Thursday, July 18, 2019

माँ --- तांका

1
स्नेहिल मन
सहनशीलता है
खास गहना
सवांरता जीवन
माँ के अनेक रूप .
...

2
माँ  प्रिय सखी
राहें हुई आसान
सुखी जीवन
परिवार के लिए
त्याग दिए सपने .

3
माता के रूप
सोलह है शृंगार
नवरात्री में
गरबे की बहार
 झरता माँ का प्यार .
-----शशि पुरवार

Wednesday, July 3, 2019

सांठ गाँठ का चक्कर

 सांठ गाँठ का चक्कर 

आनंदी अपने काम में व्यस्त थी।  सुबह सुबह मिठाई की दुकान को साफ़ स्वच्छ करके करीने से सामान सजा रही थी।  दुकान में बनते गरमा गरम पोहे जलेबी की खुशबु नथुने में भरकर जिह्वा को ललचा ललचा रही थी। खाने के शौक़ीन ग्राहकों का हुजूम सुबह सुबह उमड़ने लगता था। आनंदी के दुकान की मिठाई व पकवान खूब प्रसिद्ध थे। जितने प्रेम से वह  ग्राहक को खिलाकर सम्मान देती थी। उतनी ही कुशलता  से वह दुकान का  कार्यभार संभालती थी।  उतनी ही गजब की निडर व  आत्मविश्वासी थी.  पति के निधन के बाद अपने मजबूत कंधो पर दुकान की जिम्मेदारी कम उम्र में संभाली थी।  वही अपने बच्चों अच्छे से पाल रही थी। अच्छे उतने ही सरल या कहे भोले भंडारी थे। अासपास के लोग उन्हे स्नेह व सम्मान से अम्मा जी कहकर बुलाते थे. उम्र ढलने लगी थी पर चेहरे का नूर कम नहीं हुआ था।  बेटे के साथ आज भी दुकान पर बैठना उसकी आदत थी। 

 खैर आज दुकान पर भीड़ कुछ ज्यादा ही थी कि फूड विभाग वाले जाँच के लिए आ टपके । वह कहते हैं न जहाँ गुड़ होगा मक्खी भिनभिनायेंगी।  जब दुकान इतनी मशहूर है तो खाने वालों की नजर से कैसे बचती। फ़ूड विभाग वाले आये दिन दुकान पर आ धमकते थे।  

"अम्मा जी प्रणाम , हमें भी चाय नाश्ता करवा दो। "

उन्हें देखते की अम्मा जी मन ही मन बुदबुदायी - आ गए मुये भिखारी।  जब देखो तब जीभ लपलपा जाती है।  लेकिन ऊपर से जबरन मुस्कान चिपका कर पोहा जलेबी की प्लेट के साथ मिठाई का डब्बा भी थमाकर बोली - आज के बाद आए  तो देख लूंगी।  आँखों में गुस्सा भरा था। लेकिन इससे ज्यादा कुछ नहीं कर सकी. 

 अफसर हीरा लाल नीपे खिसोरते , खिसियानी हँसी हँसते  , उँगलियों को चाटते हुए बगल वाली दुकान में सरक लिए। 

   अम्मा जी अपने निडर व तेज स्वाभाव के कारण वहां के मोहल्ले में चर्चित थी। पति के निधन के बाद जब से दुकान संभाली मजाल  है कोई बिना पैसे के डकार भी ले।  फिर यह फ़ूड विभाग वालों का चक्कर क्या था, समझना जरुरी था। हुआ यो कि --

 शुरू शुरू में हीरालाल जब सामान की जाँच करने अपने मातहत कर्मियों के साथ आया।  सामान ख़राब होने का सवाल ही नहीं था।  अम्मा जी की देख रेख में उम्दा सामान का उपयोग किया जाता था।  लेकिन हीरालाल अभी अभी बदली होकर आया था जो  खाने - पीने का शौक़ीन था ।  आदतन बेफिक्री  से बोला - 

" सामान तो ठीक है , अम्मा जी कुछ मिठाई दे दो , फ़ूड का  प्रमाणपत्र कल मिल जायेगा।  " 

उसके ऐसा कहते ही साथ आया हुआ आदमी तेजी से बाहर निकल गया।  वह समझ गया कि आज साहब ने शेर के मुंह में हाथ डाल लिया है।  अब चमचो को क्या पड़ी है कि साहब को बचाएं। उन्हें अपनी लंगोट सँभालने की ही फिक्र होती है। 

   आनंदी ने अंदर मिठाई का डिब्बा पैक करके दिया और पैसे मांगे।  तो हीरालाल की आँखें बड़ी हो गयी बोला - 

अम्मा जी आप बड़ी भोली है, अभी तो बात हुई; कल फटाफट काम हो जायेगा  .... आगे कुछ बोल पाता  कि अम्मा माजरा समझ गयी।  तेजी से  दुकान के बाहर निकल जो गाली गलौज करके चिल्लाना शुरू किया कि हीरालाल की हवाईयां भी उड़ने लगी। 

" अरे जा रे हरामी ,पैसे माँगता है , तेरे बाप का माल है क्या।  हमरी गलती नहीं है तो किस बात के पैसे।  अच्छा सामान है ग्राहक भगवान है व आज गवाह भी  है। .... अम्मा जी का रौद्र होता रूप व जमा होती भीड़ देखकर उसने सफाई से बात पलट दी , बच्चों के लिए ले रहा था...  चलता हूँ। 

 जाते जाते खा जाने वाली निगाहों से आनंदी को देखा।  मन ही मन में बैर लिए हीरालाल के दिल में बदले की आग भभक रही थी। अब वह मौके की ताक में बैठा था।  जल्दी ही मौके की तलाश पूरी हुई।  आखिर वह दिन आ ही गया जब कार्य को अंजाम देना था। अम्मा जी अपने बड़े बेटे के साथ १५ दिन तीरथ करने चली गयी। भोले भंडारी को सब समझा कर गयी, शेष अपने भरोसे के कारीगर को बोल गयी सब संभाल ले।  

 हीरालाल को दुकान पर आया देखकर भोला मुस्कुरा कर बोला - नमस्ते साहब  आईये।  वह हमेशा देखता आ रहा था कि सामान देखकर नाश्ता करके जाते हैं  तो जल्दी से आवभगत कर दी। नाश्ता कराने के बाद गोदाम में ले गया।  

और भोला आज अकेले हो , 
हाँ साहब अम्मा कल ही गांव गयी है फिर तीरथ करने जाएगी।  कारीगर आज छुट्टी पर है। .. 
पर हीरालाल अपनी चौकन्नी निगाहों से सुराख़ ढूंढ रहा था। 
वहां एक कोने में शक्कर का बोरा रखा था जिसमे चींटी चल रही थी।  उसने जल्दी से अपने साथ आदमियों को समझाया व सब रवाना हो गए।  अगले दिन एक आदमी ने आकर रजिस्ट्री दी व भोला के हस्ताक्षर ले लिए।  दुकान भोला के नाम पर थी।  

दो  दिन बाद पुलिस वारंट के साथ हाजिर थी  और भोला को पकड़ कर ले गयी।  चलो दुकान बंद करो , खराब सामान का उपयोग करके जनता के साथ खिलवाड़ करते  हो।  लाइसेंस रद्द होता है चलो हवालात में ..!

सब अफरा तफरी थी, इज्जत जा बट्टा लग जायेगा। अम्मा जी को खबर लगी तो  उलटे पैर  लौट आयी , सारे तीरथ का फल का फल यहीं मिला था। आज बलि का बकरा तैयार था।  

" आओ अम्मा जी " - हीरालाल की आवाज में खनक थी। 

" यह तो नाइंसाफी है, साहब  " - अम्मा जी ने विरोध करना चाहा। 
" अम्मा जी आवाज नीचे रखो, हम क्या कर सकतें है , तुम्हारे बेटे ने कागज साइन करके  कोर्ट का सम्मन ले लिया था कार्यवाही तो होगी।  जिसने लिया है उसी पर होगी।  दुकान का मालिक भी है "

अम्मा जी ने सर पीट लिया।  सोचा था  बेटे के नाम दुकान करके  जिम्मेदारी से मुक्त होगी ।पर यह  एक बेटे का बाप  बन  गया पर अकक्ल दो कौड़ी की भी नहीं आयी। मन को शांत रखकर बोली - बाबू कुछ तो तोड़ होगा इस चक्रव्यूह से बाहर आने का। .. "

अब इतने दिनों से समझा रहे थे, पर  अब उसकी मुक्ति के सारे रास्ते बंद है। "
ऐसा न कहो बाबू किस बात का बदला ले रहे हो। .. 

नहीं अब मामला हमारे हाथ से निकल गया है पुलिस वाले मामला देख रहे है उनसे ही मिलो जाकर..

बेचारी रोती पीटती पुलिस थाने गयी।  वहां भोला देखकर रोने लगा - अम्मा देखो जबरजस्ती बंद कर दिया।  बेटे को जेल में कैसे रहने देती।  मामला कोर्ट तक चला जाता तो बचाना मुश्किल था।  

उसने सब बातें वहां के हवलदार को बताई।  लेकिन उसने भी हाथ खड़े कर दिए। -
"  अम्मा कोर्ट का मामला बन रहा है  कल कोर्ट में ले जायेंगे उससे पहले कुछ कर सकती हो तो कर लो "

एक समझदार  पुलिस वाला ही ऐसी सलाह दे सकता था कल सुबह तक का समय है।  अब अम्मा ने अपनी पहचान निकाली , बड़ा बेटा २-४ गुंडों व पहचान वालो  को लेकर थाने में आया। बड़े आदमी व वहां के नेता से  थानेदार पर दबाब बनाकर  मामला रफा दफा करवाया।  

हीरालाल और पुलिसवालों की सांठ सांठ थी , उन्होंने मिलकर योजना बनायीं थी , मामला निपटाने में अम्मा ने  खूब पापड़ बेले और किसी तरह भोला को बाहर लेकर आयी।  भोला तो बाहर आ गया था लेकिन थानेदार व हीरालाल अम्मा के स्थायी ग्राहक बन गए थे जिन्हें हर महीने मिठाई का डब्बा व नाश्ता पानी करवाना अम्मा की मज़बूरी बन गयी थी।  आग उगलने वाली जीभ शक्कर की चाशनी पड़ जाने से काली हो गयी थी। दबी जुबान में यही आशीष झरते थे - 

मुये कीड़े पड़ेंगे तेरे मुँह में....  ! 

शशि पुरवार 


Thursday, May 30, 2019

गीत के वटवृक्ष









२४ मार्च २०१९ को आदरणीय मधुकर गौड़ जी के निधन की खबर ने स्तब्ध कर दिया। इस वर्ष साहित्य जगत के कई मजबूत स्तंभ व सितारे विलीन हो गए। मधुकर गौड़ जी गीत को समपर्पित ऐसा व्यक्तित्व, जिनका नाम स्वर्णिम अक्षरों में अंकित हुआ है, व जिनका साहित्यिक योगदान युगों युगों तक याद रखा जायेगा, अपनी अंतिम साँस तक निर्विकार भाव से वे साहित्य की सेवा करते रहे।

जब भी गीत की बात होगी तो मधुकर गौड़ का नाम लेना अनिवार्य होगा। मधुकर गौड़ जी साहित्य जगत के ऐसे स्तम्भ थे जिन्होंने विषम परिस्थितियों में भी गीत की मशाल को अकेले अपने दृढ़ संकल्प द्वारा जलाये रखा। अपनी साँस के अंतिम समय तक वे गीत के लिये ही जिये और मजबूती से अपनी मशाल को थामे रहे। उनका व्यक्तित्व व कृतित्व इतना विशाल था कि उनके बारे में लिखना सूरज को दिया दिखाने जैसा है। मेरा संपर्क उनके गत १०-११ वर्ष पहले हुआ था जब उन्होंने गीत पढ़कर खूब लिखने हेतु प्रेरित किया था। उनके द्वारा सम्पादित गीत संकलन ऐसा अप्रतिम सागर था जिसमें अनगिन मोती जड़े थे। जिन्हे पढ़कर मेरी जिज्ञासु सुधा शांत होती रही। जितना उन्हें जाना उतना नतमस्तक हुई।

आदरणीय मधुकर गौड़ ने गत पाँच दशकों से अंतिम साँस तक पूर्ण निष्ठा, निस्वार्थ भाव से स्वयं को साहित्य के लिये समर्पित कर दिया था। गीत विरोधी समय में भी वे बेख़ौफ़ अडिग खड़े थे। एक ऐसा सिपाही जो सिर्फ गीत नहीं अपितु सम्पूर्ण कविता व साहित्य के लिये अकेले अपने दृढ़ संकल्प द्वारा अडिग खड़ा था। गीत उनकी साँस में बसता था। देश भर के गीतकारों को उन्होंने एक मंच पर लाकर खड़ा कर दिया था। सफल संपादक, समीक्षक, सफल गीतकार के साथ वे बेहतरीन सकारात्मक व्यक्तित्व के स्वामी भी थे।

उनके गद्य, सृजन, संवादों व दैनिक कार्यों में भी गीत की करतल धारा बहती थी। जब वे बोलना शुरू करते थे तो जैसे सरस्वती उनकी वाणी से बोलती थी। गीत के प्रति अगाढ़ निष्ठा, प्रेम, समर्पण ही विषम पलों में उनके जीवन का आधार था। गत पाँच दशकों से उन्होंने निरंतर लेखन, संपादन, समीक्षक और संयोजन द्वारा साहित्य की सेवा की है। उन्होंने गीत, गजल, दोहे, मुक्तक सभी विधा में लेखन किया। राजस्थानी भाषा में भी उन्होंने साहित्य सृजन किया। अनगिनत साहित्यिक कृतियाँ, संग्रहों का सृजन व संपादन किया।

वे एक व्यक्ति नहीं अपितु पूर्ण संस्था थे। गीत का ऐसा सिपाही जिसने हारना सीखा ही नहीं था। अदम्य साहस, अकम्पित आस्था, सकारात्मक ऊर्जा से लबरेज गौड़ जी ने राजिस्थान की माटी से बम्बई तक रचना संसार का स्वर्णिम युग तैयार किया। अहिन्दी भाषी प्रदेश में रहकर उन्होंने नव आयाम स्थापित किये। यह सफर स्वर्णिम अक्षरों में अंकित हो गया। गौड़ जी ने मुंबई में "नगर ज्योति" की स्थापना करके साहित्य का संस्कार शील, सुदृढ़ मंच तैयार किया था। इसके अतिरिक्त उन्होंने "साहित्य भारती", "राजस्थानी पत्रकार लेखक संघ" की भी स्थापना की और सतत ३० वर्षों से छंदसिक रचनाओं व गद्य समवेत पत्रिका " सार्थक "का सफल संपादन व प्रकाशन किया। सार्थक के माध्यम से उन्होंने गीत की अलख को जगाये रखा। बिना किसी सहयोग के वे निरंतर सार्थक का सृजन करते रहे।

सार्थक के माध्यम से उन्होंने गीत को प्रोत्साहित किया। समय के श्रेष्ठ गीतकारों के साथ नव गीतकारों व रचनाकारों को भी उन्होंने आत्मिक स्नेह द्वारा अपने साथ जोड़ा। वे सफल व उम्दा साहित्यकार थे वहीँ उनके संपादन की कसौटी की धार भी उतनी ही तेज थी। देश भर के अनगिनत साहित्यकारों के श्रेष्ठ गीत का काव्य संग्रह करके ऐसा गुलदस्ता तैयार किया तो समय के साथ महकता रहेगा।

उन्होंने अगिनत अनुपम, अमिट, अप्रतिम संकलन सम्पादित व प्रकाशित किये। ६ गीत नवांतर, १० गजल नवांतर, बीसवीं सदी के श्रेष्ठ गीत, १९६२ में इक्कीस हस्ताक्षर समेत अनगिनत रजिस्थानी छंद संग्रह व गीत नवांतर, गजल नवांतर व व्यंग्य नवांतर इत्यादि का संपादन व प्रकाशन किया। उनका सृजन संसार इतना वृहद है कि कुछ पंक्ति में समेटना मुश्किल है। उन्होंने रचनाकार की उम्र नहीं उनके समसामयिक लेखन को महत्व दिया। उनके सम्पादित किये लगभग सभी संग्रह मेरे पास है। संग्रह में एक एक चुनिंदा मोती कहें या हीरा, स्वर्णिम अक्षरों में पन्नों में जड़ा हुआ अंकित है । संग्रह के गीत समय के साथ चलते हुए स्वर्णिम युग का आगाज कर रहें हैं। उनमे शामिल रचनाकार अपने गीतों के साथ अजेय हो गए। आदरणीय मधुकर गौड़ के शब्दों में -
मेरी रजा जनजीवन है, मेरा तीरथ हिंदुस्तान
मेरा प्यार सभी के हक में मेरा ईश्वर है

इंसान गौड़ जी केवल गीत ही नहीं अपितु सम्पूर्ण कविता की लड़ाई लड़ रहे थे। स्पष्टवादी, झुझारू ऊपर से कड़क व हृदय से उतने ही नरम व्यक्तिव के स्वामी थे। उनके ही शब्दों में -
श्रेष्ठ कविता की लड़ाई लड़ रहें है हम सभी
गीत के माथे नवांतर जड़ रहें है हम सभी।

उन्हें गीतों से बेहद प्रेम था या यह कहे कि गीत उनकी साँसों में बसता था। समय के साथ गीत पर अलग अलग स्वर उठे। जैसे जनगीत, प्रगीत, जनवादी गीत, अगीत, नवगीत आदि किन्तु वे गीत की मशाल थामे अनवरत चलते रहे। वे कहते थे - आज गीत को नए परिवर्तनों के समागम में भी नए नाम दिए जाने लगे हैं किन्तु गीत शाश्वत रूप आधार हो। गीतों में अन्तस् की जीवंतता रही है। अवरोध व अंतर्विरोध उनके दृढ़ संकल्प को डिगा नहीं सके। उनके ही शब्दों में -
साहस मुझको श्लोक लिखाते निष्ठा उनको याद दिलाती
संकल्पों की भरी सभा में गरिमा आकर राह दिखाती

उन्होंने अंतिम समय तक गीत को गीत ही माना। वे कहते थे कि- "गीत नवगीत क्या होता है। गीत ने नया चोला पहन लिया है। गीत समय के साथ नए परिवर्तन को अपने में समाहित करता आ रहा है। समय व परिवेश को गीत ने तीव्रता से ग्रहण किया है। गीत तो गीत है। सर्वार्थ पूर्ण और नित्य प्रति, समाज व राष्ट्र का निर्माण गीत है। गीत लय व छंद का महर्षि है।"

खेमेबाजी को उन्होंने उनके काम में अड़ंगा नहीं लगाने दिया। वे किसी विवादमें नहीं पड़े अपितु सरल हृदय से अपनी बात कही। ७० के बाद आये परिवर्तनों पर उन्होंने कहा कि "परिवेश के आधार पर नए अंतर ही हर विधा का नवांतर है।"

संघर्ष व स्वर्णिम अजेय कर्म का पथ आसान नहीं था। उनके भावों में संघर्ष की कहानी साफ़ झलकती है - उनके शब्दों में -
आंधी के तेवर देखें है तूफानों से टकराया हूँ
घनघोर बरसते पानी में, नौका लेकर आया हूँ।

गौड़ जी ने और सार्थक ने नि:स्वार्थ भाव के पक्ष में स्वंय को खड़ा किया था । उन्होंने कई आलेख भी लिखे। गीत के पक्ष में हमेशा अपना मोर्चा संभाले रखा। वे कहते थे कि धरती कर कण कण में गीत बसा है। छंद में रचे-बसे गीत के हस्ताक्षर मधुकर गौड़ जी सदा गीत के लिये चिंतित रहे। वे कहते थे कि गीत सनातन है व सदैव गीत ही रहेगा। गीत ही सत्य है व सत्य ही गीत। गीत तो उनके कण कण में बसा था। इनके ही शब्दों में -
गाते गाते गीत मरूँ मैं, मरते मरते गाऊँ
तन को छोडू भले धरा पर, गीत साथ ले जाऊँ।

गीत के प्रति अगाध निष्ठा प्रेम, व समर्पण ने उन्हें विषम पलों में भी उनके जीवन का आधार दिया। अस्वस्था के बाबजूद उनके सृजन साहित्य की मशाल जलती रही। निधन के कुछ समय पहले तक वे कह रहे थे नवांतर ७ का प्रकाशन करना है जिसमें पुरानी पीढ़ी के साथ नव पीढ़ी के भी गीत शामिल हो। सार्थक का विशेष अंक का प्रकाशन करना है। मौत भी मुझे डरा नही सकती। उनका उत्साह ऊर्जा से लबरेज थे। उनकी जिवटता उनके शब्दों से झलकती थी कि -
मौत भले ही थक जाये पर जीवन का थकना मुश्किल है
साँसो के इस क्रम में जाने किस गलियारे मंजिल है

कुछ समय विषम परिस्थिति व बीमारी से झुझते हुये आक्सिजन मास्क हटाकर काम करने लगते थे। उन्हें मना किया तो कहने लगे - डाक्टर कहते है आराम करो, पर मै तो इसके बिना जी नही सकता। मुझे अभी बहुत कार्य करना है। अपने कष्ट की भनक भी उन्होनें किसी को लगने नही दी। जब भी वाणी के फूल झरे उर्जा से लबरेज थे। उनकी कृष होती काया में भी अपार शक्ति व साहस था। कहतें है कि निष्ठावान व्यक्ति टूट तो सकता है पर झुक नही सकता। वे समय के आगे भी नहीं झुके। उनका एक मुक्तक उनकी जुबानी -
एक आदत सी है मुझमें बांकपन की टूट जाता हूँ मगर झुकता नहीं हूँ
स्नेह वश आँकों अगर, बिन मोल ले लो किंतु सिक्कों के लिये बिकता नही हूँ

उनके समकालीन गीतकारों ने उन्हें अनगिन नामों से नवाजा था- जैसे गीत गंगा का नया भगीरथ, गीत के विजय रथ के अप्रतिम सारथी, गीत के वटवृक्ष, गीत के पर्याय इत्यादि। सत्य भी है एक अजेय योद्धा जिसनें गीत के खातिर जीवन के मोह, सुख व वैभव को तवज्जो नही दी। उनके साहित्सतिक सफर में उनकी धर्मपत्नी व परिजनों के अमूल्य योगदान को सदै‌व नतमस्तक करते थे।
वे एक मशाल बनकर ही तो जलते रहे - उनके ही शब्दों में
जिंदगी का मोल देने के लिये बढता रहा हूँ
अौर लाने भोर जग में, रात बन ढलता रहा हूँ

मधुकर गौड़ के गीत, जीवन व साहित्य जगत में संवेदनाओं की अनुपम अभिव्यक्ति को महत्वपूर्ण बनाते है। समय के साथ चलते हुए गीत जीवट व जिजिषिवा के धनी, उदारता व नम्रता के आदर्श है।आदरणीय गौड़ जी से परिचय के दौरान जितना भी उन्हें जाना उतना ही नतमस्तक होती चली गयी। गीत विधा के प्रति अटूट लगाव के अतिरिक्त उनमें विशिष्ट गुण था। वे जो भी ठान लेते थे उसे विषम परिस्थिति में भी पूर्ण करते थे। गीताम्बरी का प्रकाशन भी उसी दौरान हुआ। कर्मठ दृढ़ निश्चयी व संकल्प वृती गौड़ जी का जन्म १० अक्टूबर १९४२ को रणबांकुरो की बलिदानी राजस्थानी मिट्टी चूरू अंचल में हुआ था। भावुक प्रेमिल हृदय जितना गीतों में बहता था उतने ही पाँव यथार्थ के कठोर धरातल पर रहकर सृजनशील रहे। उन्होंने जो भोगा, महसूसा उसे गीतों में वाणी दी। संपादन कार्य में व्यस्त रहते हुए स्वयं भी सृजनरत रहे।

१९७६ में छपे उनके प्रथम गीत संग्रह "समय धनुष" को नेशनल अकादमी मुंबई ने पुरस्कृत सर्वश्रेष्ठ संग्रह घोषित किया। १९९० में प्रकाशित उनका पाँचवा काव्य संकलन " अंतस की यादें " को महारष्ट्र राज्य साहित्य अकेदमी ने काव्य के सर्वोच्च पुरस्कार संत नामदेव देकर सम्मानित किया। गीत वंश उनका वृहद व बहुचर्चित गीत संग्रह है, उसे भी महाराष्ट्र अकादमी द्वारा सम्मानित किया गया। उन्हें अनगिनत सम्मानों से नवाजा गया जिसमे सर प्रतिभा सिंह पाटिल द्वारा श्रेष्ठ साहित्यकार सम्मान, श्रेष्ठ साहित्य सेवा सम्मान, मानद श्री की उपाधि, निराला सम्मान समेत अनगिनत दर्जनों सम्मान शामिल है।

उनकी प्रमुख कृतियाँ हैं- मधुकर गौड़ का रचना संसार गीत और गीत-१ (१९६८), समय के धनुष (१९७६), गुलाब (मुक्तक व रुबाई - १९८६), अश्वों पर (बहु प्रशंसित गद्य कवितायेँ १९९०), अंधकार में प्रकाश (गद्य संकलन), अंतस की यादें (१९९० काव्य संकलन), पहरुए गीतों के (गीत संग्रह - १९९५), गीत वंश (गीत संग्रह १९९७), देश की पुकार (राष्ट्रिय गीत), साथ चलते हुए (गजल दोहे म मुक्तक २००१), बावरी (आत्मिक प्रेम कथा दोहे रुबाई २००२), श्रीरामरस (दोहा संकलन २००५), साँस साँस में गीत (गीत संग्रह२००७), गीत गंगा का नया भगीरथ, चुप न रहो (गीत संग्रह २०१५), गीताम्बरी (२०१६) समेत कई राजस्थानी संग्रह भी शामिल है।

दर्जनों सम्पादित गीत गजल संग्रह व नवांतर उनके रचना संसार को समेटना जैसे सागर को गागर में भरना है। उनके गीतों में जिंदगी के अनेक बिम्ब व स्वर समाहित है। उनकी रचनाएँ जीवन के विविध रंगो को समेटे हुए इंद्रधनुषी आकाश बनाती है। कर्मठता उनमे रंग भरती है। सतत बहते जाना और इतिहास बनाना उनकी जीवटता की पहचान थी। उनके शब्दों में -
आदमी ही जब लहु के साथ चलता है
दोस्त मेरे तब नया इतिहास बनता है

उनकी बहु चर्चित कृति बावरी का उल्लेख भी आवश्यक है। मधुकर गौड़ जी की कृति बावरी जो आत्मिक प्रेम काव्य की अभिव्यक्ति है जिसमे १५२ द्वोपदियों में प्रेम की पीर व अंतस की गहराई से निःसृत प्रेम - दीवानी मीरा की अनुभूति की गूंज है। कवि के शब्दों में यह प्रेम के श्लोक है, जिसने साँस साँस में उसे जिया है। प्रेम की सनातन अभिव्यक्ति है। एक बानगी देखें -
मै माटी की पूतली, तू धड़कन तू जान
मै पूजा तू मूर्ति, मै काया तू प्राण
झर झर आँसूं की झड़ी, मै भीगी दिन रात
ऐसी भीगी मेह में, हो गयी खुद बरसात।

बहुत कम लोग होते हैं जो अपने मूल्यों, आदर्शों के साथ अवांछित अवरोधों को चुनौती देते हुए निरंतर आगे बढ़ते रहते हैं। कुछ लोग ऐसे होते हैं जिनका व्यक्तित्व वंदनीय व अनुकरणीय होता है। साधन, सुविधा और सहयोग के अभाव में भी उन्होंने अविचल अविरल बहते हुए अपने धेय्य को पूर्ण किया। उनका व्यक्तित्व व कृतित्व हमेशा नव रचनाकारों व गीतकारों को प्रेरणा, दृढ़संकल्प व ऊर्जा की संजीवनी प्रदान करता रहेगा।

एक गुरु, पिता, मित्र बनकर उनका स्नेह आशीष मुझे भी प्राप्त हुआ। उनके सृजन साहित्य के सागर में समाहित रचनाओं के अनमोल मोती हमें सदैव मार्गदर्शन प्रदान करते रहेंगे। उनके गीत, गजल, दोहे व उनके शब्द हमें सदैव सुवासित करते रहेंगे। वे अपने वृहद साहित्य व शब्दों से माध्यम से सदैव हमारे बीच सुवासित रहेंगे। उनका ही एक बंद उन्हें अर्पित करती हूँ

जीते रहे अब तलक दिलदार की तरह
पढ़ते रहे हैं लोग हमें अखवार की तरह
सब साथ हो गए तो रहे सारी जिंदगी
आकर के हम गए नहीं बहार की तरह।

गीत के सशक्त हस्ताक्षरआदरणीय मधुकर गौड़ सर को मेरा कोटि कोटि नमन व विनम्र श्रद्धांजलि अर्पित करती हूँ।
शशि पुरवार

Monday, May 27, 2019

एक अदद करारी खुशबू



शर्मा जी अपने काम में मस्त  सुबह सुबह मिठाई की दुकान को साफ़ स्वच्छ करके करीने से सजा रहे थे ।  दुकान में बनते गरमा गरम पोहे जलेबी की खुशबु नथुने में भरकर जिह्वा को ललचा ललचा रही थी। अब खुशबु होती ही है ललचाने के लिए , फिर गरीब हो या अमीर खींचे चले आते है।   खाने के शौक़ीन ग्राहकों का हुजूम सुबह सुबह उमड़ने लगता था। खाने के शौक़ीन लोगों के मिजाज भी कुछ अलग ही होते हैं।   कुछ  गर्मागर्म पकवानों को खाते हैं कुछ करारे करारे नोटों को आजमाते हैं।  अब आप कहेंगे नोटों आजमाना यानि कि खाना। नोट आज की मौलिक जरुरत है।  प्रश्न उठा कि नोट  कौन खा सकता है। अजी बिलकुल खाते है , कोई ईमानदारी की सौंधी खुशबू का दीवाना होता है तो कोई भ्रष्टाचार की करारी खुशबू का।   हमने तो  बहुत लोगों को  इसके स्वाद का आनंद लेते हुए देखा है।  ऐसे लोगों को ढूंढने की जरुरत नहीं पड़ती अपितु ऐसे लोग आपके सामने स्वयं हाजिर हो जाते हैं। खाने वाला ही जानता है कि खुशबू  कहाँ से आ रही है। जरा सा  इर्द गिर्द नजर घुमाओ , नजरों को नजाकत से उठाओ कि  चलते फिरते पुर्जे नजर आ जायेंगे।  

   
हमारे शर्मा जी के  दुकान के पकवान खूब प्रसिद्ध है।  बड़े प्रेम से लोगों  को प्रेम से खिलाकर अपने जलवे दिखाकर पकवान  परोसते हैं।  कोर्ट कचहरी के चक्कर उन्हें रास नहीं आते।  २-४ लोगों को हाथ में रखते है।  फ़ूड विभाग वालों का खुला हुआ मुँह भी रंग बिरंगे पकवानो से भर देते हैं।  आनंद ही आनंद व्याप्त है।  खाने वाले  भी जानते है कहाँ कितनी चाशनी मिलेगी। 

 फ़ूड विभाग के पनौती लाल को और क्या चाहिए।  गर्मागर्म पोहा जलेबी के साथ करारा स्वाद उनके पेट को गले तक भर देता है।  उन्हें  मालूम है  जहाँ गुड़ होगा मक्खी भिनभिनायेंगी।  पकवान की खुशबू  में मिली करारी खुशबू का स्वाद उनकी जीभ की तृषा  शांत करता है।  आजकल लोगों में  मातृ भक्त  ईमानदारी कण कण में बसी थी।  यह ईमानदारी करारी खुशबू के प्रति वायरल की तरह फैलती जा रही है।  आजकल के वायरस भी सशक्त है तेजी से संक्रमण करते है। संक्रमण की बीमारी ही ऐसी है जिससे कोई नहीं बच सकता है।  

   
शर्मा जी के भाई  गुरु जी कॉलेज में प्रोफेसर है।  वैसे गुरु जी डाक्टर हैं किन्तु डाक्टरी अलग प्रकार से करते है।  उनकी डाक्टरी के किस्से कुछ अलग ही है।  अपने भाई पनौतीलाल से उन्होंने बहुत कुछ सीखा , उसमे सर्वप्रथम था करारी खुशबू का स्वाद लेना व स्वाद देना।  यह भी एक कला है जिसे करने के लिए साधना करनी होगी।   

वह डाक्टरी जरूर बने पर मरीज की सेवा के अतिरिक्त सब काम करतें है।  कॉलेज में प्रोफेसर की कुर्सी हथिया ली।   किन्तु पढ़ाने के अतिरिक्त सब काम में महारत हासिल है  और बच्चे भी उनके कायल है।  मसलन एडमिशन करना , बच्चों को पास करना , कॉलेज के इंस्पेक्शन करवाना , कितनी सीटों से फायदा करवाना ...  जैसे अनगिनत काम दिनचर्या में शामिल है। जिसकी लिस्ट भी रजिस्टर में दर्ज न हो।   हर चीज के रेट फिक्स्ड है।  जब बाजार में इंस्टेंट  वस्तु उपलब्ध हो तो खुशबू कुछ ज्यादा  ही करारी हो जाती है।  ऐसे में बच्चे भी खुश हैं ;  वह भी नारे लगाते रहते है कि  हमारे प्रोफेसर साहब जिन्दावाद। गुरु ने ऐसा स्यापा फैलाया है कि कोई भी परेशानी उन तक नहीं पंहुच पाती।  विद्यार्थी का हुजूम उनके आगे पीछे रहता है।  गुरु जी को नींद में करारे भोजन की आदत है। स्वप्न भी उन्हें सोने नहीं देते।  जिजीविषा कम नहीं होती।  नित नए तरीके ढूंढते रहते है। 

 उनका जलवा ऐसा कि नौकरी मांगने वाले मिठाई के डब्बे लेकर खड़े रहते है।  उनका डबल फायदा हो रहा था।  असली मिठाई पनौती लाल की दुकान में बेच कर मुनाफा कमाते व करारी मिठाई सीधे मर्तबान में चली जाती थी।  यानी पांचो उंगलिया घी में थी।  

 एक बार उन्होंने सोचा अपनी करीबी रिश्तेदार का भला कर दिया है।  रिश्तेदारी है तो कोई ज्यादा पूछेगा नहीं।  अपना भी फायदा उसका भी भला हो जायेगा।  भलाई की आग में चने सेंकना गुरु जी की फितरत थी। 

 
अपनी  रिश्तेदार इमरती को काम दिलाने के लिए महान बने गुरु जी ने उसे अपने कॉलेज में स्थापित कर दिया। उसका  सिर्फ एक ही काम था कॉलेज में होने वाले इंस्पेक्शन व अन्य कार्यों के लिए  हस्ताक्षर करना और कुर्सी की शोभा बढ़ाना।  महीने की तय रकम की ५००० रूपए। 

 
गुरु जी पान खाकर लाल जबान लिए घूमते थे।  बेचारी इमरती को देते थे ५००० रूपए और शेष २५००० अपनी जेब में।  यह गणित समझने वालों के लिए मुश्किल हो सकता है चलो हम आसान कर देते हैं।  गुरु जी अपने करारे कामों के लिए इतने मशहूर थे कि बच्चों से लेकर स्टाफ तक; उनकी जी हुजूरी करता है।  ऐसे में गुरु जी लोगों से ठेके की तरह काम लेते और  गऊ  बनकर सेवा धरम करते। रकम की बात दो दलों से करते स्वयं बिचौलिए बने रहते।   दूध की मलाई पूरी खाने के बाद ही दूध का वितरण करते थे ।  करारी खुशबू की अपनी एक अदा है।  जब वह आती है तो रोम रोम खिल उठता है जब जाती है तो जैसे बसंत रूठ गया हो। 

 
दोनो भाई मिल जुलकर गर्मागर्म खाने के शौक़ीन  थे।  इधर कुछ दिनों से इमरती को मन के खटका होने लगा कि कम पगार के बाबजूद गुरु जी की  पांचो उँगलियाँ  घी में है और  वह स्वयं सूखी  रोटी खा रही है।  इंसान की फितरत होती है जब भी वह अपनी तुलना दूसरों से करता है उसका तीसरा नेत्र अपने आप खुल जाता है।  भगवान शिव के तीसरे नेत्रों में पूरी दुनिया समायी है , पर जब एक स्त्री अपना तीसरा नेत्र खोलती है तो  उससे कुछ  भी छुपाना नामुमकिन है। वह समझ गयी कि दाल में कुछ काला ही नहीं  पूरी दाल ही काली है।  खूब छानबीन करने के बाद गुरु जी क्रियाकर्म धीरे धीरे नजर आने लगे।  कैसे गुरु जी उसका फायदा उठाया है।  उसके नाम पर  लोगों से ४०००० लेते थे बदले में ५००० टिका देते है। शेष अपने मर्तबान में डालते थे। 

   
इतने समय से काम करते हुए वह भी होशियार हो चली थी , रिश्तेदारी को अलग रखने का मन बनाकर अपना ब्रम्हास्त्र निकाला।  आने वाले परीक्षा के समय अपना बिगुल बजा दिया , काम के खिलाफ अपनी  संहिता लगा दी।  

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इमरती समझा करो , ऐसा मत करो "

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क्यों गुरु भाई आप तो हमें कुछ नहीं देते हैं फ़ोकट में काम करवा रहे हो  "

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देता तो हूँ ज्यादा कहाँ मिलता है , बड़ी मुश्किल से पैसा निकलता है , चार चार महीने में बिल पास होता है "

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झूठ मत बोलो , मुझे सब पता चल गया है, आज से मै आपके लिए कोई काम नहीं करुँगी।  "

अब गुरु जी खिसियानी बिल्ली की तरह खम्बा नोच रहे थे।  सोचा था करीबी रिश्तेदार है।  कभी दिया कभी नहीं दिया तो भी फर्क नहीं पड़ेगा।  बहुत माल खाने में लगे हुए थे।  पर उन्हें क्या पता खुशबू सिर्फ उन्हें ही नहीं दूसरों तक भी पहुँचती है।  

इमरती की बगावत ने उनके होश उड़ा दिए , बात नौकरी पर आन पड़ी।  आला अफसर सिर्फ करारे काम ही देखना पसंद करते हैं उन्हें इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता कि करारे व्यंजन में उपयोग होने वाली सामग्री कैसी है। यहाँ  हर किसी को अपनी दुकान चलानी है।   कहतें है जब मुंह को खून लग जाये तो उसकी प्यास बढ़ती रहती है। यही हाल जिब्हा का भी है।  तलब जाती ही नहीं। 

 इमरती के नेत्र क्या खुले गुरु जी की  जान निकलने  लगी।  गुरु जी इमरती को चूरन चटा रहे थे किन्तु यहाँ इमरती ने ही उन्हें चूरन चटा दिया।  कहते हैं न सात दिन सुनार के तो एक दिन लुहार का।  आज इमरती चैन की नींद सो रही थी।  कल का सूरज  नयी सुबह लेकर आने वाला था। सत्ता हमेशा एक सी नहीं चलती है। उसे एक दिन बदलना ही पड़ता है।      

 
गुरु जी के होश उड़े हुए थे। उन्हें समझ में आ गया उनकी ही बिल्ली उन्ही से माउं कर रही है।  करारी खुशबू ने अब उनका जीना हराम कर रखा था।  खुशबू को कैद करना नामुमकिन है।  इमरती को आज गर्मागर्म करारी जलेबी का तोहफा दिया।  भाई होने की दुहाई दी।  रोजी रोटी का वास्ता दिया और चरणों में लोट गए।

  खुशबू जीत गयी थी।  अब मिल बांटकर खाने की आदत ने अपनी अपनी दुकान खोल ली  और अदद खुशबू का करारा साम्राज्य अपना विस्तार ईमानदारी से कर रहा था। जिससे बचना कठिन ही नहीं नामुमकिन है। दो सौ मुल्कों की पुलिस भी उसे कैद करने असमर्थ है।  करारी खुशबू   का फलता फूलता हुआ साम्राज्य विकास व समाज को कौन सी  कौन दिशा में ले जायेगा।

    यह सब कांड देखकर शर्मा जी को हृदयाघात का ऐसा दौरा पड़ा कि  परलोक सिधार गए।  सुबह गाजे बाजे के साथ उनकी यात्रा निकाली गयी।  उनके करारे प्रेम को देखकर लोगों ने उन्हें नोटों की माला पहनाई।  नोटों से अर्थी सजाई। फूलों के साथ लोगों ने नोट चढ़ाये।  लेकिन आज यह नोट उनके किसी काम के नहीं थे।  उनकी अर्थी पर चढ़े हुए नोट जैसे आज मुँह चिढ़ा रहे थे। आज उनमे करारी खुशबू नदारत थी।  
   


शशि पुरवार 


Tuesday, May 21, 2019

सन्नाटे ही बोलते

भटक रहे किस खोज में, क्या जीवन का अर्थ 
शेष रह गयी अस्थियां, प्रयत्न हुए सब व्यर्थ 

तन माटी का रूप है , क्या मानव की साख 
लोटा भर कर अस्थियां, केवल ठंडी राख 

सुख की परिभाषा नई, घर में दो ही लोग 
सन्नाटे ही बोलते , मोबाइल का रोग 

कोई लौटा दे मुझे बचपन के उपहार 
नेह भरी मेरी सदी , मित्रों का संसार 

आपाधापी जिंदगी , न करती है विश्राम 
सुबह हुई तो चल पड़ी , ना फुरसत की शाम 

शशि पुरवार 



समीक्षा -- है न -

  शशि पुरवार  Shashipurwar@gmail.com समीक्षा है न - मुकेश कुमार सिन्हा  है ना “ मुकेश कुमार सिन्हा का काव्य संग्रह  जिसमें प्रेम के विविध रं...

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