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Sunday, January 19, 2014

माहिया - बदली ना बरसी


१
धरती भी तपती है
बदली ना बरसी
वो छिन छिन मरती है .
२
सपनो में रंग भरो
नैना  सजल हुये
जितने भी जतन करो।
२
यह चंदा मेरा है
ज्यूँ सूरज निकला
लाली ने आ घेरा है।
३
माँ जैसी बन जाऊं
छाया हूँ उनकी
कद तक पहुच न पाऊं।
४
सब भूल रहे बतियाँ
समय नहीं मिलता
कैसे बीती रतियाँ
५
फिर डाली ने पहने
रंग भरे नाजुक
ये फूलो के गहने .
६
 डाली डाली  महकी
भौरों की गुंजन
क्यों चिड़िया ना चहकी।
 --------- शशि पुरवार
१/१० / २०१३

6 comments:

  1. धरा का हर कण तरसता, बूँद आती,
    काश बादल की सरसता बरस जाती।

    ReplyDelete
  2. ४
    सब भूल रहे बतियाँ
    समय नहीं मिलता
    कैसे बीती रतियाँ
    ५
    फिर डाली ने पहने
    रंग भरे नाजुक
    ये फूलो के गहने .
    ६
    डाली डाली महकी
    भौरों की गुंजन
    क्यों चिड़िया ना चहकी
    सुन्दर गहन अर्थों से सजी माहिया लिखने में आपका जबाब नहीं |आभार

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