Sunday, March 29, 2020

21 दिन जिंदगी बचाने के लिए




यह २१दिन जिंदगी को बचाने की जद्दोजहद है जिसमें संयम के साथ घर पर रहकर हम जिंदगी को बचा सकते हैं, संक्रमण के साथ डर के भाव भी लंबे होते जा रहे हैं, देश विदेश में हुई तबाही के कारण लोगों के मन में डर बढ़ने लगा है कि कल क्या होगा ? लेकिन यह डरने का नहीं,  संभलकर जंग जीतने का समय है, घर में रहकर ही हम अपनों को बचा सकते है ।
एक तरह से देखा जाए तो वक्त का यह दौर आज पुराने दिनों की याद दिला रहा है। जब लोगों की महत्वाकांक्षाएं उन पर हावी नहीं थी, लोगों के पास एक दूसरे से मिलने के लिए समय था । मित्रों व परिजनों के साथ शामें व्यतीत हुअा करतीं थी। प्राचीन सभ्यता और संस्कृति की मजबूत जड़ें फल फूल रहीं थी।  फिर समय के बदलते चक्र में जिंदगी दौड़ने लगी। वह अपनों से भी दूर होती गई । समय के साथ दौड़ती हुई जिंदगी के कदम आज कोरोना महामारी के कारण रूक से गये।
संपूर्ण विश्व, मानव जाति वायरस के प्रकोप से लड़ रही है। अर्थव्यवस्था धड़ाम से गिर पड़ी है। देशव्यापी लॉक डाउन है ।  विषम परिस्थितियाँ है । किसी ने नही सोचा होगा कि एक वायरस मानव के बढ़ते कदमों को रोक सकता है। समय के साथ इंसान मृगतृष्णा की दौड़ में इतना लिप्त हो गया कि रुके हुए कदम उसे बेचैन कर रहें हैं ।
हर वर्ग के लोगों की अपनी अलग समस्याएं  हैं। वर्ग का एक हिस्सा जिंदगी को बचाने के प्रयास में स्वयं की जान जोखिम में डालकर सेवारत है । वहीं कुछ लोग अभी भी समय की नजाकत को नहीं समझ रहे हैं । अपने फर्ज के कारण सेवारत कर्मचारियों को बाहर निकलना आवश्यक है ।  लेकिन कुछ लोग अभी भी की गंभीरता को हल्के से ले रहे हैं। जिसका परिणाम घातक हो सकता है।
रोज लाओ व रोज खाओ वाली संस्कृति के कारण आज घरों में राशन पानी की समस्या हो रही है । जरूरत के सामान बाजार में उपलब्ध होने के बावजूद लोग अकारण घर से बाहर निकल रहे हैं। सबसे ज्यादा निम्न वर्ग व दिहाडी मजदूृर प्रभावित हो रहा है । जिनके पास रहने के लिए छत नहीं है व खाने के लिए भोजन नहीं है। भूख से बड़ा संकट क्या हो सकता है ।
उनकी भूख ने महामारी के डर पर विजय पा ली है । लॉक डाउन के कारण कामकाज ठप्प है । ऐसे में यह वर्ग पलायन को ही उचित मार्ग समझ रहा है।  असुविधा व साधन की कमी की वजह से पलायन करना उनकी मजबूरी है और यह मजबूरी उनकी जान जोखिम में डाल रही है। सड़कों पर उंगली भी संक्रमण की साइकिल तोड़ने में नाकाम साबित होगी, समस्या बेहद गंभीर है। 
परम सत्य है कि पापी भूख से बड़ी कोई बीमारी नहीं होती है।  यह कदम उनकी जिंदगी को खतरे में डाल रही है व गांवों में भी संक्रमण फैल सकता है। जिंदगी की मार दोनों तरफ से है। लेकिन जिंदगी को बचाना ही बेहद जरूरी है। 
सरकार मदद करने का पूर्ण प्रयास कर रही है कि संक्रमण के कदम रोके जाएं व निम्न वर्ग की समस्या को दूर किया जाए।  बहुत सी समाज सेवी संस्थाएं भोजन उपलब्ध कराने के लिए आगे आई है ऐसे में हमारी भी नैतिक जिम्मेदारी है कि हम भी उनका पूर्ण सहयोग करें। 
आने वाला समय सभी के लिए कठिन परीक्षा की घड़ी है।  कोरोना वायरस तीसरे सप्ताह में पहुंचने वाला है । जहां से अन्य देशों में तबाही मची थी।  एक एक पल जिंदगी के लिए भारी होगा। 
ऐसे समय स्वयं को सुरक्षित रखना बहुत आवश्यक है यह संपूर्ण मानव जाति के अस्तित्व का सवाल है ।  21 दिन घर में रहना लोगों के लिए बहुत मुश्किल हो सकता है किंतु यह एक सुरक्षा कवच है, झेलना हमारे लिए हितकर है। 
इसे सकारात्मक नजरिए से देखें कि कोरोनावायरस के चक्र को उल्टा घुमाना शुरू कर दिया है।  आज अपनों के साथ समय व्यतीत करने का समय दिया है अपनों से जोड़ा है । जो कभी एक दूसरे का हाल-चाल पूछना भूल गए थे अाज अपनों से पुन: जुड़े हैं । यह कैद नहीं,  सुरक्षित भविष्य का संग्रहण है। 
भटकती हुई जिंदगी व मन को संयमित करके हम इन पलों को खुशहाल बना सकते हैं। जब तक आप घर में है आप सुरक्षित हैं और जो बेघर हैं उन्हें बचाने का प्रयास सरकार कर रही है । पैसा नहीं हमारा सहयोग ही हमें काल का ग्रास बनने से रोक सकता है। अपने डर पर काबू पाए ।  लोगों की भ्रामक बातों से बचें । सकारात्मकता का एक एक अंश जिंदगी को बचा सकता है। समाज के प्रति हमारी भी नैतिक जिम्मेदारी है कि जो सेवार्थ की भावना दिखा रहे हैं हम उनके काम में बाधा उत्पन्न करके उनकी समस्या को विकराल ना बनाएं।
प्रधानमंत्री राहत कोष में मदद के लिए कुछ संस्थाएं, बड़ी कंपनियां एवं उच्च वर्ग सामने आ रहा है।  राहत का यह पैसा तभी काम आएगा जब कोविड से लड़ने के लिए हम अपना घर पर रहकर उन्हें सहयोग दें। इस जैविक संक्रमण को रोकने के लिए घर पर रहना ही सबसे बड़ा हथियार होगा। 
इसलिए सकारात्मक रहे, सुरक्षित रहे , बेहद आवश्यक होने पर यदि बाहर जाते हैं तो लोगों से 2 मीटर का अंतर रखें। कोरोनावायरस को हराएं और जीवन को बचाएं ।  हमें जीवन को बचाने में अपना योगदान देना है। हमारी एक छोटी सी कोशिश महामारी को फैलने से रोक सकती है , जीवन को बचा सकती है।

 shashi purwar 

Friday, March 6, 2020

आखिर कब तक ...

 

आखिर कब तक दर्द सहेंगी
क्यों मरती रहेंगी बेटियाँ
अपराधों के बढते साए
पन्नों सी बिखरती बेटियाँ

कौन बचाएगा बेटी को
भेड़ियों और खूंखार से
नराधर्म की उग्र क्रूरता
दरिंदों और हत्यारों से
भोग वासना, मन के कीड़े
कैंसर का उपचार करो
जो नारी की अस्मत लुटे
वह रावण संहार करो

दूजों की कुंठा का प्रतिफल
आपद से गुजरती बेटियाँ
आखिर कब तक दर्द सहेंगी
क्यों मरती रहेंगी बेटियां

अदालतों में लंबित होती
तारीखों पर सुनवाई
दोषी मांगे दया याचिका
लड़े जीवन से तरुणाई
आज प्रकृति न्याय मांगती
सुरक्षा, अहम सवाल है
तत्व समाज व देश के लिए
बर्बरता, जन्य दीवाल है

खौफनाक आँखों में मंजर
पर, भय से सिहरती बेटियाँ
आखिर कब तक दर्द सहेंगी
क्यों मरती रहेंगी बेटियाँ

लावारिस सडकों पर भटके
मिली न मुझको मानवता
कायरता के शिविर लगे है
अपराधों का फंदा कसता
चुप्पी तोडो, शोर मचाओ 
निज तूफानों को आने दो
दोषी का सर कलम करो
स्वर कोलाहल बन जाने दो

भय मुक्त आकाश बनाओ 
हिरनों सी विचरती बेटियाँ
आखिर कब तक दर्द सहेंगी
क्यों मरती रहेंगी बेटियाँ
अपराधों के बढते साए
पन्नों सी बिखरती बेटियाँ

शशि पुरवार

तोड़ती पत्थर

तोड़ती पत्थर वह तोड़ती पत्थर; देखा मैंने उसे इलाहाबाद के पथ पर- वह तोड़ती पत्थर। कोई न छायादार पेड़ वह जिसके तले बैठी हुई स्वीकार; श्याम तन,...

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