Thursday, November 28, 2019

गाअो खुशहाली का गाना




चला बटोही कौन दिशा में
पथ है यह अनजाना
जीवन है दो दिन का मेला
कुछ खोना कुछ पाना

तारीखों पर लिखा गया है
कर्मों का सब लेखा
पैरों के छालों को रिसते
कब किसने देखा

भूल भुलैया की नगरी में
डूब गया मस्ताना
जीवन है दो दिन का मेला
कुछ खोना कुछ पाना

मृगतृष्णा के गहरे बादल
हर पथ पर छितराए
संयम का पानी ही मन की
रीती प्यास बुझाए

प्रतिबंधो के तट पर गाअो
खुशहाली का गाना
जीवन है दो दिन का मेला
कुछ खोना कुछ पाना

सपनों का विस्तार हुआ, तब
बाँधो मन में आशा
पतझर का मौसम भी लिखता
किरणों की परिभाषा

भाव उंमगों के सागर में
गोते खूब लगाना
जीवन है दो दिन का मेला
कुछ खोना कुछ पाना


शशि पुरवार 

Thursday, November 14, 2019

नज्म के बहाने

१ नज्म के बहाने

याद की सिमटी हुई यह गठरियाँ
खोल कर हम दिवाने हो गए
रूह भटकी कफ़िलों में इस तरह
नज्म गाने के बहाने हो गए।

बंद पलकों में छुपाया अश्क को
सुर्ख अधरों पर थिरकती चांदनी
प्रीत ने भीगी दुशाला ओढ़कर
फिर जलाई बंद हिय में अल गनी

इश्क के ठहरे उजाले पाश में
धार से झंकृत तराने हो गए
रूह भटकी कफ़िलों में इस तरह
नज्म गाने के बहाने हो गए।


गंध साँसों में महकती रात दिन
विगत में डूबा हुआ है मन मही
जुगनुओं सी टिमटिमाती रात में
लिख रहा मन बात दिल की अनकही

गीत गा दिल ने पुकारा आज फिर
जिंदगी के दिन सुहाने हो गए
रूह भटकी कफ़िलों में इस तरह
नज्म गाने के बहाने हो गए।

भाव कण लिपटे नशीली रात में
मौन मुखरित हो गई संवेदना
इत्र छिड़का आज सूखे फूल पर
फिर गुलाबों सी दहकती व्यंजना

डायरी के शब्द महके इस कदर
सोम रस सब मय पुराने हो गए
रूह भटकी कफ़िलों में इस तरह
नज्म गाने के बहाने हो गए।

याद की सिमटी हुई यह गठरियाँ
खोल कर हम दिवाने हो गए। ..!
--


शशि पुरवार 


Tuesday, November 12, 2019

जोगनी गंध - संवेदनाओं की अनुभूति - पुस्तक समीक्षा

😊😊
जोगनी गंध पर दूसरी समीक्षा आ धरणीधर मणि त्रिपाठी जी ने  की है ,आपका हृदय से धन्यवाद ,आपके स्नेह से अभिभूत हूँ
🙏🙏😊
समीक्षा
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("जोगनी गंध")
अभिव्यक्ति के प्रशस्त धरातल पर खडा़ विवेकशील व्यक्ति मानवीय सराकारों, संवेदनाओं एवं अनुभूतियों को जब अपने विशिष्ट अंदाज़ में कलमबद्ध करता है तो प्रस्तुति का एक आलीशान महल सा खडा़ प्रतीत होता है जिसके स्तम्भ, गलियारे, बुर्ज़, दीवारें एवं दालान अपनी-अपनी पहचान और महत्व रेखांकित करते प्रतीत होते हैं। साहित्य जगत में अपनी विशिष्ट स्थान बनाने वाली प्रसिद्ध कवयित्री आदरणीया शशि पुरवार का हाइकु संग्रह "जोगनी गंध"इसका एक उदाहरण है।जो कि न केवल सारगर्भित संदेश अपितु प्रेरणा का संवाहक भी बना प्रतीत होता है।


काँच से छंद
पत्थरों पर मिलते
बिसरे बंद
कितनी गूढ बात कह डाली है मानवीय रिश्ते पर खूबसूरत बिम्बों के द्वारा बेबाक रंग उकेर कर रख दिया है शशि जी ने.


संग्रह के प्रत्येक गुम्फित हाइकु रचना पुष्प विद्या वैषि्ध्य के मनोगाही 5-7-5 पंक्तियों में रची बसी सुगंध से वातावरण को सुवासित प्रबल आकर्षण संजोए हुए है।मानव जीवन प्रकृति पर ही आधारित है संग्रह में प्रकृति का जाज्वल्य रक्तिम रंग बिखरे पडे़ हैं।


अभिव्यक्ति का लक्ष्य जब व्यक्ति के अंतस में जन्म लेता है तो उसके पीछे एक गन्तव्य निहित होता है एक भाव एक उत्कृष्टता निहित होती है, शशि जी के संग्रह में ये बातें स्पष्ट दृष्टिगोचर होती है।यही भाव जब पाठक और श्रोतागण तक पहुँचते हैं तो वे अपने आपको एक-एक पंक्ति के साथ बँधा हुआ पाते हैं।इन हाइकु को देखें:-


सूखे हैं फूल
किताबों में मिलती
प्रेम की धूल
खा़मोश साथ
अवनि अंबर का
प्रेम मिलन
क्षितिज को किस तरह परिभाषित कर दिया कल्पनाशीलता और बिम्ब के द्वारा।


जोगनी बंध
फूलों की घाटी में
शोध प्रबंध


आज सामाजिक ढाँचा इस क़दर बिखरा हुआ है कि अपनों के लिए भी समय नहीं सब व्यर्थ की भागदौड़, उत्कट मीमांसा, लोभ, स्वार्थ के वशीभूत मानव दिनभर प्रयासरत रहता है और क्रमश: जब अपने नीड में वापस आता है तो नितांत नीरवता का सामना करता है, प्रस्तुत हाइकु देखें:-


एकाकीपन
धुँआ धुँआ जलता
दीवानापन


शशि जी का यह संग्रह तमाम विषयों को छूता हुआ पाठक को वाह कर देने पर विवश कर देता है।अल्प शब्दों में काव्य रचना और उसमें भाव बिम्ब डाल पाना निश्चित रूप से दुरूह कार्य है, परंतु आप पूरी पुस्तक पढने के बाद पाएंगे वे इस प्रयास में पूर्णरूपेण सफल हुई हैं।यह पुस्तक न सिर्फ़ हाइकु के विज्ञ लोगों को पसंद आएगी अपितु नवांकुर कवियों को हाइकु सीखने में भी सहायक होगी।आदरणीया शशि जी के लिए मेरी तरफ़ से पुस्तक की अपार सफलता के लिए अनंत शुभकामनाएं ।


धरणीधर मणि त्रिपाठी
कवि, एवं भू पू सैन्याधिकारी

तोड़ती पत्थर

तोड़ती पत्थर वह तोड़ती पत्थर; देखा मैंने उसे इलाहाबाद के पथ पर- वह तोड़ती पत्थर। कोई न छायादार पेड़ वह जिसके तले बैठी हुई स्वीकार; श्याम तन,...

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