हमें कृतार्ध करें।  आप सबकी शिकायत भी अब हम दूर कर देंगे , आपसे मिलेंगे आपके ब्लॉग पर -- शुभ मंगलम - शशि पुरवार

Friday, August 15, 2014

उठो ऐ देश वासियों। . जय हिन्द जय भारत





उठो ऐ,देश वासियों
चमन नया बसाना है
दिलों में मातृभूमि की
अलख नयी जगाना है
 
सीमा पर चल रही है
नफरत की आधियाँ, यह
कतरा कतरा खून से
लिख रही कहानियाँ,
साँस साँस सख्त है
ये आया कैसा वक़्त है
अब जर्रा जर्रा द्वेष की
बँट रही है ,निशानियाँ

आओ साथ मिलकर
अब द्वेष को मिटाना है
दिलों में मातृभूमि की
अलख नयी  जगाना  है।
उठो ऐ देशवासियों ………… !

यहाँ, ईमान बिक रहा है
स्वार्थ का व्यापार है
चले, जिन भी  राहों पर
पतित, अभ्याचार  है
कदम कदम पर धोखा है 
दहशत  को, किसने रोका है
चप्पा चप्पा  मातृभूमि के 
 पुनः - पुनः  प्रहार है

आओ, स्वार्थ के घरों में
नयी सुरंग बनाना है
दिलों में मातृभूमि की
अलख नयी जगाना  है।
उठो ऐ देशवासियों ………………।

अब मुल्क की आन का
बड़ा अहम सवाल है
फिजूल की बतियों  पे 
फिर मचता, बबाल है  .
बदला बदला वक़्त है
ये तरुण अनासक्त है
देशभक्ति की  तरंगो  से
फिर करना,  इकबाल  है

नए राष्ट्र के गगन पर
नयी पतंग उड़ाना है
दिलों में मातृभूमी की
अलख नयी जगाना है
उठो ऐ देशवासियों ………!

-- शशि पुरवार
आप सभी ब्लोगर परिवार  स्वतंत्रा दिवस की  शुभकामनाएँ -- जय हिन्द जय भारत

Wednesday, August 13, 2014

माहिया -- देशभक्ति

1
आजादी की बातें
दिल में जोश भरे
बीती काली रातें .
भाई पर वार करे
घर का  ही भेदी
छलिया संहार करे .
है अलग अलग भाषा
मान तिरंगे का
जन जन की अभिलाषा .
पीर हुई गहरी सी
सैनिक घायल है
फिर सरहद ठहरी सी .
क्या नेता है जाने
सरहद की पीरा
सैनिक ही पहचाने .
वैरी की सौगातें
आँखों  में कटती  
हर सैनिक की   रातें .
भूलों बिसरी बातें
नव किरणें  लायी
शुभमंगल सौगाते

साँचे ही करम करो
देश हमारा है
उजियारे रंग भरो।
फैली शीतल किरनें
मौसम भी बदले
फिर छंद लगे झरने.
१०
स्वर सारे गुंजित हो
गूंजे जन -गण -मन
भारत सुख रंजित हो.
११
नव रंग सजाने है
खुशियों के बादल
घर आज बुलाने है
१२ 
चैन अमन से खेले
बागों   की कलियाँ
खुशियों के हो मेले .
१३
जब शयनरत ज़माना
अपनों की  खातिर
सैनिक फर्ज निभाना।


 ---- शशि पुरवार

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sapne-shashi.blogspot.com