सपने

सपने मेरे नहीं आपके सपने, हमारे सपने, समाज में व्याप्त विसंगतियां मन को व्यथित करती हैं. संवेदनाओं की पृष्ठभूमि से जन्मी रचनाएँ मेरीनहीं आपकी आवाज हैं. इन आँखों में एक ख्वाब पलता है, सुकून हो हर दिल में इक दिया आश का जलता है. - शशि.
शशि का अर्थ है -- चन्द्रमा, तो चाँद सी शीतलता प्रदान करने का नाम है जिंदगी .
शब्दों की मिठास व रचना की सुवास ताउम्र अंतर्मन महकातें हैं. मेरे साथ सपनों की हसीन वादियों में आपका स्वागत है.

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Saturday, October 1, 2016

चोर की दाढ़ी में तिनका

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मुस्कुराईये कि आप फेसबुक पर हैं, गुनगुनाईये कि आप फेसबुक पर हैं, कुछ हसीन लम्हे कुछ चंचल शोखियाँ, कहीं नखरा कहीं गुमानियाँ, एक सपना जो जीवन को हसीन बना रहा है, कहीं ख्वाब जगा रहा हैं, कहीं दिल सुलगता है. कहीं आग जलती है तो रोटियां भी सिकती हैं. जिंदगी तेरे बिना कुछ भी नहीं .... दुनियाँ इतनी हसीन है यह सोचा भी नहीं. एक नशा जो नशा बनकर होश उडाता है तो कहो होश जगाता है. देखा जाये तो यह चोर है दिल का चोर जो आपका चैन लूटकर खुद चैन की साँस ले रहा है. एक ऐसा चोर जिसकी दाढ़ी में तिनका भी है।  कहीं चोर की दाढ़ी में कहीं तिनका तो नहीं !

           आज शर्मा जी  आज सुबह से छत को नापने में लगे हुए थे। कदमों की मार से छत बेहाल थी, शर्मा जी के हाल -बेहाल के कारन का यो पता नहीं किन्तु शर्मा जी की पत्नी की जासूसी निगाह कुछ ज्यादा की गोल घूम रही थी, दिमाग ताड़ गया था कि  दिल में आग भभक रही है, कहीं कुछ खिचड़ी पकी है नहीं तो दाल ही काली है। आग में घी तो डाला तो स्वयं के हाथ जलने का भय था. किन्तु शर्मा जी के पेट की आग बुझाकर उसे रबड़ी बनाने का मन जरूर बना लिया था, नहीं तो यह आग उन्हें भी झुलझा सकती थी . रसोई से भजिये तलने की खुशबु बड़ी बड़ी उड़ाने भर रही थी. पड़ोस के वर्मा जी की नाक जैसे कुत्ते की तरह उस खुशबु के पीछे लग गयी। आज  सुबह से छत नापने की आवाज से  सारे कमरों में जैसे तबले की थाप सरगम बजा रही थी तिस  पर रसोई से शर्मा जी की पत्नी की गुनगुनाहट अपना हाल खुशबु के संग भेजकर जैसे सीने पर नश्तर चला रही हो !
  पड़ोस के वर्मा जी से रहा नहीं गया तो पूछ बैठे ---क्या हुआ शर्मा जी क्यों बेचारी छत पर मूंग दल रहे हो। भाभी जी कुछ ख़ास तैयारी कर रही है जाओ भाई. मजे करो हो सके तो एक प्लेट हमें भी धीरे से सरका देना, ससुरी जबान से रहा नहीं जा रहा है.
    शर्मा जी -- क्यों  मन में कोई  लड्डू रहा है , लड्डू न हुआ कोई बम हुआ। यह आग तुम्हारी ही लगायी हुई थी. तुम्हारी लार टपक रही है . अरे भागवान की    नज़रे किसी पुलिस वाले की दी हुई जागीर है, झट रपट लेने लगेंगी.
वर्मा  – काहे का हुआ? काहे लाल पीले हो रहे हो, आज किसी से बात नहीं हुई का? जाओ  तनिक एक दो लाइन छाप दो, सब् मूड अच्छा हो जायेगा . हमरा साथी फेसबुक है ना!
शर्मा जी --- बस करो नामाकुल, काहे इस बुढापे में तारे दिखा रहे हो. अरे तुमने भरी जवानी का फोटो लगाकर हमें अपने दिन याद दिला दिए. तो हमने भी दिल को जवान कर लिया.
वर्मा जी – तो क्या हुआ, जिंदगी आखिरी साँस तक जिओ .... दिल जवान ही होना चाहिए.

शर्मा – अरे साँस वांस छोडो. हमारी तो साँस निकलना बाकी है, सुनने में है कि फेसबुक की सारी चाट और मसाला ओपन हो जायेगा, वैसे भी राज कब था? मसाले का आनंद लेने हेतु कई सिपाई मिसाइल के साथ तैयार है, कई कारावास में जाने के भय में गुम है .. चोर की दाढ़ी में तिनका।   अब क्या होगा कालिया। सबको चाट की प्लेट हाथ में थमा दी जाएगी तब खूब खाना
वर्मा – हमें कालिया बोला भक .....हुन्न्न    ऐसा क्या किया जो दुम दबाकर भाग रहे हो. जरुर कुछ घोटाला किया होगा,तुम्हरे  साथ हमरी की नाक ख़राब हो जाएगी . किसने कहा था इधर उधर मुँह मारो, जीभ लपलपाओ ....
शर्मा – बस भी करो,जाओ जाओ ........ बड़े आये ब्रेड पर मख्खन लगाकर खाने .! ऐसा कुछ नहीं कहा, दो शब्द प्रेम की जलेबी खा ली तो जुर्म हो गया.
वर्मा – तनिक उम्र का तो ख्याल रखा होता, दुनिया गोल है, अब भजिये खा लो, अच्छे से तल गए होंगे
शर्मा जी -- जैसे ठन्डे पानी से नहाकर बाहर आयें हो. का करें पत्नी शेरनी की तरह खूंखार दहाड़ मारती है, दूर से बैठकर जलेबी खा ली तो  शुगर की बीमारी भी इस फेसबुकियो को लग गयी है.
  किन्तु हम का करे यही तो कहता है – अंखियों से गोली मारो ..जब भी खोलो ससुरा भक से कहता था –
अपने मन की कुछ बात लिखो, आपकी यादेँ है कुछ कहो सो हमने कह दिया, हमरे देश में यही होता है कोई बार बार कहे कुछ लिखो, कुछ कहो, तो मान रखना पड़ता है. हमने भी उसका मान रखा इसमें हमरी का गलती है. हमें बचपन से यही सिखाया गया है सबका मान करो, सो हमने कर दिया, अब दिल उमंगें लेता है तो हम झूठ थोड़े ही बोलेंगे, झूठ बोलना पाप होता है , हमने पान थोड़े ही किया है . मासूम से बच्चे का दिल है.  अब चोर सिपाही का खेल खेलने लगा है . तौबा की आगे से जो इसके साथ पान खाया, फिलहाल अब चलो भजिये खा ही लेते हैं.

   देखे अब क्या नए गुल खिलाता है, हमने भी सोच लिया जो होगा सो होगा .जब कहेगा कुछ लिखो तो लिख देंगे – चोर की दाढ़ी में तिनका .
                  - शशि पुरवार 

12 comments:

  1. :):) पोल खुलती नज़र आ रही है . बढ़िया व्यंग्य

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    1. आपका ह्रदय से आभार sangeeta ji

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  2. आपको सूचित करते हुए हर्ष हो रहा है कि- आपकी इस प्रविष्टि के लिंक की चर्चा कल शुक्रवार (01-10-2016) के चर्चा मंच "कुछ बातें आज के हालात पर" (चर्चा अंक-2483) पर भी होगी!
    महात्मा गान्धी और पं. लालबहादुर शास्त्री की जयन्ती की बधायी।
    साथ ही शारदेय नवरात्रों की हार्दिक शुभकामनाएँ।
    डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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  3. आपको सूचित करते हुए हर्ष हो रहा है कि- आपकी इस प्रविष्टि के लिंक की चर्चा कल रविवार (02-10-2016) के चर्चा मंच "कुछ बातें आज के हालात पर" (चर्चा अंक-2483) पर भी होगी!
    महात्मा गान्धी और पं. लालबहादुर शास्त्री की जयन्ती की बधायी।
    साथ ही शारदेय नवरात्रों की हार्दिक शुभकामनाएँ।
    डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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  4. बहुत अच्छा व्यंग

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    1. आपका ह्रदय से आभार

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  5. गुदगुदी मचाता व्यंग्य बधाई शशि जी ।

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    1. आपका ह्रदय से आभार

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नमस्कार मित्रों, आपके शब्द हमारे लिए अनमोल है यहाँ तक आ ही गएँ हैं तो अपनी अनमोल प्रतिक्रिया व्यक्त करके हमें अनुग्रहित करें. स्नेहिल धन्यवाद ---शशि पुरवार



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