सपने

सपने मेरे नहीं आपके सपने, हमारे सपने, समाज में व्याप्त विसंगतियां मन को व्यथित करती हैं. संवेदनाओं की पृष्ठभूमि से जन्मी रचनाएँ मेरीनहीं आपकी आवाज हैं. इन आँखों में एक ख्वाब पलता है, सुकून हो हर दिल में इक दिया आश का जलता है. - शशि.
शशि का अर्थ है -- चन्द्रमा, तो चाँद सी शीतलता प्रदान करने का नाम है जिंदगी .
शब्दों की मिठास व रचना की सुवास ताउम्र अंतर्मन महकातें हैं. मेरे साथ सपनों की हसीन वादियों में आपका स्वागत है.

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Saturday, April 29, 2017

सोशल साइट्स की गर्मी

       
गर्मी परवान चढ़ रही है, मई भी मजबूर लग रही है.जिसे देखो वह अपने किरदार में खोया हुआ पसीना बहा रहा है. कोई  धूप में पसीने से नहा रहा हैं।  कोई  पंखे की गर्म हवा में स्वयं को सुखाने का प्रयास कर रहा है। सूरज आग उगल रहा है , गर्मी में ठंडक देने वाले उपकरण को बनाने वाले, उस आग में बिना जले अपने हाथ सेंक रहे हैं. लोग बेफिक्र होकर  तन - मन को ठंडा करने का प्रयास कर रहें हैं।  सोशल साइट्स भी बहुत कुछ ठंडी पड़ने लगी है।

           हमारे शर्मा जी अपनी दिमागी कसरत करके इतने थक गए कि सुबह से लस्सी पीकर बदहजमी करने में लगे हुए हैं।  जी हाँ सोशल साइट के दीवानों में शर्मा जी नाम शुमार है.  इसका नशा जितनी तेजी से चढ़ा अब उतना ही फिसलने लगा है. हर चीज की अति भी बुरी है. फिर भी  सुधरते नहीं। सुबह से फेसबुकिया गलियों में घूम- घूम कर थक गए सिर्फ मायूसी  हाथ लगी. इधर उधर की तांक - झाँक में कुछ पुराने गुजरे हुए  पलों की तस्वीरें थीं या ऐसे चुटकुले जिन्हे पढ़कर हंसी ने रेंगना भी पसंद नहीं किया।  आखिर दिमागी घोड़े कितने दौड़ेंगे।  बेचारे वह भी  थकने लगे, दिमाग भी काम करके पसीना बहाता है. उदासीनता घर बनाने लगी. सोशल साइट की दीवानगी बढ़ाने  के लिए  और थकान मिटाने के लिए फ्रिज की ठंडी खाद्य सामग्री जीभ की लालसा को पूर्ण करने में लगी हुई थी। जीभ की क्षुधा का तो पता नहीं लेकिन तन का आकार जरूर खुशनुमा होता जा रहा था।
            आज कुछ पोस्ट नहीं किया, इस  दुःख के कारण शर्मा जी बैचेन आत्मा की तरह भटक रहे थे। अपडेट  रखना भी मज़बूरी है। कुछ न मिला तो आज पुराने खजाने में कुछ पुरानी तस्वीर निकाल कर चिपका दी। मानना होगा बला की सुंदरता खुद को खुश रख रही थी कि पंखे की हवा पर बिजली ने अपनी लगाम कस दी।  काटो तो खून नहीं वैसे भी आजकल प्रेम की हवा बंद है।  
पत्नी की नजरों से कुछ नहीं छुपा - " क्यों जी सुबह से क्या रायता फैला रखा है।  गर्मी है तो ठंडाई पीकर आराम करो, काहे खून जला रहे हो".   

            कुछ नहीं --  के साथ चोर नजरें  बगलें झाँकने लगी, अब क्या पत्नी  की बेहाल शक्ल ही देखेंगे ?
            फिर चुपके अपनी एक और तस्वीर चिपका दी, आँखे किसी को ढूंढने लगी। कोई तो होगा जो उस छोटी सी खिड़की पर मिलेगा।  लेकिन सिवाय हार के कुछ नहीं मिला। आभाषी रिश्ते भी अब शरीर के पसीने की तरह बहने लगे। शर्मा जी की उकताहट इतनी बढ़ गयी कि उल फिजूल लिखना शुरू कर दिया।  सत्य है दिमाग फिरते समय नहीं लगता।  आजकल सोशल साइट पर भी नोटबंदी जैसी बुरी मार पड़ी है , लोगों का उबाल मजबूर हो गया है।  बेचारा खून  भी उबलता नहीं।  कंपनी चलाने वालों को शर्मा जी जैसे कोशिश करने वालों की बहुत जरुरत है, नहीं तो कंपनी कैसे चलेगी।  इसी उदासीनता दीवानगी का नतीजा था। कोई अपनी हद तोड़ भी सकता है , इसी कमजोरी के चलते एक लड़के ने अपना लाइव सुसाइड करता हुआ विडिओ उपलोड कर दिया,  इसे पागलपन नहीं तो क्या कहेंगे। 
           इस मनहूसियत को मिटाने के लिए कंपनी वाले नए नए लालच देने के लिए तैयार बैठे हैं. आजकल हर कोई एक  दूसरे को हलाल करने में लगा हुआ है।  सबसे मजेदार बात यह है कि इससे दोनों पक्ष खुश है।  दोनों को लगता है वह एक दूजे को बेबकुफ़ बना रहे हैं। लेकिन बेबकुफ़ कौन ?  यह एक पहेली बन गया है। जिसे आजतक कोई नहीं सुलझा सका. कुर्सी के लोग बदलते रहे लेकिन कुर्सी की महिमा अभी तक नहीं समझे कि कौन किसे बना रहा है। 
 हाल ही में अखबारों में करोड़पति की नयी सूचि आयी जिसमे अम्बानी को भी पीछे छोड़कर कुछ लोग आगे निकल गए.  
   एक बात समझ नहीं आयी सस्ता सामान बेचकर कोई करोड़पति कैसे बना ? कोई एप बनाकर पेड़े खा रहा है. मज़बूरी, इंसान से जो न करवाये कम है , हमारे शर्मा जी बार बार इसका शिकार हो गए  फिर भी शिकार बनने ली प्रवृति समाप्त ही  नहीं होती है. हम मजबूर है मई में मजबूर दिवस मनाये या अपनी मज़बूरी को छुपाये, दिमागी घोड़े मार खाकर भी नहीं दौड़ रहे हैं, सिर से इतना पसीना निकला कि केश नहा लिए।  लेखन कैसे करें, कलम को भी पसीने छूट रहे हैं.  रंग लैस होली खेली, बिना गुदगुदी के चुटकुले पढ़े, तस्वीरों में भाव भंगिमा से कसीदाकारी की, तिस पर मई सोंटे मार रही है. दिल दिमाग सुन्न हो गया, हमारे संपादक फेसबूकि दुनियां घूमने भेज देते  हैं. वक़्त एक सा नहीं होता आजकल सोशल साइट पर दुनियादारी लुभाने लगी है, लोग इससे विराम ले रहे हैं तो हम भी विश्राम कर लेते हैं।  भाई यह उदासीनता हमें भी मार रही है। लिखना हमारी मज़बूरी है  पढ़ना आपकी मज़बूरी। दोनों ही मजबूर।  हमें माफ़ करें शर्मा जी की चहलकदमी हमें बैचेन कर रही हैं।  आप  एक गिलास ठंडा पानी पी ले। आज हम मजबूर हैं आपने हमें झेला उसके लिए आभार।    
शशि पुरवार 

    

             

Friday, April 21, 2017

पॉँव जलते हैं हमारे "




शाख के पत्ते हरे कुछ
हो गए पीले किनारे
नित पिघलती धूप में,ये
पॉँव जलते हैं हमारे ।

मिट रहे इन जंगलों में
ठूँठ जैसी बस्तियाँ हैं
ईंट पत्थर और गारा
भेदती खामोशियाँ है

होंठ पपड़ाये  धरा के
और पंछी बेसहारे
नित पिघलती धूप में,ये
पॉँव जलते हैं हमारे ।


चमचमाती डामरों की
बिछ गयी चादर शहर में
लपलपाती सी हवा भी
मारती  सोंटे  पहर में

पेड़ बौने से घरों में,
धूप के ढूंढें सहारे
नित पिघलती धूप में,ये
पॉँव जलते हैं हमारे ।

गॉँव उजड़े, शहर रचते
महक सौंधी खो गयी है
पंछियों के गीत मधुरम
धार जैसे सो गयी है.

रेत से खिरने लगे है
आज तिनके भी हमारे
नित पिघलती धूप में,ये
 पॉँव जलते है हमारे

    ------ शशि पुरवार

पर्यावरण संरक्षण हेतु चयनित हुआ नवगीत।  पर्यावरण संगठन का आभार। 

Monday, April 17, 2017

फेसबुकी मूर्खता -



दर वर्ष दर  हम मूर्ख दिवस मनाते हैं, वैसे सोचने वाली बात है, आदमी खुद को  ही मूर्ख  बनाकर खुद ही आनंद लेना चाहता है, यह भी परमानंद है। हमारे संपादक साहब  मीडिया इतना पसंद है कि वह हमें इससे भागने का कोई मौका नहीं देना चाहतें हैं। आजकल सोशल मीडिया  हमारी दिन दुनियाँ बन गया है. 
    आदमी मूर्खता  न करे तो क्या करे।  मूर्ख बनना और बनाना हमारा जन्मसिद्ध अधिकार है।  सोशल मीडिया पर इतने  रंग बिखरे पड़ें  है कि मूर्ख सम्मलेन आसानी से हो सकता है, पूरी दुनियाँ आपस जुडी हुई है। लोगों को मूर्ख बनाना जितना सरल है  उतना ही खुद को मूर्ख बनने देना अति सरल है। उम्मीद पर दुनिया कायम है, हम सोचतें है सामने वाला कितना सीधा है हम उसे मूर्ख बना रहे हैं , लेकिन जनाब हमें क्या पता हम उसी का निशाना बने हुए हैं।   कहते हैं न रंग लगे न फिटकरी रंग चौखा चौखा। ....  वैसे मजेदार है, ना जान, ना पहचान फिर भी मैँ तेरा मेहमान।  खुद भी मूर्ख बनो औरों को भी मूर्ख बनाओ। झाँक तांक करने की कला कारी दुनियाँ को दिखाओ। यह कला यहाँ बहुत काम आती है, चाहो या ना चाहो जिंदगी का हर पन्ना आपके सामने मुस्कुराता हुआ खुल जाता है। मजेदार चटपटे किस्से नित दिन चाट बनाकर परोसे जातें है। 
  यहाँ हर चीज बिकाऊ है, इंसान यहाँ खुद का विज्ञापन करके खुद को बेचने में लगा हुआ है।  जितना मोहक विज्ञापन आप रटने बड़े सरताज। असल जिंदगी के कोई देखने ही नहीं आएगा कौन राजा कौन रंक. कुछ शब्द - विचार लिखो और खुद ही मसीहा  बनो,  एक तस्वीर  लगाओ  व  किसी की स्वप्न सुंदरी या स्वप्न राजकुमार बनो.  मुखड़े में कुछ  ऐब हो तो ऐप से दूर करो, कलयुग है सब संभव है।              मित्रों  मूर्खो का खुला साम्राज्य आपका स्वागत करता है। आनंद ही आनंद व्याप्त है,  आजकल  सोशल मीडिया बड़ी खूबसूरती से लोगों का रोजगार फैलाने में बिचोलिया बना हुआ है जो चाहे वह बेचों, दुकान आपकी, सामान आपका, मुनाफा नफा उसका। भाई यहाँ सब बिकता है।  
    मस्त तीखा - मीखा  रायता फैला हुआ है.  खाने का मन नहीं हो तब भी खुशबु आपको बुला ही लेती है.  कौन किसको कितना मूर्ख बनाता है.  प्रतियोगिता बिना परिणाम के चलती रहती है. छुपकर मुस्कान का आनंद कोई अकेले बैठकर लेता है,  एक मजेदार वाक्या हुआ , किसी महिला ने पुरुष मित्र के आत्मीयता से बातचीत क्या कर ली कि वह तो उसे अपनी पूंजी समझने लगा, यानी बात कुछ व उसका अर्थ कुछ और पहुँचा है. दोनों को लगता है दोनों एक - दूजे को चला रहें है वास्तव में दोनों ही मूर्ख बन रहें हैं। 

                    एक किस्सा याद आया, हमारे  शर्मा जी  के यहाँ का  चपरासी बहुत बन ठन कर रहता था, मजाल है कमीज को एक भी  सिलवट भी  आये. सोशल मीडिया में सरकारी ऑफिसर से अपनी प्रोफाइल बना रखी है।  शानदार  रौबदार तस्वीर, इतनी शान कि अच्छे अच्छे शरमा जाएँ।  शर्मा जी दूसरे शहर से अभी अभी तबादला लेकर आये थे। दोनों सोशल मित्र थे, बातचीत भी अच्छी होती थी.  निमंत्रण दिया, मित्र सपिरवार आएं, लेकिन जब खुद के ऑफिस में  एक दूसरे को देखा,  तब जाकर सातों खून माफ़ किये, लो जी कर लो तौबा और खाओ पानी - बताशे( फुलकी ), भाई मिर्ची न हो तो खाने का स्वाद कैसा।उसमे जरा लहसुन मिर्ची और मिलाओ तभी पानी - बताशे खाने में असली आनंद आएगा। जी हाँ यही जीवन का परम सत्यानंद है। पहले ज़माने में लोग सोचा करते थे, कैसे व किसे मूर्ख बनाये, वास्तव में  आज सोचने की जरुरत ही नहीं है।  अब कौन तो कौन कितना मूर्ख बनता है यह मूर्ख बनने वाला ही समझता है।  जब तक जलेबी न खाओ और न खिलाओ जीवन में आनंद रस नहीं फैलने वाला है। वैसे सोचने वाली बात हैं सोशल मीडिया के दुष्परिणाम बहुत हैं लेकिन जीवन को आमरस की महकाने में यही कारगर सिद्ध हुआ है, कहीं किसी घर में किसी महिला -  पुरुष की लाख अनबन हो वह यहाँ एक दूजे के बने हुए है।  घर में रोज झगड़ते होंगे लेकिन सोशल हम तेरे बिन कहीं रह नही  पाते। .... गाते हुए नजर आतें हैं।   कोई कितनी भी साधारण शक्ल - सूरत का क्यों न हो यहाँ मिस / मिसेस / मिस्टर वर्ल्ड का ख़िताब जरूर पाता है।  तो बेहतर है हम नित दिन खुद को भी मूर्ख बनाये और ख़ुशी से खून बढ़ाएं।   खुद पर हँसे,  खुद पर मुस्कुराएँ, तनाव को दूर भगायें, जिंदगी को सोशल बनायें आओ  हम मिलकर मूर्ख दिवस  बनाएं।  

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