सपने

सपने मेरे नहीं आपके सपने, हमारे सपने, समाज में व्याप्त विसंगतियां मन को व्यथित करती हैं. संवेदनाओं की पृष्ठभूमि से जन्मी रचनाएँ मेरीनहीं आपकी आवाज हैं. इन आँखों में एक ख्वाब पलता है, सुकून हो हर दिल में इक दिया आश का जलता है. - शशि.
शशि का अर्थ है -- चन्द्रमा, तो चाँद सी शीतलता प्रदान करने का नाम है जिंदगी .
शब्दों की मिठास व रचना की सुवास ताउम्र अंतर्मन महकातें हैं. मेरे साथ सपनों की हसीन वादियों में आपका स्वागत है.

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Friday, December 2, 2016

बूझो तो जाने। ..

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१ 
सुबह सवेरे रोज जगाये 
नयी ताजगी लेकर आये 
दिन ढलते, ढलता रंग रूप 
क्या सखि साजन ?
नहीं सखि  धूप
२ 

साथ तुम्हारा सबसे प्यारा 
दिल चाहे फिर मिलूँ दुबारा 
हर पल बूझू , एक पहेली 
क्या सखि साजन ?
नहीं सहेली।
३ 

रोज,रात -दिन, साथ हमारा  
तुमको देखें दिल बेचारा  
पल जब ठहरा, मैं, रही खड़ी 
क्या सखि साजन ?
ना सखी घडी।
४ 

तुमसे ही संसार हमारा  
ना मिले तो दिल बेचारा
पाकर तुमको हुई धनवान  
क्या सखि साजन ?
नहीं सखि ज्ञान।

शशि पुरवार 

Monday, November 28, 2016

नोटबंदी

         आज देश लाइन में लगा है, वैसे भी लोगों को लाइन में लगने की आदत सी है, कोई नयी  फिल्म का पहला दिन हो तो टिकिट खिड़की पर लंबी लाइन ,जैसे पहले दिन ही किला फतह करना हैं. फ़िल्मी सितारों के दर्शन हों या लालबाग का राजा , स्कूल में एडमिशन हो या परीक्षा के फॉर्म,जिओ फ्री फ़ोन मिले या रिचार्ज , राशन - पानी या  पेट्रोल - या  चौकी धानी, हर जगह लाइन का अनुशासन बरक़रार है इसीलिए सरकार को हमारी दरकार है। फिर नोट बदलने  के लिए इस लंबी लाइन  पर  विपक्ष काहे भड़क रहा है, अब का करें मिडिया को भी रोज तमाशा देखने की आदत पड़ गयी है।  तमाशा करना हमारा जन्मसिद्ध अधिकार हैं। हर तरफ मचा हुआ हाहाकार हैं। सालों पहले  ५ -१० पैसा, चवन्नी और रूपया न जाने कितने सिक्के गुमनाम हो चुके हैं ..  
             हमारी आम जनता पहले भूख से मरती थी आज लाइन से मर रही है.  गरीब बेचारा मरता  क्या न करता, पेट की दरकार है ,अव्यवस्था व्याप्त है। धन मिले तो धान्य मिले। इसी बात की तकरार है।  
      अब घर कैसे चले, आज हम भी उसी स्थिति में है. आठ दिन हो गए सब्जी का मुँह नहीं देखा,थाली से सब्जी गायब हो गयी। कभी दाल गायब तो कभी सब्जी गायब। क्या थाली को भी चैन नहीं मिलता है. जो धन था वह धन न रहा,  सरकार जीजान कोशिशों के बाबजूद आज  भी एटीम का पेट  खाली है,  पैसा बैंक में आ रहा है तो  कहाँ जा रहा है ? 
    हम जब बैंक गए तो वहां कोई बड़े धनवान सज्जन ने  मैनेजर से कहा डेढ़  लाख जमा करना है और निकालना भी है। मैनेजर गाय की तरह सिर हिलाकर बोला -  सर एक दिन रुकिए ,काम हो जायेगा, अभी बैंक खाली है।  भाई डेढ़ एक लाख एक दिन में खा लेंगे ? अब समझ में आया गरीब, किसान ,मध्यमवर्गीय की लाइन कम क्यों नहीं हो रही है।  
            बाजार में  लोग मक्खी मारने की कोशिश कर रहें हैं किन्तु मक्खियाँ भी होशियार निकली। कहीं नजर नहीं आ रही है। हमने एक आदमी से  पूछा फैसला गलत है क्या ? बेचारे ने  सिंह बनकर ऐसी नज़रों से हमें देखा जैसा अभी खा जायेगा।  ऑटो वाले साथ बैठकर समय गुजार रहें है.  सवारियाँ  नहीं है फिर भी संतोषजनक मुद्रा है।  इस कतार ने देश में भाईचारा  बढ़ा दिया है।जिसे पिंक रानी मिल गयी उसे मुस्कुरा कर ऐसे  ख़ुशी से विदा कर रहें है। जैसे कोई विजेता।  
        
        हमें भी बड़ी तकलीफों  के बाद एटीम से  एक गुलाबी नोट मिला सोचा रेजगारी ले आएं। कल हम एक सेन्डविच की दुकान पर गए दो सेन्डविच लेकर खाये तो उसने १०० की पत्ती ले ली. हमने कहा भैया इतना मँहगा क्यों?तो बोला छुट्टे पैसे नहीं है। सब्जी वाले के पास गए तो बोला - पूरा  १०० की ले लो छुट्टे पैसे नहीं है। एक पत्ती थी वह भी गयी , कोई गुलाबी नया धन लेने के लिए तैयार नहीं है। हे राम कैसे दिन आ गए. हर जगह मारामारी है, पर बाजार में रेजगारी नहीं  है, जो लोग खर्च कर रहें हैं वह पैसा कहाँ जा रहा है।  भाई हमें तो अब छुपाने से भी डर लगता है।  
      काला धन कहाँ है काले धन वाले कहाँ है, सोशल मीडिया में वोटिंग की जा रही है कि  फैसला सही है या गलत. दुनिया भर के अखबार इस फैसले  पर सकारात्मक मोहर लगा चुके हैं , हर जगह वाह वाही है ,भाई उन्हें तो शब्द खर्च करने हैं यहाँ आकर पैसा खर्च करें कतार  में लगे तो समझ आएगा। पैसा है फिर भी पेट खाली है।  
           हमें काला धन तो पता नहीं लेकिन गुलाबी नया धन हमारी नैया पार नहीं कर पा रहा है। हम  बेचारे ईमानदारी के मारे हैं. न पैसा है न वोट ,  हम तो  सबसे हारें हैं। फिर भी ससुरे कह रहें है अच्छे दिन आने वाले हैं.   अच्छे दिन का पता नहीं  लेकिन  नियम कायदे रोज भेष बदल कर जिंदगी में सेंध लगा रहें हैं.नित नए कायदे से हम जैसी आम पत्नियां घबरा सी गयी हैं। बेचारी पति से धन बचाकर सोना खरीदती थी आज वह भी टैक्स माँग रहा है, हाय री किस्मत पतिदेव का बस चले तो हमें काला पानी की सजा दे दें।  पहले गृहणी इस कला  के कारण सुघड़ मानी जाती थी लेकिन अब  हमारी सुघड़ता की कला ने हमारे धन को संदिग्धता  के घेरे में लाकर खड़ा कर दिया था.  भले ही सरकार  ने इस राशि को मान्यता दी है किन्तु पतिदेव की प्रश्नवाचक निगाहों ने इसे अमान्य करार कर दिया।  हाय धन भी गया और भेखुल गया.  हाथ खाली के खाली।   बेचारा दिल कहता है -- जाने वाले हो सद के तो लौट के आना।  
             भाई नुक्स निकालना हमारा जन्मसिद्ध अधिकार है.  देश हो या नियम कायदे हम तो नुक्स निकालेंगे। जल्दी ही चुनाव होंगे लेकिन उसके पहले ही लोगों के हाथों में स्याही लगी होगी, कहीं आग लगी होगी तो कहीं धुआँ उठेगा। अब फिर दिल ढूंढता है फिर वही फुरसत के  चार दिन।  
------ शशि पुरवार 
पुणे महाराष्ट्र 

Wednesday, November 16, 2016

प्रीत पुरानी

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१ 
प्रीत पुरानी
यादें हैं हरजाई 
छलके पानी। 
२ 
नेह के गीत 
आँखों की चौपाल में 
मुस्काती प्रीत 
३ 
सुधि बैचेन 
रसभीनी बतियाँ 
महकी  रैन 
४ 
जोगनी गंध 
फूलों की घाटी में 
शोध प्रबंध 
५ 
धूप चिरैया 
पत्थरों पर बैठी 
सोनचिरैया 
.-----शशि पुरवार  

Tuesday, November 8, 2016

जिओ जिंदगी -


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हाईटेक होती जिंदगी ने  दिमाग की बत्तियां जैसे गुल कर दी हैं, अँधेरे में जलता एक दीपक रौशनी का प्रतिक है  आज हाथों में  जलते मोबाइल की रौशनी से दुनियां  रौशन है, दशहरा हो या दिवाली बाजार में उपलब्ध नए संशाधन व्यापार को नयी ऊंचाई  प्रदान कर रहें हैं. जिओ और जीने दो की तर्ज पर जीने के मायने बदल गएँ हैं. पहले दिवाली पर मिठाई  बाँटी जाती थी आज फ्री नेट पैक का  तोहफा पाकर लोग खुद को भाग्यवान समझते हैं, चोर तो आखिर चोर ही होता है, एक अँगुली पकड़कर पूरा हाथ कब काट देगा, यह हाथ कटने के बाद ही पता चलता है. अब हाथ कटे या जेब बात एक ही हैं. आज बदल दो जिंदगी ने जिंदगी को सच में ही बदल दिया है। 
       अर्थव्यवस्था औंधे मुँह गिरकर भी ढोल बताशे बाँट  रही है. ह्रदय में धधकती आग गप्पे बाजी से ही संतुष्ट है. लोगों को जीने का माध्यम मिल गया है, पहले गॉँव में चौपाल लगती थी आज फेसबुक, ट्विटर, ब्लॉग, हाइक , वाट्सअप की चौपाल लगती है. अलग बगल बैठे घर के दो लोग भी इस चौपाल का आनंद लेते है। बतकही आमने सामने कहीं कोसो दूर है.  पुराना नए रूप को धारण करके पुनर्जीवित हो गया है. महल हो या झोपडी थाली बिना मोबाइल -नेट के अधूरी है, आज भिखारी भी कहते है भैया कुछ न दो नेट पैक डलवा दो, जिंदगी तो जिओ के संग बन गयी। नया रंग अब जिओ के संग हाजिर है। 
सत्ता धारी  के मजबूत दाबे फुस्सी बम की तरह फट कर सत्ताहीन हो रहें हैं. इन्हें  किसी तिजोरी में ससम्मान बंद कर देना चाहिए।  आतंकवादी की जड़े मजबूत हो गयीं है , जैसे साक्षात् यमराज धरती पर उतर आएं हैं. देश में गाय -बैल की संख्या में वृद्धि हुई है, जहाँ बैल दिखा तो समझो  अपनी बारी आ गयी है, नगरनिगम पर केस दर्ज हैं  वह गाय बैलों की दादागिरी से परेशान होकर खुद ही दुबक कर बैठ गएँ है , आज सड़कों पर  गाय बैलों का राज्य फल फूल रहा है। गरीब चाय वाले को कुछ बोनस दे देते तो भला हो जाता।
        आतंकी रावणों ने इंसानों को उड़ाकर त्यौहार मनाना अपना धर्म समझ लिया है, जैसे सबकी साँठगाँठ हो गयी है, अस्पताल, पब्लिक, सरगना, अर्थव्यवस्था, सत्ता, सत्ताधारी कोई भी इससे अछूता नहीं रहा है. मँहगाई का बैल निरंतर अपनी सफलता की कहानी दर्ज कर रहा है. बादाम औंधे मुंह गिर गया है आलू ने सेंसेक्स की तरह अपनी ऊंचाई दर्ज की है, दिवाली में बम पटाखें की गूँज कैसी होगी ईश्वर जाने या सत्ता धारी जाने, अहंकार  के  रावण का कद बढ़ता जा रहा है , विनम्रता के राम को आज चिराग लेकर ढूँढना होगा।                
             हे राम का नया स्वरुप हाय राम हो गया है।  जिओ वाले बाबू अब सारे मंत्र सीखा देंगे।  हम तो दिवाली  पूजन की रस्म निभाकर  लक्ष्मी को खुश करने का प्रयास करेंगे, लक्ष्मी जी  के संग जिओ वाले बाबू की  किरपा बनी रहे।अब दिल मांगे मोर की तर्ज पर दिल कहता है जिओ वाले बाबू जरा गाना बजा दो, जिओ वाले बाबू जरा जीना सीखा दो। ...... हर दिन जिओ शुभकामनाएँ।    
शशि पुरवार 


     

Saturday, October 1, 2016

चोर की दाढ़ी में तिनका

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मुस्कुराईये कि आप फेसबुक पर हैं, गुनगुनाईये कि आप फेसबुक पर हैं, कुछ हसीन लम्हे कुछ चंचल शोखियाँ, कहीं नखरा कहीं गुमानियाँ, एक सपना जो जीवन को हसीन बना रहा है, कहीं ख्वाब जगा रहा हैं, कहीं दिल सुलगता है. कहीं आग जलती है तो रोटियां भी सिकती हैं. जिंदगी तेरे बिना कुछ भी नहीं .... दुनियाँ इतनी हसीन है यह सोचा भी नहीं. एक नशा जो नशा बनकर होश उडाता है तो कहो होश जगाता है. देखा जाये तो यह चोर है दिल का चोर जो आपका चैन लूटकर खुद चैन की साँस ले रहा है. एक ऐसा चोर जिसकी दाढ़ी में तिनका भी है।  कहीं चोर की दाढ़ी में कहीं तिनका तो नहीं !

           आज शर्मा जी  आज सुबह से छत को नापने में लगे हुए थे। कदमों की मार से छत बेहाल थी, शर्मा जी के हाल -बेहाल के कारन का यो पता नहीं किन्तु शर्मा जी की पत्नी की जासूसी निगाह कुछ ज्यादा की गोल घूम रही थी, दिमाग ताड़ गया था कि  दिल में आग भभक रही है, कहीं कुछ खिचड़ी पकी है नहीं तो दाल ही काली है। आग में घी तो डाला तो स्वयं के हाथ जलने का भय था. किन्तु शर्मा जी के पेट की आग बुझाकर उसे रबड़ी बनाने का मन जरूर बना लिया था, नहीं तो यह आग उन्हें भी झुलझा सकती थी . रसोई से भजिये तलने की खुशबु बड़ी बड़ी उड़ाने भर रही थी. पड़ोस के वर्मा जी की नाक जैसे कुत्ते की तरह उस खुशबु के पीछे लग गयी। आज  सुबह से छत नापने की आवाज से  सारे कमरों में जैसे तबले की थाप सरगम बजा रही थी तिस  पर रसोई से शर्मा जी की पत्नी की गुनगुनाहट अपना हाल खुशबु के संग भेजकर जैसे सीने पर नश्तर चला रही हो !
  पड़ोस के वर्मा जी से रहा नहीं गया तो पूछ बैठे ---क्या हुआ शर्मा जी क्यों बेचारी छत पर मूंग दल रहे हो। भाभी जी कुछ ख़ास तैयारी कर रही है जाओ भाई. मजे करो हो सके तो एक प्लेट हमें भी धीरे से सरका देना, ससुरी जबान से रहा नहीं जा रहा है.
    शर्मा जी -- क्यों  मन में कोई  लड्डू रहा है , लड्डू न हुआ कोई बम हुआ। यह आग तुम्हारी ही लगायी हुई थी. तुम्हारी लार टपक रही है . अरे भागवान की    नज़रे किसी पुलिस वाले की दी हुई जागीर है, झट रपट लेने लगेंगी.
वर्मा  – काहे का हुआ? काहे लाल पीले हो रहे हो, आज किसी से बात नहीं हुई का? जाओ  तनिक एक दो लाइन छाप दो, सब् मूड अच्छा हो जायेगा . हमरा साथी फेसबुक है ना!
शर्मा जी --- बस करो नामाकुल, काहे इस बुढापे में तारे दिखा रहे हो. अरे तुमने भरी जवानी का फोटो लगाकर हमें अपने दिन याद दिला दिए. तो हमने भी दिल को जवान कर लिया.
वर्मा जी – तो क्या हुआ, जिंदगी आखिरी साँस तक जिओ .... दिल जवान ही होना चाहिए.

शर्मा – अरे साँस वांस छोडो. हमारी तो साँस निकलना बाकी है, सुनने में है कि फेसबुक की सारी चाट और मसाला ओपन हो जायेगा, वैसे भी राज कब था? मसाले का आनंद लेने हेतु कई सिपाई मिसाइल के साथ तैयार है, कई कारावास में जाने के भय में गुम है .. चोर की दाढ़ी में तिनका।   अब क्या होगा कालिया। सबको चाट की प्लेट हाथ में थमा दी जाएगी तब खूब खाना
वर्मा – हमें कालिया बोला भक .....हुन्न्न    ऐसा क्या किया जो दुम दबाकर भाग रहे हो. जरुर कुछ घोटाला किया होगा,तुम्हरे  साथ हमरी की नाक ख़राब हो जाएगी . किसने कहा था इधर उधर मुँह मारो, जीभ लपलपाओ ....
शर्मा – बस भी करो,जाओ जाओ ........ बड़े आये ब्रेड पर मख्खन लगाकर खाने .! ऐसा कुछ नहीं कहा, दो शब्द प्रेम की जलेबी खा ली तो जुर्म हो गया.
वर्मा – तनिक उम्र का तो ख्याल रखा होता, दुनिया गोल है, अब भजिये खा लो, अच्छे से तल गए होंगे
शर्मा जी -- जैसे ठन्डे पानी से नहाकर बाहर आयें हो. का करें पत्नी शेरनी की तरह खूंखार दहाड़ मारती है, दूर से बैठकर जलेबी खा ली तो  शुगर की बीमारी भी इस फेसबुकियो को लग गयी है.
  किन्तु हम का करे यही तो कहता है – अंखियों से गोली मारो ..जब भी खोलो ससुरा भक से कहता था –
अपने मन की कुछ बात लिखो, आपकी यादेँ है कुछ कहो सो हमने कह दिया, हमरे देश में यही होता है कोई बार बार कहे कुछ लिखो, कुछ कहो, तो मान रखना पड़ता है. हमने भी उसका मान रखा इसमें हमरी का गलती है. हमें बचपन से यही सिखाया गया है सबका मान करो, सो हमने कर दिया, अब दिल उमंगें लेता है तो हम झूठ थोड़े ही बोलेंगे, झूठ बोलना पाप होता है , हमने पान थोड़े ही किया है . मासूम से बच्चे का दिल है.  अब चोर सिपाही का खेल खेलने लगा है . तौबा की आगे से जो इसके साथ पान खाया, फिलहाल अब चलो भजिये खा ही लेते हैं.

   देखे अब क्या नए गुल खिलाता है, हमने भी सोच लिया जो होगा सो होगा .जब कहेगा कुछ लिखो तो लिख देंगे – चोर की दाढ़ी में तिनका .
                  - शशि पुरवार 

Monday, September 5, 2016

क्रोध बनाम सौंदर्य -

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आज सरकारी आवास पर बड़े साहब रंग जमाए बैठे थे. वैसे तो साहब दिल के बड़े गरम मिजाज है, लेकिन आज बर्फ़ीला पानी पीकर, सर को ठंडा करने में लगे हुए है।  सौंदर्य बनाम क्रोध की जंग छिड़ी हुई है। आज महिला और पुरुष समान रूप से जागरूक है. यही एक बात है जिसपर मतभेद नहीं होते है।  कोई आरक्षण नहीं है ? कोई द्वन्द नहीं है, हर कोई  अपनी काया को सोने का पानी चढाने में लगा हुआ है। ऐसे में साहब कैसे पीछे रह सकते हैं.  हर कोई सपने में खुद को  ऐश्वर्या राय और अमिताभ बच्चन के रूप में देखता है।   साहब इस दौड़ में प्रथम आने के लिए बेक़रार है। बालों  में  बनावटी यौवन टपक रहा हैं,
किन्तु बेचारे पेट का क्या करे ? ऐसा लगता है जैसे शर्ट फाड़कर बाहर निकलने को तैयार बैठा हो. कुश्ती जोरदार है। चेहरेकी लकीरें घिस घिस कर चमकाने के प्रयास में चमड़ी दर्द से तिलमिला कर अपने रंग दिखा गयी है।
भाई इस उम्र में अगर अक्ल न झलके तो क्या करे।  अक्ल ने भी भेदभाव समाप्त करके घुटने में अपना साम्राज्य स्थापित करना प्रारम्भ कर दिया है। बेचारा घुटना दर्द की अपनी दास्तां का राग गाता रहता है।
         अब क्या करे  साहब का गुस्सा तो बस बिन बुलाया मेहमान है, जब मर्जी नाक से उड़ कर मधुमक्खी की तरह अपना डंक मारकर  लहूलुहान करता है। शब्द भी इस डंक की भाँति अंत तक टीसते रहते है।  वैसे गुस्से में शब्द  कौन से कहाँ गिरे, ज्ञात ही नहीं होता है, बेचारे शब्दों को, बाद में दिमाग की बत्ती जलाकर ढूँढ़ना पड़ता है। अब शब्दों की जाँच नहीं हो सकती कि ज्ञात हो कौन से पितृ शब्द से जन्मा है।  भाषा क्रोध में अपना रंग रूप बदल लेती है।  क्रोध में कौन सा शब्द तीर निकलेगा,  योद्धा को भी पता नहीं होता।  आज के अखबार में सौंदर्य और क्रोध के तालमेल के बारे में सुन्दर लेख उपाय के संग दुखी हारी लोगों की प्रेरणा बना हुआ था।  ख़बरें पढ़ते पढ़ते शर्मा जी ने साहब को सारे टिप्स  चाशनी में लपेटकर सुना दिए.

 साहब -- जवां रहने का असली राज है गुस्से को वनवास भेजना, गुस्सा आदमी को खूँखार बना देता है। आदमी को ज्ञात नहीं होता वह वह कब पशु बन गया है।
 गुस्से में  उभरी हुई आकृति को यदि  बेचारा  खुद आईने में देख ले, तो डर जाये।  टेढ़ी भौहें, अग्नि उगलती से आँखे, शरीर का कम्पन के साथ  तांडव  नृत्य, ऐसी  भावभंगिमा कि जैसे ४२० का करंट पूरे शरीर में फैला देती हैं. सौम्य मधुरता मुखमण्डल को पहचानने से भी इंकार  कर देती है।

      क्रोध के  कम्पन से एक बात समझ आ गयी कोई दूसरा क्रोध करे या न करें हम उसके तेवर में आने से पहले ही काँपने लगते है।  अगले को काहे मौका दें कि वह हम पर अपना कोई तीर छोड़े।
           क्रोध की महिमा जानकार साहब  क्रोध को ऐसे गायब करने का प्रयास कर रहे हैं जैसे गधे से सिर से सींग. सारे सहकर्मी  पूरे शबाब पर थे।  एक दो पिछलग्गू भी लगा लिए और साहब की चम्पी कर डाली।भगवान् जाने  ऐसा मौका मिले न मिले।  अन्य  सहकर्मी -- साहब योग करो, . व्यायाम करो.........

साहब ने बीच में ही कैंची चला दी और थोड़ा शब्दों को गम्भीरता से  चबाते हुए बोले -- क्या व्यायाम करें।बस आड़े टेढ़े मुँह बनाओ, शरीर को रबर की तरह जैसा चाहो वैसा घुमा कर आकार बनो लो।  लो भाई क्या उससे हरियाली आ जाएगी।

          फिर  खिसियाते हुए जबरन हे हे हे करने लगे, अब क्रोध तो नहीं कर सकते तो उसे दबाने के लिए शब्दों को चबा लिया, जबरजस्ती होठों - गालो को तकलीफ देकर हास्य  मुद्रा बनाने का असफल प्रयास किया। बहते पानी को कब  तक बाँधा जा सकता है ऐसा ही कुछ साहब के साथ हो रहा था।  आँखों  में  बिजली ऐसी कड़की कि आसपास का वातावरण और पत्ते पल में साफ़ हो गए।

       क्रोध के  अलग अलग अंदाज  होते है , मौन धर्मी क्रोध जिसमे मुँह कुप्पे की फूला रहता है।  कभी आँखे अपनी कारगुजारी दिखाने हेतु तैयार रहती है , कभी कभी मुँह फूलने की जगह पिचक जाता है तो आँखों से दरिया अपने आप बहने लगता है.  कभी कभी क्रोध की आंधी ह्रदय की सुख धरनी को दुःख  धरनी बना देती है।  चहलकदमी की सम्भावनाएं बढ़ जाती है, सुख चैन लूटकर  पाँव गतिशील हो जाते हैं व कमरे या सड़क  की लम्बाई ऐसे नापते है कि मीटर भी क्या नापेगा। शरीर की चर्बी अपने आप गलनशील हो जाती है ,  तो क्रोध एक  रामवाण इलाज है, मोटापे को दूर करने का?  यह भी किसी योग से कम नहीं है । 
  एक ऐसी दवा जो बहुत असरकारक होती है , मितभाषी खूब बोलने लगते है और  अतिभशी मौन हो जाते है या अति विध्वंशकारी हो जाते है। कोई गला फाड़कर चिल्लाता है तो कोई चिल्लाते हुए गंगा जमुना बनाता है।  कोई शब्दों को पीता है तो उसे चबाकर नयी भाषा का जन्म देता है।

 आज साहब को क्रोध का महत्व समझ आया, सोचने लगे ---   वैसे गुस्से से बड़ा  कोई बम नहीं है। गुस्सा करके हम तर्कों से बच सकते है. विचारों को नजर  अंदाज कर सकते है। कुछ न आये तो क्रोध  की आंधी सारे अंग को हिलाकर गतिशील बना देती है।  सौंदर्य योग हेतु यह योग कोई बुरा नहीं है अभी इसका महत्व लोगों को समझ नहीं आया जल्दी शोध होने और नया क्रोध पत्र बनेगा।
सोच रहा हूँ मैं भी क्रोध बाबा के नाम से अपना पंडाल शुरू कर देता हूँ।  तब अपने दिन भी चल निकालेंगे, फिलहाल १०० करोड़ की माया को माटी में मिलने से बचाने के लिए संजीवनी ढूंढनी होगी , हास्य संजीवनी।  अब क्रोध का बखान आधा ही हुआ है  कहीं आपको तो गुस्सा नहीं आ रहा है ?
-- शशि पुरवार

Monday, August 22, 2016

सुख की मंगल कामना








बाबुल के अँगना खिला, भ्रात बहन का प्यार 
भैया तुमसे भी जुड़ा, है मेरा संसार। 

माँ आँगन की धूप है, पिता नेह की छाँव 
भैया बरगद से बने , यही प्रेम का गॉँव 

सुख की मंगलकामना, बहन करें हर बार 
पाक दिलों को जोड़ता, इक रेशम का तार 

चाहे कितने दूर हो, फिर भी दिल से पास 
राखी पर रहती सदा, भ्रात मिलन की आस 

प्रेम डोर अनमोल ये, जलें ख़ुशी के दीप 
माता के आँचल पली, बेटी बनकर सीप 
-- शशि पुरवार 


Sunday, July 24, 2016

अाँख जो बूढ़ी रोई





खोई खोई चांदनी, खुशियाँ भी है दंग

सुख दुख के सागर यहाँ, कुदरत के हैं रंग
कुदरत के हैं रंग, न जाने दीपक बाती
पल मे छूटे संग, समय ने लिख दी पाती
शशि  कहती  यह सत्य, अाँख जो बूढ़ी रोई
ममता चकनाचूर, छाँव भी खोई खोई।  
      

जाने कैसा हो गया, जीवन का संगीत

साँसे बूढ़ी लिख रही, सूनेपन का गीत
सूनेपन का गीत, विवेक तृष्णा से हारा
एकल हो परिवार, यही है जग का नारा
शशि कहती यह  सत्य,  प्रीत से बढ़कर पैसा
नही त्याग का मोल, हुअा वक़्त न जाने कैसा।
शशि पुरवार 

Friday, July 15, 2016

सुधि गलियाँ





 स्वप्न साकार
मुस्कुराती है राहें 
दरिया पार। 
२ 
धूप सुहानी 
दबे पॉँव लिखती 
छन्द रूमानी। 
३ 
लाडो सयानी 
जोबन दहलीज 
कच्चा है पानी।  
धूप बातूनी 
पोर पोर उन्माद 
आँखें क्यूँ सूनी ?
५ 
माँ की चिंता 
लाडो है परदेश 
पाती, ममता। 
६ 
दुःखो को भूले 
आशा का मधुबन 
उमंगे झूले। 
७ 
प्रीत पुरानी 
सूखे गुलाब बाँचे 
प्रेम कहानी। 
८ 
छेड़ो न तार 
रचती सरगम 
 हिय झंकार। 
९ 
प्रेम कलियाँ 
बारिश में भीगी है 
सुधि गलियाँ। 
१० 
 आई जबानी  
छूटा है बचपन 
बद गुमानी। 
 -- शशि पुरवार 



Monday, July 11, 2016

मौसम से अनुबंध


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१ 
लहक उठी है जेठ की,  नभ में उड़ती धूल
कालजयी अवधूत बन, खिलते शिरीष फूल।
 २
चाहे जलती धूप हो, या मौसम की मार
हँस हँस कर कहते सिरस, हिम्मत कभी न हार.

लकदक फूलों से सजा, सिरसा छायादार
मस्त रहे आठों पहर, रसवंती संसार।

हरी भरी छतरी सजा, कोमल पुष्पित जाल    
तपकर खिलता धूप में, करता सिरस कमाल।

फल वृक्षों के कर रहे, मौसम से अनुबंध
खड़खड़ करती बालियाँ, लिखें मधुरतम छन्द।
 --  शशि  पुरवार

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