Tuesday, August 11, 2020

चाय पीने के अरमान


कुल्लड़ वाली चाय यह मन को है ललचाय
दूध मलाई जब डले स्वाद अमृत बन जाए
कुल्लड़ वाली चाय की, सोंधी सोंधी गंध
और इलाइची साथ में,पीने का आनंद
बांचे पाती प्रेम की, दिल में है तूफान
नेह निमंत्रण चाय का, महक रहे अरमान
कागज कलम दवात हो और साथ में चाय
स्फूर्ति तन मन भरे, भाव खिले मुस्काय
गप्पों का बाजार है मित्र मंडली संग
चाय पकौड़े के बिना, फीके सारे रंग
मौसम सैलानी हुए रोज बदलते गांव
बस्ती बस्ती चाय की, टपरी वाली छांव

सुबह सवेरे लान मे, बाँच रहे अखबार
गर्म चुस्की चाय की,खबरों का दरबार
मित्र,पड़ोसी,नाते सभी, जूही जैसी शाम स्वागत करते चाय से, घर आए मेहमान


अदरक तुलसी लाइची,और पुदीना भाय
बिना दूध की चाय है,गुण, औषध बन जाय
घर घर से उड़ने लगी, सुबह चाय की गंध
उठो सवेरे काम पर,जीने की सौगंध

चाहे महलों की सुबह, या गरीब की शाम
सबके घर हँसकर मिली,चाय नहीं बदनाम
थक कर सुस्ताते पथिक, या बैठे मजदूर
हलक उतारी चाय ही, तंद्रा करती दूर

चाय न देखे जाति धर्म, देख रहा संसार
टपरी होटल हर गली, मिलती सागर पार
एक नशा यह चाय भी,तलब करें हलकान
अलग-अलग स्वाद फिर, फूँकें तन में जान
घी चुपड़ी, रोटी, नमक, और साथ में चाय 
जीरावन छिड़को जरा, स्वाद, अमृत, मन भाय 

कुहरे में लिपटी हुई छनकर आयी भोर
नुक्कड़ पर मचने लगा, गर्म चाय का शोर
शशि पुरवार


Tuesday, August 4, 2020

नया आकाश - धारावाहिक कहानी भाग २



अकेलापन सताने लगा था। प्रणव से दो शब्द सुनने की आशा में उमंगो की कलियाँ मुरझा जाती थी। कभी कुछ पूछो तो जबाब भर ही मिलता था. यहाँ तक कि प्रेम के एकांत पलों मेेें भी जिंदगी रसविहीन थी। शब्द कोष खाली था। मेरे लिए परिस्थितियों को समझना बहुत कठिन होता जा था. आखिर हम कैसे बिना कहे किसी के मन की बात को पूर्णतः कैसे समझ सकतें है। एक वर्ष यूँ ही बीत गया। फिर थोडा बहुत प्रणव को समझी कि उनके लिए दिल की बात शब्दों में ढालना भी कठिन है। पलक अपने भावों को व्यक्त करना जानती थी किन्तु उसे भी सुनने वाला कोई नहीं था। प्रणव से प्रेम अभिव्यकति के दो शब्द या तारीफ सुनने के लिए भी वह तरस गयी. कई बार जतन किये, परंतु जबाब में सिर्फ मुस्कुराहट ही मिली। एक बार तो उसने प्रणव से पूछा -

’’ क्या तुम्हें मुझसे प्यार है या नही है’’. अब तो पलक ने हालात से समझौता कर लिया था. माॅ-पिताजी को कुछ भी कहकर दुखी नही करना चाहती थी. जिंदगी कशमकश में गुजर रही थी. मायके और ससुराल के वातावरण में जमीन आसमान सा अंतर था। मन की गाँठें मन में ही रह गयीं। उसे कभी भी किसी ने खोलने की कोशिश नहीं की. जीवन का प्याला भरा होने के बाद भी खाली था।

जिदंगी बस गुजर रही थी. अब कौन से सुख की चाहत करूँ यहाँ मानसिक सुख भी नहीं था। एक बार माँ को याद कर आँखों में आँसू भर आये तो सासू माँ ने ताना प्रेम से चिपका दिया कि पढ़े लिखे लोग रोते नहीं है। समझ नहीं आया क्या पढे लिखे लोगों के भीतर संवेदनाएं नहीं होती है। वक्त धीरे - धीरे तन्हाई में कटने लगा.

एक दिन उसका जी मिचलाने लगा, उल्टियां शुरू हो गई; डाॅक्टर को दिखाया तब ज्ञात हुआ माँ बनने वाली हूॅ. नए मेहमान के आगमन से ही मन प्रफुल्लित हो गया, कि अचानक प्रणव का ट्रांसफर दिल्ली हो गया. उन्हे वहां तुरंत ज्वाइन करने का पत्र मिला। सब कुछ बहुत जल्दी में हुआ और सैटल होने के बाद पलक को ले जाऊंगा कहकर प्रणव अकेले दिल्ली चले गए चले गये. जातें जाते दो शब्द कह गए - अपना ध्यान रखना; घर में सब दिल के अच्छे हैं। वह न तो खुश हो पा रही थी और न ही आँसुओं को रोक पा रही थी. कभी कभी प्रणव का यह सूखा व्यवहार खलता था. फिर भी पलक को प्रणव की कमी खलती थी. पति का पास होना भी बहुत मायने रखता है, भले ही बात- चीत न हो किंतु साथ तो रहता है. फिर यह जुदाई आठ महीने की थी. दिन का समय घर के काम और रात तन्हाई में कटने लगी. घर वालों के ताने मारने की आदत ऐसी स्थिति में भी कायम थी. मानसिक तनाव रहने लगा था। किन्तु बच्चों के आने की आहट से मन की बगियाँ जरूर हरी हो गयी थी।

माॅं जी ने दिन -रात पोते की कामना करते हुए हिदायते देना शुरू कर दिया. ऐसी स्थिति में शरीर ज्यादा थक रहा था। मेरी दुनियां नन्हे क़दमों की आहट सुनने के लिए बैचेन थी. कोख में उनकी हलचल दिल को आंनदित करती थी. मुझे तो जैसे अब आस - पास की खबर ही नही थी. नया सदस्य, जो मेरा अंश होगा, उसकी कल्पना में ही खोई रहती थी. फिर वह पल आया जब मेरी झोली में एक नही दो नन्हीं खुशियाॅ थी. जुडवा बच्चों का जन्म हुआ. एक लडकी व एक लडका. पोते की खुशी ज्यादा मनाई गई , पर माॅ के लिए लडका व लडकी में कोई फर्क नही होता, वे तो उसका अंश होते है. मेरी बेटी भी बहुत प्यारी थी.

बच्चों के आने से मन की बगिया खिल उठी. प्रणव ने कुछ नही कहा किंतु वे खुश नजर आ रहे थे. उनका फोन आया था. छुटट्ी न मिल पाने के कारण वे नही आ सके थे. मै अपने दोनो बच्चों मे रम गई . खुशी व्यक्त नही कर पा रही थी. जैसे तपते रेगिस्तान में ठंडी फुहार पडी हो. लगभग दो महीने बाद प्रणव हमें लेने आए. बच्चो को प्यार किया, मेरा हाल पूछा फिर सबके पास बैठकर वहाॅ की खबरे बताई. मुझे उनसे अंतरंग बात करने का भी मौका भी नही मिला, आने के बाद वह सारा समय घर वालो के बीच ही व्यतीत करते थे. बच्चों का नामकरण भी हुआ. विक्की और विनि. फिर उसके बाद दो दिन रूककर हम चले गये.

इस नये घर में आकर ऐसा लगा, जैसे पिंजरे से बाहर निकलकर लगता है. यहाॅ कोई रोक-टोक करने वाला नही था. प्रणव को यहाँ ज्यादा व्यस्तता थी, सुबह जाते तो रात को आते. इतना थक कर आते कि उनसे क्या बात करती, पर बच्चों के साथ वे थोडा समय जरूर व्यतीत करते . हमारा सानिध्य कम ही हो पाता. इतने दिनों की दूरी के बाद भी प्रणव के पास मुझे बताने के लिए कुछ नही था. यह बात दिल को पीडा देती थी. मेरे देानो बच्चे विक्की और विनि बहुत प्यारे थे. वक्त उनके साथ गुजरने लगा और मै भी अकेलेपन की पीडा से उबर गई. जब हमे कोई लक्ष्य मिल जाए तो बाकी बातें हमारें लिए गौण हो जाती है.क्योकि लक्ष्य के अलावा हमें कुछ याद नही रहता. बच्चो की अच्छी परवरिश ही मेरी प्रथम प्राथमिकता थी. बच्चे सही राह पर चले इसलिए मैने अपने सब शौक त्याग दिए. मेरा एक ही ध्येय था ’’ बच्चो की अच्छी परवरिश व उच्चशिक्षा’’

वक्त के साथ बच्चे भी लक्ष्य की तरफ बढने लगे. वे जब घर से जाते तो मै उनके लौटने की राह देखती. प्रणव बिल्कुल नही बदले थे . हमेशा की तरह शांत व चुप. कभी - कभी तो मुझे उन पर गुस्सा आता कि यह कैसे है, मुझे समझते भी है या नही. क्या कोई इंसान ऐसा कैसे रह सकता है जो प्यार भी नही जताए. दिल भर आता था, वो मेरे लिए क्या सोचते है आज तक मुझे पता नही चला. कभी कभी तो पीर आँखो से छलक उठती थी. ऐसा लगता था कि कही ये किसी और से शादी करना चाहते होगें, पर इसमे मेरी क्या गलती थी .मेरे पूछने पर हमेशा की तरह मुस्कुरा देते और स्पर्श द्वारा अपना प्यार जता कर कर्तव्य पूरा कर देते. पर बच्चो के साथ उनका व्यवहार एक अच्छे पिता के समान था. वो बच्चो को कुछ मना नही करते व उनके हर काम में उनका साथ देते थे. पर मेरे लिए उनके पास शब्द भी नही थे.शायद उनका पुरूष अंह आडे आता हो, खैर मै उन्हें समझने में असफल थी. अगर मै न बोलू तो शायद वार्तालाप ही न हो.

मुझे तो बच्चो के रूप में अनमोल दौलत मिली थी. मेहनत रंग लाई. बच्चे अच्छे संस्कारो के साथ, अच्छे पद पर भी पॅहुचे. विक्की इंजिनियर बनकर अमेरिका चला गया व विनि ने एम.बी.ए. में टाप किया. बच्चो की कामयाबी पर हम बहुत खुश थे. विक्की जब अमेरिका जा रहा था तो दिल उसे भेजने के लिए तैयार नही था. हर पल पलकें नम रहती थी तब एक दिन प्रणव बोले,

’’ पलक, बच्चों को आगे बढने से मत रोको, उन्हे रोक कर तुम स्वार्थी मत बनो, उनकी राहो को आसान करो व उनकी राहों में रोडे मत डालो.’’

उस एक पल वह चुप रह गई. क्या स्वार्थ होगा मेरा, आखिर बच्चों के लिए कोई माँ रोडा बन कैसे बन सकती है, प्रणव ने कैसे यह कहकर दिल दुखा दिया. उसने तो बच्चों की राहों में कभी अपने प्यार को भी आडें नही आने दिया था. बच्चों को अच्छे मुकाम पर पहुँचाना ही ध्येय था. पर जब बच्चे दूर जा रहे हो तो एक माँ को तकलीफ कैसे न होगी. दोनों की शादी की फिर भरे दिल से विक्की को भेजा व विनि की विदाई की. दोनों अपनी - अपनी जिंदगी में व्यस्त हो गए. सब कुछ पलक झपकते हो गया.

उनके जाने के बाद घर में सन्नाटा सांय-सांय करने लगा. घर की जैसे रौनक ही चली गई थी. शुरूआत मे विक्की के फोन बहुत आते थे, फिर धीरे - धीरे व्यस्तता बढने के कारण वह भी कम हो गए. तरक्की पाने के लिए मेहनत तो करनी पडेगी. बहू भी उच्च शिक्षित थी. उसे भी वहाँ काम मिल गया था.
विनि की ससुराल इसी शहर में थी. वह अपने पति के बिजनेस मे उनका हाथ बटांने लगी. व्यस्त होने पर भी वह अक्सर मिलने आ जाती थी. ऐसा लगा कि जैसे मैने सब कुछ पाकर भी खो दिया हो. दिल मे फिर से खालीपन व अधूरापन उरने लगा. अकेलापन अब मुझे खाने को दौडता था और जो तन्हाई मेरे बच्चों के आने से दब गई थी, उसने भी अपने फन फैलाना शुरू कर दिया. हर पल मन में निराशा के विचार आते थे. कभी- कभी तो ऐसा लगता कि सिर की नस ही फट जाएगी. घुटन सी होने लगी थी. कभी भी चिडचिडाने लगती. मै अपने आप को संभाल ही नही पाई और डिपे्रशन का शिकार हो गई. प्रणव अब थोडा समय मेरे साथ व्यतीत करने लगे. एक वक्त ऐसा आता है जब हमें अपने साथी की सबसे ज्यादा जरूरत महसूस होती है. जो एक दूसरे को भावनात्मक रूप से संभाले रखते है.

पर कहते है न कि चित्र बिना रंगो के अधूरा ही रहता है, उसी तरह प्रणव का साथ व प्यार कुछ शब्दों का मोहताज था. मै अपना दिल हल्का करना चाहती थी, पर मेरे लिए अब किसी के पास उतना वक्त नही था. दिल की तम्मनांए नागफनी के पेड की तरह बढने लगी. प्रणव अभी भी व्यस्त थे. सबकी अपनी - अपनी एक जिंदगी थी; सभी के पास अपना एक मुकाम था. पर मेरे पास अब कुछ भी नही था. मेरे दिल में यह कसक बन कर रह गई. अब तो कुछ करने की उम्र भी नही है. अपना समय व्यतीत करने व मन बहलाने के लिए मैने पुन: अपनी डायरी लिखना शुरू कर दिया, जो पहले कभी कभी लिखती थी. खाली दिमाग शैतान का घर बन जाता है. जो मै नही चाहती थी. मेरी डायरी अब मेरी हमराज बन गई थी. अपनी तन्हाई कम करने के लिए अपने विचारों को रूप प्रदान करने लगी. एक दिन रात को जब मै लिख रही थी तो अचानक प्रणव वहाँ आ गए और बोले-

’’ क्यों पलक; क्या लिख रही हो.’’

’’ कुछ भी तो नहीं, बस ऐसे ही.....’’

’’ कुछ तो लिख रही हो, फिर झूठ क्यों बोल रही हो?’’ कहकर प्रणव ने डायरी छीन ली.

’’ प्रणव, क्या हॅँ मैं? न कोई अस्तित्व, न ही कोई पहचान. मेरे लिए आपके पास भी कभी वक्त नही रहा.....’’ न जाने कैसे यह मुँह से निकल गया . यह कहते हुए पलक की आँखे भर आई.

’’ तुम कैसी बातें सोचती हो, पलक. तुम मेरी पत्नी हो, दो प्यारे बच्चों की माँ हो और ये घर तुम्हारे बिना कुछ भी नही है.’’ प्रणव ने पहली बार इतना कुछ कहा और उसे अपनी बाँहो में भर लिया. ’’

पर प्रणव, मै तो कुछ भी नही हूँ?’’ कहते हुए बडबडाने लगी ; पलक का गला भर आया; शब्द गले में अटक गए; दिल जोर से धडकने लगा, ऐसा लगा जैसे शरीर व जुबान अब उसके बस में नही है.

’’पलक, तुम क्या कह रही हो, कैसी बहकी बाते कर रही हो? मै तुमसे कुछ कह रहा हूॅ.’’

प्रणव ने पलक को पकड कर झकझोर दिया; तो पलक, प्रणव की मजबूत बाँहो का सहारा पाकर रो पडी. प्रणव हैरान रह गए. ’’ पलक, तुम्हें क्या हुआ है ?’’ कहते हुए प्रणव ने उसे सहारा दिया व प्यार से उसके सिर पर हाथ फेरकर उसे शांत करने का प्रयास करने लगे.

’’ शांत हो जाओ पलक. रात बहुत हो गई है, चलो सो जाओ; बच्चों की याद आ रही है, कल उनसे बात करेंगे. अभी शांत होकर सो जाओ.’’ प्रणव समझाने का प्रयत्न कर रहे थे. यह सब इतना अचानक हो गया कि प्रणव भी घबरा गए.

मेरा दिल आज मेरे बस में नही था. इतना सहारा आज पाकर दिल उस छोटे बच्चे के समान हो गया; जिसे किसी की प्यार भरी गोद की जरूरत होती है. वह कब उस गोद मे सो गई, पता ही नही चला. प्रणव ने पता नही विनि से क्या कहा. सुबह दरवाजे की घंटी बजी. तो देखा विनि सामने खडी है.

’’ माँ तुम कैसी हो ’’ कहकर विनि गले से लिपट गई .

’’ मै तो ठीक हूँ , तू कैसे अचानक आ गई ,’’

’’ अरे भाई, मै तो तुम्हारे आँसूओ से घबरा गया था.’’ बीच मे बात काटकर प्रणव बोले.

’’ पापा, विनि बोली और दौडती हुई प्रणव के गले लग गई.

’’ अरे, अब छोटी बच्ची नही रही, चल, अब आ गई है तो सब साथ मे नाश्ता करेगें ’’ पलक ने विनि से कहा.

फिर वह नाशते की तैयारी करने लगी. विनि प्रणव के साथ बाहर चली गई. पलक आज खुद को हल्का महसूस कर रही थी. शायद रात के आँसूओं मे मन की वेदना बह गई थी. वह सोच रही थी कि प्रणव में पहले की अपेक्षा शायद कुछ परिवर्तन आ गया है. इतने में विनि आ गई व नाशता लगाने में उसकी मदद करने लगी. नाशते की टेबल पर सभी शांत बैठे थे कि अचानक विनि बोल पडी.

’’माँ, तुम कुछ अपने लिए करो ’’

’’ मै अब क्या करू ?’’ पलक ने कहा

’’ पलक, तुम्हें हमेशा से कुछ करने की ललक रही है; इक मुकाम हासिल करना चाहा था; अब शुरू करो.” प्रणव बोले.

’’अरे, अब तो उम्र बीत गई है .’’

’’नही माँ, किसी भी काम की शुरूआत के लिए उम्र की कोई सीमा नहीं होती है ’’ विनि ने कहा.

’’अब ऐसा कौन सा काम है? जो मै इस उम्र में शुरू करूं, घर संभाल लिया, तुम लोगों को बना दिया, मेरे लिए यही बहुत है ’’ पलक ने कहा

’’ नही माँ, तुम एक काम कर सकती हो.’’

’’क्या?’’

’’सृजन, हाँ माँ, तुम अपने विचारों का सृजन करो, तुम्हें पढने लिखने का शौक है; इससे बेहतर कुछ नही हो सकता है ’’ विनि.

’’नहीं, मुझसे अब कुछ नही होगा " कहकर पलक उठ गई और वार्तालाप वहीं समाप्त हो गया.

विनि शाम तक रूककर अपने घर चली गई. दिन भर उसने मुझसे बात नहीं करी. प्रणव एकदम शांत बैठे थे. रात को प्रणव ने मुझे विनि का पत्र दिया. विनि ने लिखा था.

’माँ, मैने आज तक आप से कुछ नही माॅंगा, आज माॅंग रही हूँ. मुझे आपकी एक अलग पहचान, एक अलग मुकाम चाहिए. क्या आप मेरी ये इच्छा पूरी करेगीं, यही मेरे जन्मदिन का तोहफा होगा. आप देगीं ना माँ - आपकी विनि.

पलक ने पत्र पढकर प्रणव को देखा, तो जबाब में प्रणव उसके हाथों को थाम कर बोले -
" पलक, मैने कभी भी तुम्हारी तरफ ध्यान नही दिया. तुम्हारे अंदर की प्रतिभा को भी नही पहचान पाया, ये मेरी गलती है, विनि सही कह रही है. मैने तुम्हारी डायरी पढी है तुम्हारा दर्द ...’’

’’अरे, आप कैसी बातें कर रहें है "’ पलक ने बात काटकर कहा

’’नही पलक, मुझे तो प्यार जताना भी नही आता, पर तुम तो अपना दर्द, अपनी खुशी, सभी कुछ तो शब्दो में ढाल देती हो. तुम बहुत अच्छा लिखती हो; कोशिश करो, अपनी प्रतिभा को उजागर करो ’’ कहकर प्रणव ने हौले से हाथ दबा लिया.

मेरे लिए ये नया अनुभव था, इतने सालों मे पहली बार प्रणव ने मेरे लिए कुछ कहा, सुनकर अच्छा भी लगा. विनि की इच्छा व प्रणव के शब्दो ने न जाने मन में कैसी स्फूर्ती भर दी जिसने मेरी सोई हुई लालसा को फिर से जगा दिया. मैने पुन: लिखना शुरू कर दिया.

जब पहली रचना पत्रिका में आई तो विक्की व विनि दोनो के फोन आए.
" माँ, तुम्हारे नए सफर का हम स्वागत करते है.’’ बच्चे भी मेरी हौसला अफजाई करते रहते. प्रणव, मेरी हर रचना पर मुझसे कहते -
’’ पलक, अच्छा है, कोशिश करती रहना ’’

अब वह अपने प्यार को बिना शब्दों के स्पर्श द्वारा महसूस कराते रहते व मैं उस प्यार को अपने शब्दों में ढालने लगी. प्रणव को अपनी खुशी व्यक्त करने में शब्दों की हमेशा कमी लगती है, पर मेरी हर कृती में अब मेरे अपने साथ होते. यह मेरे अपनों का ही विश्वास था व मुझे विनि को तोहफा भी तो देना था. दरवाजे पर बज रही तीव्र घ्ंटी की आवाज ने मेरी तंद्रा को भंग कर दिया व मेरे विचारो पर विराम लग गया.

दरवाजा खोला तो प्रणव मिठाई लिए खडे थे.

’’ कब से दरवाजा बजा रहा हूँ, कहाँ थी तुम?’’

मै कुछ कहती उसके पहले प्रणव ने मेरे मुँह मे मिठाई भर दी और प्यार से गले लगा लिया.

’’अरे, छोडो भी अब....’’ पलक इसके आगे कुछ कहती कि आवाज आई.

’’ अब उम्र हो गई है ’’ कहती हुई विनि अंदर आ गई.

उसकी इस बात पर सभी हँस पडे. दूसरे दिन रात 7 बजे हमें गांधी हाँल पहुँचना था. विनि रात को घर पर ही रूक गई थी. सुबह उठकर सब अपनी - अपनी तैयारी मे लग गए. सुबह से बधाई देने वालों का तांता लगा था. विनि के ससुराल वाले भी आए थे. विक्की का भी फोन आया था. उसे अफसोस था कि वह इस समय भी सबके साथ नही है . रात को डिनर का प्रोग्राम भी वहीं था. समारोह के लिए हम सभी नियत समय के निकल गए. हाल में प्रायोजकों ने हमारा स्वागत किया. प्रेस व मिडिया वाले भी वहाँ मौजूद थे. समारोह अपने नियत समय पर प्रारंभ हुआ. तभी संपादक ने मंच पर आने के लिए मेरा नाम पुकारा.

’’ पलक गुप्ता, जिनका ’’नीड’’ आज हाथों हाथ बिक रहा है. कितनी खूबसूरती से इन्होंने नीड का चित्रण किया है.’’

पलक उठकर खडी हुई. हाल में तालियों के साथ उसका स्वागत किया गया. माला पहनाकर व शाल उढाकर उसे सम्मानित किया गया. पलक ने झुककर सभी का अभिवादन किया तो आँखे नम हो गई. शब्दो को रूप देने वाली पलक के शब्द आज न जाने कहाँ चले गये थे. नीड, उसके ही जीवन का सपना था. वह बस इतना ही कह सकी.

’’नीड, मेरी बेटी विनि के नाम समर्पित है. यह इसके लिए मेरा एक तोहफा
है जो इसने मुझसे माॅंगा था. आप लोगो ने मुझे इतना प्यार दिया, इतना सम्मान किया, उसके लिए मै आप सबका तहे दिल से आभारी हूँ अपना स्नेह बनाये रखें.’’

’’माँ आखिर आपने अपना मुकाम पा ही लिया .एक और सृजन कर लिया, आय एम प्राउड आॅफ यू मोम ’’ कहकर विनि गले लग गई.

तभी किसी ने प्रणव से प्रश्न किया कि-

‘‘ आप कैसा महसूस कर रहेें है, आज आपकी पत्नी को सम्मानित किया गया है?.’’
‘‘ नारी का काम सृजन करना ही है, मन में आत्मविश्वास हो तो वह जो चाहे वह कर सकती है. हर नारी के अंदर कोई न कोई प्रतिभा होती है, जिसे बाहर लाना चाहिए. जिंदगी में अपने लिए कुछ करना; अपनी प्रतिभा को निखारना कोई गलत बात नही है. उन्हें भी अपनी जिंदगी जीने का अधिकार है. मुझे अपनी पत्नी पर बहुत गर्व है.”
कभी न बोलने वाले प्रणव आज न जाने कैसे इतना बोल गए और मेरा हाथ थाम लिया. लोग सम्मान में खडे हो कर तालियाँ बजा रहे थे. मेरी आँखे खुशी से छलक उठी. एक नवयौवना की तरह मेरी आँखो में फिर से सतरगीं सपने रंग भरने लगे. आज मैं बहुत खुश थी कि, मुझे मेरा ‘‘नया आकाश‘‘ मिल गया.
शशि पुरवार 

शशि पुरवार 
shashipurwar@gmail.com



Saturday, August 1, 2020

नया आकाश - धारावाहिक कहानी भाग १



" नया आकाश ’’

दोपहर के 1 बजे फोन की घंटी बजी, पलक के हेल्लो के जबाब में दूसरी तरफ से प्रणव की आवाज थी.

’’ पलक, बधाई हो ! तुम्हें इस साल तुम्हारे उपन्यास ’’ नीड़ ’’ के लिए सम्मानित किया जा रहा है.

’’ क्या ’’ खुशी व सुखद आश्चर्य से पलक की आवाज में कम्पन आ गया, शब्द गले में ठहर गए, अचानक आँखें नम हो गयीं, हदृय अपने उदगार व्यक्त करने में असमर्थ थे. जीवन में जो इक प्यास शेष थी, आज जैसे उस प्यासे को पानी मिल गया था.
’’ क्यों, विश्वास नहीं हो रहा है ? अभी - अभी मुझे संस्था से फोन आया था! अच्छा, शाम को मिलता हूँ फिर बात होगी। .’’ कह कर प्रणव ने फोन रख दिया. 

पलक जैसे ही फ़ोन रखकर मुड़ने लगी, कि फिर घंटी बजी. ’ हेल्लो’ के जबाब मे उधर से अाती हुई मधुर आवाज कानों में रस घोल गयी.

माँ - बधाई हो, मैं घर आ रही हूं.’’

’’अरे विनि, कैसी है, कब आ रही है, तुझे कैसे पता चला ’’ पलक ने एक ही सांस में प्रश्नों की झड़ी लगा दी।

’’ माँ, पापा का फोन आया था, अच्छा शाम को मिलतें हैं. अभी फोन रखती हॅू‘‘ कहकर विनि ने फोन रख दिया.

’’पता नही, सबको कितनी जल्दी रहती है’’ पलक धीरे से बडबडाई.

विनि से बात करके पलक की भीगी पलकें झरझर झरने लगीं। विनी उसके ह्रदय का टुकडा थी. जिसके बिना वह कोई कल्पना नहीं कर सकती थी. ऐसी ख़बरें आग की तरह फैल जाती है। उसके बाद बधाई का जो सिलसिला शुरू हुआ वह दोपहर 3 बजे तक चलता रहा.

आज जैसे पलक अपने अंदर ठहराव महसूस रही थी। स्वयं की पहचान हर इंसान के लिए मायने रखतीं है। वह पहचान ही जीवन में सम्पूर्णता का अहसास कराती है। वक़्त व नियति के चलते जो कुछ पीछे छूट गया था, आज ओस सी शीतलता बन हदृय को ठंडक प्रदान कर रहा था। ह्रदय के किसी कोने मे जो तम्मना दबी हुई थी,आज उसे एक गगन मिल गया. ह्रदय की धडकन व मन के तारों ने साज छेड रखा था. विनी ने ही अनजाने में उसके स्वप्नों को हवा दी थी। न चाहते हुए भी पलक अतीत की उन गलियों में विचरने लगी जहाँ सिर्फ दर्द और तन्हाई थी। मानसिक त्रासदी भी किसी यातना से कम नहीं होती है।

आज भी वह दिन याद है जब उसने शादी न करने के लिए जद्दोजहत की थी। आगे पढने व एक मुकाम हासिल करने का स्वप्न नैनों में तैर रहा था. पलक स्वभाव से शांत व संवेदनशील थी. वह दो बहनें थी. भाई नहीं था. पलक छोटी थी. माँ -पिताजी परंपरावादी न होकर बहुत सुलझे हुए इंसान थे. बेटियों को बेटे की तरह, बहुत जतन से पाला और जीवन में आगे बढ़ने के लिए प्रेरित किया। माँ का एक ही ध्येय था कि हम उच्च शिक्षित बने । हालाकिं माँ स्वयं शिक्षित होकर गृहणी ही थी। परंपरा के आगे उन्होंने घुटने टेक दिए थे. लेकिन उनका पूर्ण साथ व विश्वास हमें मिला था.

मध्यमवर्गीय परिवार होने के कारण हम हर परिस्थिति से झूझने के आदी थे। माँ - पिताजी ने हमारी शिक्षा के लिए पूर्ण त्याग किया ,हमें कभी कुछ कमी महसूस नहीं होने दी थी। हमने भी उनके विश्वास पर खरे उतरने की पूरी कोशिश की थी. दीदी प्रोफेसर बन गई व उनकी शादी उनके साथी प्रोफेसर से हो गई. मैने भी एम.ए, बीएड व पी.एच.डी करके आगे नौकरी करनी चाही परंतु मुझे वक्त ने ऐसा कोई मौका नहीं दिया. प्रणव के घर वालों ने एक दिन मुझे देखा और रिश्ता सामने से आया। प्रणव सरकारी नौकरी में थे। मैने माँ - पिताजी से मना किया, भूखी रही, पर उनके आगे एक न चली, माँ बोली -

’’ अच्छे लडके मुशकिल से मिलते है, सुन्दर शिक्षित लड़का है और क्या चाहिए। जो भी करना शादी के बाद करना " और बात वही खत्म हो गई. लोग पहले शादी को ही जीवन का अंत मानते थे. यहाँ आकर उन्होंने भी साथ छोड़ दिया।

हर लडकी की तरह आँखों में सतरंगी सपने लिए ससुराल की दहलीज पर कदम रखा। ससुराल की परिस्थिति ठीक ही थी। नए सफर की उंमगो में परिवार का साथ व प्यार महत्वपूर्ण होता है। माँ - पिताजी ने पहले ही कह दिया था. अपने संस्कारों का ध्यान रखना, किसी को शिकायत का मौका मत देना। सोचा था कि सबका दुलार मिलेगा, तो घर के साथ-साथ वह नौकरी भी कर सकती हैं। वह सब अच्छा करने की कोशिश करेगी; परंतु सपने आँख खुलने पर टूटते ही है. धीरे धीरे प्रणव के घर वालों का व्यवहार और विचार सामने आ ही गए।

प्रणव के परिवार वाले रूढ़िवादी व सर्कीण विचारों के थे. घर की बहू बाहर जाकर काम करे, उन्हें पसंद नहीं था. घर की परिस्थिति ठीक ठाक थी. जेठ, पिताजी के साथ दुकान पर बैठते थे. उस घर में सिर्फ प्रणव और मैं उच्च शिक्षित थे, बाकी सदस्यों ने डिग्री भी पूर्ण नही की थी. प्रणव एक प्राइवेट कंपनी में मैनेजर की नौकरी करते थे. उन्हें काम से फुरसत नहीं थी . प्रणव का स्वभाव गंभीर व अंर्तमुखी था. परिवार में उनकी दखलअंदाजी नहीं थी. वह परिवार के खिलाफ कुछ सुनना पसंद नहीं करते थे। हाथ की मेंहदी भी नहीं छूटी कि दूसरे दिन से घर की जिम्मेदारीयाँ कांधे पर आ गयीं. नवविवाहिता के कोमल सपने रसोई घर में सिमट कर रह गए.

जिठानी झगड़ालू प्रवृति की थी। जेठानी व सास की निसदिन खिट-पिट होती रहती थी, जिसमें पलक गेहूँ के घुन की तरह पिसती थी। सभी लोग आए दिन उसे अपना स्वत्व व दबाने की कोशिश करते थे। घर में सास की ज्यादा चलती थी. कब किस बात का गलत मतलब निकल जाए कह नही सकते थे. उनकी नजर में ज्यादा पढी-लिखी लडकी तेज होती है. ऐसे में पलक ने हमउम्र दोनों ननद को अपनी सहेली बनाने का असफल प्रयास किया। कहतें है जहाँ मन मे कॉम्प्लेक्स हो वहां मिठास नहीं हो सकती है। ईर्ष्या मति भ्रष्ट करती है. दोनों का प्रेम तो दूर; भाभी शब्द का संबोधन भी कभी मुख से नहीं निकला। दिन रात बहुत ईमानदारी से परिवार की जिम्मेदारी निभाई। किन्तु उसका मोल न मिला. घर वाले स्नेह देने में भी बहुत गरीब थे. उनके लिए मैं सिर्फ दूसरे घर की लड़की ही बनी रही. घर में भय की मातमी छाई रहती थी। न ज्यादा बात और न ही हंसी मजाक, किन्तु जिसे देखो मुझे सताने का मौका जरूर ढूंढता था, लेकिन प्रणव के सामने सब बहुत सीधे बनते थे । ऐसा द्विचरित्र मुखौटा पहली बार देखा था. जिसे देखो वह उस पर हावी होने का प्रयास करता था, पलक की हालत ऐसी थी कि काटो तो खून नहीं, किसी से खुलकर हँसने बोलने में भी डर लगताथा। चुप रहकर ही प्रतिकार किया, मैंने काम के बोझ तले अपने सपनों बिखरते देखा था.

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..शशि पुरवार