Thursday, December 20, 2018

हम आंगन के फूल

आंगन के हर फूल से,  करो न इतना मोह 
जीवन पथ में एक दिन, सहना पड़े बिछोह 
सहना पड़े बिछोह, रीत है जग की न्यारी 
होती हमसे दूर, वही जो दिल को प्यारी 
कहती शशि यह सत्य, रंग बदलें उपवन के 
फूल हुए सिरमौर, ना महकते आंगन के 

चाहे कितनी दूर हो, फिर भी दिल के पास 
राखी पर रहती सदा, भ्रात मिलन की आस 
भ्रात मिलन की आस, डोर रेशम की जोड़े 
मन में है विश्वास , द्वार से मुख ना मोड़े 
कहती शशि यह सत्य, मथो तुम मन की गाहे 
इक आँगन के फूल, मिलन हो जब हम चाहें 

शशि पुरवार




तोड़ती पत्थर

तोड़ती पत्थर वह तोड़ती पत्थर; देखा मैंने उसे इलाहाबाद के पथ पर- वह तोड़ती पत्थर। कोई न छायादार पेड़ वह जिसके तले बैठी हुई स्वीकार; श्याम तन,...

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