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Tuesday, March 8, 2022

बाँधो न नाव इस ठाँव, बंधु! निराला







आज आपके साथ साझा करते हैं निराला जी का बेहद सुंदर नवगीत जो प्रकृति के ऊपर लिखा गया है, लेकिन यह किसी नायिका का प्रतीत होता है. 

निराला

बाँधो न नाव इस ठाँव, बंधु!
पूछेगा सारा गाँव, बंधु!


यह घाट वही जिस पर हँसकर,
वह कभी नहाती थी धँसकर,
आँखें रह जाती थीं फँसकर,
कँपते थे दोनों पाँव बंधु!


वह हँसी बहुत कुछ कहती थी,
फिर भी अपने में रहती थी,
सबकी सुनती थी, सहती थी,
देती थी सबके दाँव, बंधु!

Sunday, March 6, 2022

महक उठी अँगनाई - shashi purwar







चम्पा चटकी इधर डाल पर
महक उठी अँगनाई
उषाकाल नित
धूप तिहारे चम्पा को सहलाए
पवन फागुनी लोरी गाकर
फिर ले रही बलाएँ

निंदिया आई अखियों में और
सपने भरे लुनाई .

श्वेत चाँद सी
पुष्पित चम्पा कल्पवृक्ष सी लागे
शैशव चलता ठुमक ठुमक कर
दिन तितली से भागे

नेह अरक में डूबी पैंजन -
बजे खूब शहनाई.

-शशि पुरवार

Sunday, February 27, 2022

चलना हमारा काम है- शिवमंगल सिंह सुमन

 नमस्कार मित्रों

आज से एक नया खंड प्रारंभ कर रही हूं जिसमें हम हमारे हस्ताक्षरों की खूबसूरत रचनाओं का आनंद लेंगे.

इसी क्रम में आज शुरुआत करते हैं . शिवमंगल सिंह सुमन की रचना "चलना हमारा काम है ", जीवन को जोश ,  गति व हौसला प्रदान करती हुई एक रचना 

  



गति प्रबल पैरों में भरी
फिर क्यों रहूं दर दर खडा
जब आज मेरे सामने
है रास्ता इतना पडा
जब तक न मंजिल पा सकूँ,
तब तक मुझे न विराम है,
चलना हमारा काम है।

कुछ कह लिया, कुछ सुन लिया
कुछ बोझ अपना बँट गया
अच्छा हुआ, तुम मिल गई
कुछ रास्ता ही कट गया
क्या राह में परिचय कहूँ,
राही हमारा नाम है,
चलना हमारा काम है।

जीवन अपूर्ण लिए हुए
पाता कभी खोता कभी
आशा निराशा से घिरा,
हँसता कभी रोता कभी
गति-मति न हो अवरूद्ध,
इसका ध्यान आठो याम है,
चलना हमारा काम है।

इस विशद विश्व-प्रहार में
किसको नहीं बहना पडा
सुख-दुख हमारी ही तरह,
किसको नहीं सहना पडा
फिर व्यर्थ क्यों कहता फिरूँ,
मुझ पर विधाता वाम है,
चलना हमारा काम है।

मैं पूर्णता की खोज में
दर-दर भटकता ही रहा
प्रत्येक पग पर कुछ न कुछ
रोडा अटकता ही रहा
निराशा क्यों मुझे?
जीवन इसी का नाम है,
चलना हमारा काम है।

साथ में चलते रहे
कुछ बीच ही से फिर गए
गति न जीवन की रूकी
जो गिर गए सो गिर गए
रहे हर दम,
उसी की सफलता अभिराम है,
चलना हमारा काम है।

फकत यह जानता
जो मिट गया वह जी गया
मूंदकर पलकें सहज
दो घूँट हँसकर पी गया
सुधा-मिक्ष्रित गरल,
वह साकिया का जाम है,
चलना हमारा काम है।


शिवमंगल सिंह सुमन


Saturday, January 2, 2021

उम्मीद के ठिकाने

 

साल नूतन आ गया है 
नव उमंगों को सजाने 
आस के उम्मीद के फिर 
बन रहें हैं नव ठिकाने

भोर की पहली किरण भी 
आस मन में है जगाती
एक कतरा धूप भी, लिखने 
लगी नित एक पाती

पोछ कर मन का अँधेरा 
ढूँढ खुशियों के खजाने
साल नूतन आ गया है
नव उमंगों को सजाने

रात बीती, बात बीती 
फिर कदम आगे बढ़ाना 
छोड़कर बातें विगत की 
लक्ष्य को तुम साध लाना

राह पथरीली भले ही 
मंजिलों को फिर जगाने 
साल नूतन आ गया है
नव उमंगों को सजाने

हर पनीली आँख के सब 
स्वप्न पूरे हों हमेशा 
काल किसको मात देगा 
जिंदगी का ठेठ पेशा

वक़्त को ऐसे जगाना 
गीत बन जाये ज़माने ​​
साल नूतन आ गया है
नव उमंगों को सजाने

- शशि पुरवार   


Friday, March 6, 2020

आखिर कब तक ...

 

आखिर कब तक दर्द सहेंगी
क्यों मरती रहेंगी बेटियाँ
अपराधों के बढते साए
पन्नों सी बिखरती बेटियाँ

कौन बचाएगा बेटी को
भेड़ियों और खूंखार से
नराधर्म की उग्र क्रूरता
दरिंदों और हत्यारों से
भोग वासना, मन के कीड़े
कैंसर का उपचार करो
जो नारी की अस्मत लुटे
वह रावण संहार करो

दूजों की कुंठा का प्रतिफल
आपद से गुजरती बेटियाँ
आखिर कब तक दर्द सहेंगी
क्यों मरती रहेंगी बेटियां

अदालतों में लंबित होती
तारीखों पर सुनवाई
दोषी मांगे दया याचिका
लड़े जीवन से तरुणाई
आज प्रकृति न्याय मांगती
सुरक्षा, अहम सवाल है
तत्व समाज व देश के लिए
बर्बरता, जन्य दीवाल है

खौफनाक आँखों में मंजर
पर, भय से सिहरती बेटियाँ
आखिर कब तक दर्द सहेंगी
क्यों मरती रहेंगी बेटियाँ

लावारिस सडकों पर भटके
मिली न मुझको मानवता
कायरता के शिविर लगे है
अपराधों का फंदा कसता
चुप्पी तोडो, शोर मचाओ 
निज तूफानों को आने दो
दोषी का सर कलम करो
स्वर कोलाहल बन जाने दो

भय मुक्त आकाश बनाओ 
हिरनों सी विचरती बेटियाँ
आखिर कब तक दर्द सहेंगी
क्यों मरती रहेंगी बेटियाँ
अपराधों के बढते साए
पन्नों सी बिखरती बेटियाँ

शशि पुरवार

Thursday, November 28, 2019

गाअो खुशहाली का गाना




चला बटोही कौन दिशा में
पथ है यह अनजाना
जीवन है दो दिन का मेला
कुछ खोना कुछ पाना

तारीखों पर लिखा गया है
कर्मों का सब लेखा
पैरों के छालों को रिसते
कब किसने देखा

भूल भुलैया की नगरी में
डूब गया मस्ताना
जीवन है दो दिन का मेला
कुछ खोना कुछ पाना

मृगतृष्णा के गहरे बादल
हर पथ पर छितराए
संयम का पानी ही मन की
रीती प्यास बुझाए

प्रतिबंधो के तट पर गाअो
खुशहाली का गाना
जीवन है दो दिन का मेला
कुछ खोना कुछ पाना

सपनों का विस्तार हुआ, तब
बाँधो मन में आशा
पतझर का मौसम भी लिखता
किरणों की परिभाषा

भाव उंमगों के सागर में
गोते खूब लगाना
जीवन है दो दिन का मेला
कुछ खोना कुछ पाना


शशि पुरवार 

Thursday, November 14, 2019

नज्म के बहाने

१ नज्म के बहाने

याद की सिमटी हुई यह गठरियाँ
खोल कर हम दिवाने हो गए
रूह भटकी कफ़िलों में इस तरह
नज्म गाने के बहाने हो गए।

बंद पलकों में छुपाया अश्क को
सुर्ख अधरों पर थिरकती चांदनी
प्रीत ने भीगी दुशाला ओढ़कर
फिर जलाई बंद हिय में अल गनी

इश्क के ठहरे उजाले पाश में
धार से झंकृत तराने हो गए
रूह भटकी कफ़िलों में इस तरह
नज्म गाने के बहाने हो गए।


गंध साँसों में महकती रात दिन
विगत में डूबा हुआ है मन मही
जुगनुओं सी टिमटिमाती रात में
लिख रहा मन बात दिल की अनकही

गीत गा दिल ने पुकारा आज फिर
जिंदगी के दिन सुहाने हो गए
रूह भटकी कफ़िलों में इस तरह
नज्म गाने के बहाने हो गए।

भाव कण लिपटे नशीली रात में
मौन मुखरित हो गई संवेदना
इत्र छिड़का आज सूखे फूल पर
फिर गुलाबों सी दहकती व्यंजना

डायरी के शब्द महके इस कदर
सोम रस सब मय पुराने हो गए
रूह भटकी कफ़िलों में इस तरह
नज्म गाने के बहाने हो गए।

याद की सिमटी हुई यह गठरियाँ
खोल कर हम दिवाने हो गए। ..!
--


शशि पुरवार 


Monday, July 29, 2019

पुष्प कुटज के


श्वेत चाँदनी पंख पसारे 
उतरी ज्यों उपवन में 
पुष्प कुटज के जीवट लगते 
चटके सुन्दर, वन में

श्वेत श्याम सा रूप सलोना 
फूल सुगन्धित काया 
काला कड़वा नीम चढ़ा है 
ग्राही शीतल माया
छाल जड़ें और बीज औषिधि 
व्याधि हरे जीवन में 
पुष्प कुटज के जीवट लगते 
चटके सुन्दर, वन में

बियावन जंगल के साथी 
पर्वत तक छितराये 
आग उगलती जेठ धूप में 
खिलकर जश्न मनाये
वृक्ष अजेय जीवनी ताकत
साधक संजीवन में 
पुष्प कुटज के जीवट लगते 
चटके सुन्दर, वन में

छोटा द्रुम फूलों से लकदक 
अवमानित सा रहता 
पाषाणों का वक्ष चीरकर 
रस का झरना बहता
चट्टानों को चीर बनाते 
ये शिवलोक विजन में 
पुष्प कुटज के जीवट लगते 
चटके सुन्दर, वन में
शशि पुरवार





Tuesday, May 7, 2019

शीशम रूप तुम्हारा

आँधी तूफानों से लड़कर 
हिम्मत कभी न हारा 
कड़ी धूप में तपकर निखरा 
शीशम रूप तुम्हारा 

अजर अमर है इसकी काया 
गुण सारे अनमोल 
मूरख मानव इसे काटकर   
मेट रहा भूगोल  

पात पात से डाल डाल तक 
शीशम सबसे न्यारा 
आँधी तूफानों से लड़कर 
हिम्मत कभी न हारा।
 

धरती का यह लाल अनोखा 
उर्वर करता आँचल 
लकड़ी का फर्नीचर घर में 
सजा रहें है हर पल 

जेठ दुपहरी शीतल छाया 
शीशम बना सहारा 
आँधी तूफानों से लड़कर 
हिम्मत कभी न हारा।  

सदा समय के साथ खड़ी थी 
पत्ती औ शाखाएं 
रोग निवारक गुण हैं इसमें 
 सतअवसाद भगाएं 

कुदरत का वरदान बना है 
शीशम प्राण फुहारा  
आँधी तूफानों से लड़कर 
हिम्मत कभी न हारा।  

वृक्ष संचित जल से ही मानव 
अपनी प्यास बुझाता 
प्राण वायु की, धन दौलत का 
खुद ही भक्षक बन जाता 

हरियाली की अनमोल धरोहर 
शीशम करे इशारा 
आँधी तूफानों से लड़कर 
हिम्मत कभी न हारा। 

शशि पुरवार 

Thursday, March 21, 2019

भीगी चुनरी चोली

फागुन की मनुहार सखी री
उपवन पड़ा हिंडोला 
चटक नशीले टेसू ने फिर 
प्रेम रंग है घोला 

गंध पत्र ऋतुओं ने बाँटे 
मादक सी पुरवाई  
पतझर बीता, लगी  उमड़ने 
मौसम  की अंगड़ाई 

छैल छबीले रंग फाग के 
मन भी मेरा डोला 
चटक नशीले टेसू ने फिर 
प्रेम रंग है घोला। 

राग बसंती,चंग बजाओ 
उमंगो की पिचकारी 
धरती से अम्बर तक गूंजे 
खुशियों की किलकारी

अनुबंधों का प्रणय निवेदन
फागुन का हथगोला 
चटक नशीले टेसू ने फिर 
प्रेम रंग है घोला। 
  

मनमोहक रंगो से खेलें 
खूनी ना हो होली 
द्वेष मिटाकर जश्न मनाओ 
भीगी चुनरी चोली 

चंचल हिरणी के नैनो में 
सुख का उड़न खटोला 
चटक नशीले टेसू ने फिर 
प्रेम रंग है घोला 
शशि पुरवार

आपको होली की रंग भरी हार्दिक शुभकामनाएँ


लोकमत समाचार महाराष्ट्र में आज प्रकशित 

Monday, January 7, 2019

फगुनाहट ले आना


नए साल तुम कलरव वाली 
इतराहट ले आना 
आँगन के हर रिश्तें में 
गरमाहट ले आना


दुर्दिन वाली काली छाया फिर 
घिरने ना पायें 
सोना उपजे खलियानों में 
खुशहाली लहरायें

सबकी किस्मत हो गुड़ धानी
 
नरमाहट ले आना 
नए साल तुम कलरव वाली 
इतराहट ले आना


हर मौसम में फूल खिलें पर
बंजर ना हो धरती 
फुटपाथों पर रहने वाले 
आशा कभी न मरती

धूप जलाए, नर्म छुअन सी 
फगुनाहट ले आना 
नए साल तुम कलरव वाली 
इतराहट ले आना

ठोंगी कपटी लोगों के तुम 
टेढ़े ढंग बदलना 
बूढ़े घर की दीवारों के 
फीके रंग बदलना

जर्जर होती राजनीति की 
कुछ आहट ले आना 
नए साल तुम कलरव वाली 
इतराहट ले आना

भाग रहे सपनों के पीछे 
बेबस होती रातें 
घर के हर कोने में रखना 
नेह भरी सौगातें

धुंध समय की गहराए पर 
मुस्काहट ले आना 
नए साल तुम कलरव वाली 
इतराहट ले आना

आँगन के हर रिश्तों में 
गरमाहट ले आना 

शशि पुरवार 

समीक्षा -- है न -

  शशि पुरवार  Shashipurwar@gmail.com समीक्षा है न - मुकेश कुमार सिन्हा  है ना “ मुकेश कुमार सिन्हा का काव्य संग्रह  जिसमें प्रेम के विविध रं...

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