ब्लॉग सपने शशि में आप पढ़ेंगे जीवन के रंग अभिव्यक्ति के संग.. प्रेरक कहानियाँ, लेख और साहित्यिक रचनाओं का संसार ।आपका अपना संसार ।
▼
Pages
▼
Tuesday, May 28, 2013
सृजित हुए छंद .....
तांका -- पीरा मन की तपता रेगिस्तान बिखरे ख्वाब पतझड़ समान बसंत भी रुलाए . तुम हो मेरे भाव सखा सजन तुम्हारे बिन व्यथित मेरा मन बतलाऊं मै कैसे ? चंचल हवा मदमाती सी फिरे सुन री सखी महका है बसंत पिय का आगमन शीतल हवा ये अलकों से खेले मनवा डोले बजने लगे चंग सृजित हुए छंद
बहुत सुन्दर सृजन..
ReplyDeleteसुन्दर अभिव्यक्ति !
ReplyDeleteबहुत सुंदर भावाभिव्यक्ति
ReplyDelete....शुभकामनायें :)
ReplyDeletenice creation
ReplyDeleteबहुत उम्दा,लाजबाब रचना ,,
ReplyDeleteRecent post: ओ प्यारी लली,
सुंदर अभिव्यक्ति !!
ReplyDeleteसटीक शब्द , गहराई और सूक्ष्मता से भारतीय नारी की आकांक्षओं का दुर्लभ वर्णन .
ReplyDeleteहार्दिक बधाई .मंगल कुशल और शुभ कामनाएं .
अनुपम काव्य धारा ... बधाई ...
ReplyDeleteसुन्दर अभिव्यक्ति
ReplyDelete