सपने

सपने मेरे नहीं आपके सपने, हमारे सपने, समाज में व्याप्त विसंगतियां मन को व्यथित करती हैं. संवेदनाओं की पृष्ठभूमि से जन्मी रचनाएँ मेरीनहीं आपकी आवाज हैं. इन आँखों में एक ख्वाब पलता है, सुकून हो हर दिल में इक दिया आश का जलता है. - शशि.
शशि का अर्थ है -- चन्द्रमा, तो चाँद सी शीतलता प्रदान करने का नाम है जिंदगी .
शब्दों की मिठास व रचना की सुवास ताउम्र अंतर्मन महकातें हैं. मेरे साथ सपनों की हसीन वादियों में आपका स्वागत है.

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Friday, December 16, 2016

वृद्धावस्था --- जीने का नजरिया



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       आज  कलयुग में जहाँ युवा अपने जीवन में प्रगति कर रहे है वहीँ बुजुर्ग अपने जीवन के अंतिम पड़ाव में अकेलेपन से झूझते नजर आते है . उच्च शिक्षा के लिए घर से बाहर निकले बच्चों की गृह वापसी कम ही होती है। नीड़ से उड़े पंछी अपना ठिकाना कहीं और ही बसाते हैं। शहर के  बाहर या विदेशों में जाकर वहीँ के जातें है।  फिर जैसा देश वैसा भेष  मंत्र सर्वोपरि होता है। एकल परिवार बनाकर रहना पसंद करतें हैं.यह  चौकानेँ वाले तथ्य है कि आज घर-घर  में  बुजुर्ग  चारदीवारी  में कैद अपने अकेलेपन की दीवारो से झूझते मिल जायेंगे। या फिर नाती पोतों व घर की चाकरी करना विवशता होती है।  पुरुष तो फिर भी रिटायर हो जाते है परन्तु महिलाएं  तो मरणोपरांत  ही पूर्णतः रिटायर होती है.  आज सयुंक्त परिवार के नाम  मुश्किल से उँगलियों पर गईं सकते हैं।  कितने परिवार ऐसे है जो सयुंक्त परिवार है जो खुशहाल हैं ?  
आज बुजुर्गों ने जीवन के अंतिम पड़ाव  जीना सीख  लिया है।  आजकल जीने का नया माध्यम उन्हें सोसल मीडिया के रूप में मिला है जहाँ २ शब्द में उन्हें वह आत्मीयता प्रदान करतें हैं जो वास्तविक जीवन में शायद ही मिले। 
                
     कुछ दिनों पहले बम्बई का एक किस्सा सुनने में आया कि एक लड़की ने अपनी सगाई इसलिए  तोड़ी कि वह परिवार में साथ नहीं रहना चाहती थी , उसने अपने होने वाले भावी पति से पूछा -- "  घर में खाली खोके या डस्टबिन कितने है " , पहले तो लड़का समझ नहीं सका, तब लड़की ने कहा कि तुम्हारे माँ बाप है या नहीं। .... !

        अब ऐसी सोच को क्या कहे, आजकल तो लड़की के माँ बाप भी यही देखते है कि लड़का अपने घर - परिवार से दूर नौकरी में हो, जिससे बिटिया को  पड़े. सास - ससुर का साथ उन्हें बोझ लगता है. परिवार का  अर्थ उनके लिए सिर्फ पति ही होता है और बेटे के लिए भी धीरे धीरे माँ - बाप उनकी स्वत्रन्त्र जिंदगी में बाधक। यही आजकल का कड़वा सत्य बन गया है।

              यही वजह है आज देश में जगह जगह  वृद्धाश्रम खुल  गएँ  है, मथुरा के  वृद्धाश्रम तो  बहुत चर्चित है वहाँ स्कान मंदिर की तरफ से बहुत से वृद्धाश्रम बने हुए है, कई ऐसे है जहाँ सिर्फ महिलाएं रहती है और कुछ जगह महिला पुरुष दोनों ही है, वहाँ के आश्रम में जाकर बुजुर्गो से मिलने का सौभाग्य भी मिला और यथास्थिति जानकार दुःख भी हुआ  कि कितने ही परिवार संपन्न  होते हुए भी  बुजुर्गो को  वहाँ जाकर छोड़ देते है। कमोवेश यही हाल देश के अन्य वृद्धा आश्रम का भी है।  जो चिंतनीय  व निंदनीय भी है।

                बुजुर्गो की वास्तविक स्थिति को और जानने के लिए मैंने जळगॉंव  स्थित वृद्धाश्रम में  भी कुछ पल बिताएं और वहाँ कुछ बुजुर्ग दम्पति की व्यथा सुनकर आँखों के कोर नम हो गए, वहाँ एक - दो बुजुर्ग दम्पति ऐसे भी थे जो अपने जीवन के अंतिम क्षणों  को जी रहे थे। जिनका शहर में बहुत बड़ा बंगला एवम करोडो का व्यवसाय था।  सिर्फ एक ही पुत्र जिसने करोडो की संपत्ति धोखे से अपने नाम करवा ली  फिर  उन्हें वृद्धाश्रम छोड़ दिया,  अपनी कहानी सुनाते हुए  बिलख कर रोने लगे कि आज ५ साल हो गए है बेटा हमसे मिलने भी कोई नहीं आता, हमने जिस बच्चे की राहों में काँटा भी चुभने नहीं दिया  आज वह  बच्चे गलती से पलट कर भी नहीं  देखते हैं। हमें धन संपत्ति का मोह नहीं है वह खुश रहें तो अब हम यहाँ खुश है, सिर्फ साल भर के लिए २००० रूपए भेज देते है
          समय कभी एक जैसा नहीं होता हैं, पहिया घूमता रहता है।  वक़्त बदला , युवा बदले और अब बुजुर्गो का खुद के लिए बदलता नजरिया, यह सुखद सकारत्मक पहलू है , आज आश्रम में रह रहे बुजुर्गों  ने अपने लिए जीना सीख लिया है। बुजुर्ग अपनी ख़ुशी के लिए कार्य करते है सत्संग से लेकर अपने पसंद के सभी कार्य आपस में मिल जुलकर करते है.   आश्रम में जुड़ा हुआ उनका यह परिवार ही उनके दुःख सुख का साथी भी है। 
                       वृद्धाश्रम के अतिरिक्त भी कुछ बुजुर्ग महिलाओ  से भी  मैंने मुलाक़ात की और उनकी सोच एवं हौसलों के आगे मै भी नतमस्तक हो गयी, आज इस उम्र में उनका  हौसला किसी युवा से कम नहीं है,  अपने इस समय को उन्होंने अपने लिए  चुना जो साथ में उनकी जीविका का साधन भी बना। साथ ही समाजसेवा भी हो गयी।  
 कुछ और लोगों के मिले अनुभव भी आपसे साझा  करती हूँ। 
 ७० साल की एक बुजुर्ग महिला हमेशा मुझे  उपचार केंद्र के दिखती थी, चेहरे  पर आत्मसंतोष की झलक  और मोहक मुस्कान , हाथ पैर में सूजन के कारन रोज शाम नियम से सिकाई के लिए आती थी, उनसे पूछा आप रोज अकेले आती है, कोई आपके साथ नहीं आता - तो जबाब में उन्होंने कहा -
     हाँ मै अकेले आती हूँ , मेरे पति बीमार है बिस्तर से नहीं उठ सकते है, बेटे बहू बाहर रहते है , उनका अपना घर है , वह यहाँ नहीं आते और हम यहाँ अपने जीवन से खुश है.
"   आप क्यूँ नहीं जाती बच्चो के पास "
" क्या करूँ जाकर , इस उम्र में  हमसे आना जाना नहीं होता वे अपने जीवन में व्यस्त व खुश है. तो रहने दो, हम भी खुश है"
 एक स्निग्ध मुस्कान चैहरे पर आ गयी।
  वहीँ  एक और महिला थी जिनसे पति का वर्ष भर पहले स्वर्गवास हो चूका था।  उम्र ६५  साल परन्तु जैसे उन्होंने उम्र को मात दी हैं।  हंसमुख ,मधुर स्वभाव - कहने लगी पहले मै बहुत दुखी हुई रोती रहती थी, मुझसे बोलने वाला कोई भी नहीं था, इतनी अकेली हो गयी थी कि बीमार पड़ने लगी, बेटे - बहु अपने कार्य में व्यस्त रहते है , फिर मैंने खुद को समझाया कि जीना पड़ेगा इस तरह जीवन नहीं काट सकतें हैं।  तब मैंने विरोध सहकर भी पालना घर शुरू कर दिया, २ पैसे भी मिलने लगे और लोग भी जुड़ने लगे, आज स्वस्थ हूँ , खुश हूँ , ग्रुप बन गया है सत्संग करते है, बच्चों के साथ मिलकर हँस लेते है. आज एकाकी पन नहीं है।

               आज बुजुर्गो का अपने प्रति बदलता नजरिया उन्हें जीवन जीने  और खुश रहने के लिए सकारात्मक सन्देश व संतुष्टि प्रदान कर रहा है, ऐसे कई बुजुर्ग भी है जिन्होंने कभी कंप्यूटर या मोबाइल को हाथ भी लगाया होगा किन्तु आज वह अंतरजाल पर सफलता पूर्वक सक्रीय है, अंतरजाल पर युवाओं के साथ साथ बुजुर्गो की संख्या भी बढ़ती जा रही है , वहाँ वे अपना योगदान लेखन में भी कर रहे है और जीवन को नए नजरिये से देख रहें है। यह बदलाव  सकारात्मक सन्देश भी देता है उम्र जीने की कोई सीमा नहीं होती है।  परन्तु क्या बुजुर्गो का नजरिया बदलना ही सम्पूर्णता है ?  परिवार और समाज की क्या जिम्मेदारियाँ है ?   सिर्फ वृद्धाश्रम ही इसका विकल्प नहीं है. आज कानून ने भी बुजुर्गो के लिए कई प्रावधान बनायें है, जिनका हनन होने पर कार्यवाही की जा सकती है।  एक उम्र के बाद जब शरीर  थकने लगता है तब  सहारा जरुरी है।  लेकिन आज के बुजुर्गों ने इससे लड़ना सीख लिया है , उनके जज्बे को नमन।
  -- शशि पुरवार

2 comments:

  1. आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल शनिवार (17-12-2016) को "जीने का नजरिया" (चर्चा अंक-2559) पर भी होगी।
    --
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
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    चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट अक्सर नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
    जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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  2. bhau din bad aapke blag par aayi achha lekh hai vrdhavstha par samy ke sath bhut kuchh badljata hai

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नमस्कार मित्रों, आपके शब्द हमारे लिए अनमोल है यहाँ तक आ ही गएँ हैं तो अपनी अनमोल प्रतिक्रिया व्यक्त करके हमें अनुग्रहित करें. स्नेहिल धन्यवाद ---शशि पुरवार



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