Tuesday, August 18, 2015

मन प्रांगण बेला महका। .

मन, प्रांगण बेला महका
याद तुम्हारी आई 
इस दिल के कोने में बैठी 
प्रीति, हँसी-मुस्काई।

नोक झोंक में बीती रतियाँ 
गुनती रहीं तराना 
दो हंसो का जोड़ा बैठा 
मौसम लगे सुहाना

रात चाँदनी, उतरी जल में 
कुछ सिमटी, सकुचाई।

शीतल मंद, पवन हौले से 
बेला को सहलाए 
पाँख पाँख, कस्तूरी महकी  
साँसों में घुल जाए। 

कली कली सपनों की बेकल 
भरने लगी लुनाई 

निस  दिन झरते, पुष्प धरा पर 
चुन कर उसे उठाऊँ 
रिश्तों के यह अनगढ़ मोती 
श्रद्धा सुमन चढ़ाऊँ

रचे अल्पना, आँख शबनमी 
दुलहिन सी शरमाई।    
     --- शशि पुरवार 

Tuesday, August 4, 2015

फेसबुकी बौछार




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           आजकल व्यंग विधा अच्छी खासी प्रचलित हो गयी है. व्यंगकारों ने अपने व्यंग का ऐसा रायता फैलाया है, कि बड़े बड़े व्यंगकार हक्के बक्के रह गए, अचानक इतने सारे व्यंगकारों का जन्म कैसे हुआ, आपके इस रहस्य की गुत्थी हम सुलझाते है, इसका जन्मदाता फेसबुक है. जिसने अनगिनत व्यंगकारों को अपनी गोदी में खिलाया, लिखना पढना सिखाया और उन्हें आसमान पर बीठा दिया.अजी भेड़ चाल सब जगह कायम है तो फेसबुक पीछे कैसे रह सकता है.


           यहाँ भी हमारे देखते देखते नए व्यंगकारों की अच्छी खासी जमात खड़ी हो गयी है. जिसे देखों मुर्गे की एक टांग लिए हर किसी की चिकोटी काट रहा है, कोई कविता को लेकर फिरके कस रहा है कोई किसी के फैशन की धज्जियाँ उड़ा  है. कोई महिलाओं की तस्वीरें देखकर गिरा पड़ा हुआ है तो कोई पुरुष अपनी हर अदा दिखाने के लिए रोज तस्वीरें ऐसे बदलता हैं जैसे विश्व सुंदरी अपने अलग अलग पोज दुनियाँ को दिखाना चाहती है,  हमारे यहाँ के चम्मच मोटे थुलथुले शरीर में भी सौन्दर्य की सुंदरी वाली परिकाष्ठा अपनी बैचेन नजरों से देखतें हैं. ऐसे फीता काटने वालों की कोई कमी नहीं है.
          हाल ही मै भारत वर्ल्ड कप में हार गया तो सारा ठीकरा अनुष्का शर्मा के सर पर फोड़ा गया, आखिर यह गुत्थी सुलझी ही नहीं कि बालकनी में बैठी हुई अनुष्का मैच कैसे हरा सकती है या फिर हमारे क्रिकेटरों का ध्यान मैच से ज्यादा विराट कोहली और अनुष्का शर्मा पर लगा हुआ था. वैसे भी जनता  यदि इंसान को भगवान बनाएगी तो यही हाल होगा. एक किस्सा और जहन में ध्यान आ रहा है, कुछ पुरुष ऐसे भी है जिनकी उम्र अपने अंतिम पड़ाव पर  है और वह नजरें सेकने से लेकर  महिलाओं पर कुदृष्टि डालने से बाज नहीं आतें हैं, नाम नहीं लेना चाहूंगी, बुजुर्ग हस्तियाँ इस तरह के कार्य करके युवा पीडी को क्या सन्देश दे रहीं है, जहाँ भरोसा कायम होना चाहिए वहां ऐसी बचकानी हरकतें , आखिर पूजने वाला उन्हें क्या दर्जा प्रदान करेगा. ऐसी हरकतों पर धज्जिया उडाना कोई हमारे कुएँ के मेढकों से सीखे.
           यही हाल कमोवेश लगभग फेसबुक पर भी मौजूद है. घर से दुनीया को जोड़ने वाली खिड़की पर सभी की नजर है, यहाँ भी रायता फ़ैलाने वालों की कमी नहीं है. कौन किससे चोंच लड़ा रहा है, कौन किसका अच्छा मित्र शुभचिंतक है, खोजी नजरें अपना कार्य करके आग लगाने का कार्य बखूबी पूर्ण शिद्दत से निभातीं है, आखिर व्यंग और कटाक्ष में हमारे जैसा सिस्टम मिलना मुश्किल ही नहीं नामुमकिन हैं.
               एक दिन ऐसे ही अचानक हमारे जादुई बक्से की खिड़की खुली और सन्देश मिला क्या बात है आप बहुत बहुत सुन्दर हैं, हर तरफ छाई हुई हैं, जहाँ देखिये छप रहीं है. आखिर  इन जनाब का हाजमा किस बात से बिगड़ा, कुछ समझ नहीं आया, ऐसे लोगों को कोई क्या जबाब दे सकता है.  एक और हमारे भलेमानस शुभचिंतक है, जो कहते है सतर्क रहो आगे बढ़ाने वाले ही आपको पटकनी देंगे, कुछ प्यारे सखा सहेली आगे बढ़ने से इतना नाराज हो गए कि कमतर दिखाने का कार्य पूर्ण शिद्दत से करने लगे और व्यंग के सारे रंग हमें लगाने लगे, उन्हें यह समझ ही नहीं आया इससे उनकी ही कलई   खुली है हम तो वहीँ अपनी कछुए वाली निति चले जा रहें हैं. क्यूंकि हमें तो रेस में कोई रूचि ही नहीं है .
         आजकल मानसून के बदमिजाज मौसम की तरह व्यंग बारिश कहीं भी शुरू हो जाती है. व्यंग विधा में आये नए नए कई रचनाकारों ने बड़े बड़े रचनाकारों के कान काटना शुरू कर दियें हैं. हरिशंकर परसाई जी के व्यंग नए कदमों को अपनी सिद्धहस्त कला का ज्ञान प्रदान करतें हैं. किन्तु अचानक फेसबुकी स्टार बने हुए व्यंकारों ने अपनी स्वयं की विधा को ईजाद कर लिया है, स्वयं को नामचीन व्यंगकार कहने वाले फेसबूकी व्यंगकारों ने हर किसी को अपने लपेटे में लेना प्रारंभ कर दिया है. वे वहां सर्वप्रथम संपादक को ढूंढते हैं , उनसे मित्रता बढ़ाते हैं और बार बार निवेदन करके मित्रता की खातिर खुद को स्थापित करने का प्रयास करतें है, हाल ही में एक किस्सा हुआ, हमने अभी अभी व्यंग विधा की गलियों में अपने पैर रखे, गाहे बगाहे पाठकों ने स्वागत किया, तो जनाब सिखने के बहाने हमने अपनी कलम घिसना प्रारंभ कर दी. हमारे प्रिय संपादकों को लेखन पसंद आया तो उन्होंने हमारी कलम को एक कुर्सी प्रदान कर सम्मान से नवाज दिया, खैर हमने स्वयं को विधार्थी मान कर कुर्सी को गुरु बनाना उचित समझा, किन्तु यह क्या फेसबुक के कई नए व्यंगकारों की नजर हमारी कुर्सी पर पड़ी और उन्होंने चाट में चुपचाप मक्खन लगाना प्रारंभ कर दिया, हमारी रचना को भी छपवा दीजिये, आप हमारी मित्र है, आपका बहुत नाम है ...आपको हर कोई छापता है  वैगेरह वैगेरह ... मित्रता की खातिर हमने उन्हें संपादकों के संपर्क की जानकारी प्रदान कर की, किन्तु वह सामग्री भेजने के बाद भी प्रकाशित नहीं हुई . तो उन्ही नामचीन रचनाकारों के बीच हम अमित्र होने लगे क्यूंकि हमारा यह दोष है कि उनकी रचना प्रकाशित नहीं हुई. लो भाई नेकी भी की और कुएं में धकलने की तैयारी भी हमारी ही की गयी है . हम तो यही कहंगे कर्म करते रहिये फल की चिंता ना कीजिये . शुक्र है हमें कुर्सी का चस्का नहीं लगा और ना ही मक्खन की डालियाँ हमें भगवान बना सकीं . हम तो वह पैदल है जो सिर्फ चलना जानता है. बाकी के दौंव पेंच खेलने के लिए अन्य लोग है तो यह कार्य उन्ही के जिम्मे छोड़तें हैं. आसमान में चमक रहे फेसबूक के हर रंग का आनंद लेतें हैं . 
 -- शशि पुरवार 

Monday, August 3, 2015

-- दर्शन से प्रदर्शन तक






                      हिंदी काव्य की बहती  धारा में  जन जन ओत प्रोत है, हिंदी के बढ़ते चलन और योगदान के लिए सबका प्यारा फेसबुक अपनी महत्वपूर्ण भूमिका अदा कर रहा है. हिंदी की इतनी उपजाऊ धरती में कविताओं की लहलहाती फसल, हर उम्र के लोगों को आकर्षित कर रही है.किन्तु यह क्या देखते देखते यह लहलहाती फसल अचानक गाजर घास के जैसी फैलने लगी है. विद्वजन और साहित्यकार सभी चिंतित है, अचानक से इतने सारे रचनाकार कहाँ से आ गयें है. यह अच्छी बात है. फेसबुक एक शाला की तरह बन गया है. लिखना पढ़ना कोई बुरी आदत नहीं है, किन्तु यहाँ तो सभी ज्ञानी बड़े- बड़े कलमकारों को मात देने लेगे हैं. फेसबुकिया बुखार के चलते नौसिखिये वाह - वाही  सुन -सुन कर स्वयं  को ज्ञानी समझने लगें हैं, कोई भी रचनाकार क्यूँ न हो, रचना में नुक्स निकालना उनकी आदत में शुमार हो गया है, जो नौसिखिया हो, उसे सिखाओं भले ही आधा कचरा ज्ञान ही बाँटो, यदि कोई बड़ा साहित्यकार निकल जाये तो बत्तीसी  दिखा कर खिसक लो.  हाल ही में एक मजेदार  किस्सा  हुआ, हमारी रचना पर टिप्पणी के साथ साथ चाट बक्से में मीन मेख निकाली गयी --  शब्दों पर ज्ञान बाँटा गया, लय ताल की बारीकियाँ समझाई गयीं, खैर आदतन हमने विनम्र भाव से कहा --
 हमें तो ठीक प्रतीत हो रहा है. हम अपने साहित्यिक मित्रों से चर्चा करेंगे. साथ ही यह भी कह  दिया यह सभी प्रकाशित है, इस पर शोध किया गया है .फिर भी आपकी सलाह - शब्द पर विचार करेंगे .

जनाब गर्व में गुब्बारे की तरह फूल गए और सीना चौड़ा करके बोले -- मै बड़े बड़े रचनाकार और उस्तादों के साथ रहता हूँ आपको जरुर ज्ञान दूंगा .उनसे भी चर्चा करूँगा. 

         अगले दिन क्षमा के साथ  हमें  विजय घोषित कर दिया गया. जब हमने उन जनाब से पूछा आप क्या करतें है तो उत्तर मिला अभी २ रचना ही लिखी हैं. लिखना सीख रहें है. अब ऐसे ज्ञान पर हँसे या मूर्खता  पर शोध करें पर ज्ञान दे. ऐसा भी क्या डींगे हाँकना कि स्वयं पर सवालिया निशान खड़े हो जाएँ .

                   फेसबुक कोई अलग दुनियाँ नहीं है, जग के सारे जालसाज लोग भी इसमें शामिल है.  बड़े- बड़े रचनाकार ग़ालिब, गुलजार, नईम, जावेद अख्तर सभी यहाँ मौजूद है लेकिन दुःख की बात यह है कि इन सभी महान विभूतियों के साथ नए स्थापित रचनाकार की रचनाएँ किसी न किसी  लम्पट लोगों द्वारा उनके नाम से फेसबुक पर प्रकाशित मिल जाएँगी. फेसबुक क्या अन्य पत्र पत्रिकाओं में भी हुनर के यह गुर नजर आतें हैं , यानि चोरी भी और सीना जोरी भी. दुनिया गोल है प्राणी कहीं न कहीं टकरा ही जातें हैं. इसी प्रकार यह रचनाएँ  जब उसके असली रचनाकार के सम्मुख  किसी दूसरे के नाम से सामने दिखती है तो उसके दुःख की कोई सीमा नहीं होती है. फेसबुकी बुखार ने लोगों के होश उड़ा रखें हैं. ग्लैमर का नया क्षेत्र जहाँ आसमान भी है तो नए परिदों का आशियाँ भी बन गया है. दर्शन और प्रदर्शन सभी का बोल बाला है,  ऊँची दूकान और फीके पकवान की तरह अब  दर्शन  खोटे वाला मामला अब व्यंगकारों ने दाखिल कर लिया है . आगे आगे देखतें है यह फेसबुकिया  बुखार क्या क्या रंग दिखलाता है. इसी कड़ी में आपसे अगले महीने मिलूंगी तब तक के लिए हम इस आसमान की रंगीनी बारिश का आनंद लेने जातें हैं.

                          -- शशि पुरवार
अट्ठहास में प्रकाशित व्यंग साभार।
  
 

तोड़ती पत्थर

  तोड़ती पत्थर  वह तोड़ती पत्थर; देखा मैंने उसे इलाहाबाद के पथ पर- वह तोड़ती पत्थर। कोई न छायादार पेड़ वह जिसके तले बैठी हुई स्वीकार; श्याम त...

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