Monday, July 10, 2017

सहज युगबोध


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भीड़ में, गुम हो रही हैं 
भागती परछाइयाँ.
साथ मेरे चल रही  
खामोश सी तनहाइयाँ 

वक़्त की इन तकलियों पर 
धूप सी है जिंदगी 
इक ख़ुशी की चाह में, हर 
रात मावस की बदी. 

रक्तरंजित, मन ह्रदय में
टीस की उबकाइयाँ 
साथ मेरे चल रही  
खामोश सी तनहाइयाँ 

प्यार का हर रंग बदला 
पत दरकने भी लगा 
यह सहज युगबोध है या 
फिर उजाले ने ठगा। 

स्वार्थ की आँधी चली, मन 
पर जमी हैं काइयाँ  
साथ मेरे चल रही  
खामोश सी तनहाइयाँ 

रास्ते अब एक हैं, पर  
फासले भी दरमियाँ 
दर्प की दीवार अंधी  
तोड़ दो खामोशियाँ 

मौन भी रचने लगे फिर 
प्रेम की रुबाइयाँ।
साथ मेरे चल रही  
खामोश सी तनहाइयाँ। 
 शशि पुरवार 

3 comments:

  1. बहुत ही सुंदर, शुभकामनाएं.
    रामराम
    #हिन्दी_ब्लॉगिंग

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  2. आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल बुधवार (12-07-2017) को "विश्व जनसंख्या दिवस..करोगे मुझसे दोस्ती ?" (चर्चा अंक-2664) पर भी होगी।
    --
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
    --
    चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट अक्सर नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
    जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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