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Saturday, November 17, 2018

बूढ़ा हुआ अशोक

बरसों से जो खड़ा हुआ था 
बूढ़ा हुआ अशोक 

हरी भरी शाखों पर इसकी 
खिले हुए थे फूल 
लेकिन मन के हर पत्ते पर 
जमी हुई थी धूल
आँख समय की धुँधली हो गई 
फिर भी ना कोई शोक 

मौसम की हर तपिश सही है 
फिर भी शीतल छाँव  
जो भी द्वारे उसके आया 
लुटा नेह का गॉँव 
बारिश आंधी लाख सताए 
पर झरता आलोक 

आज शिराओं में बहता है 
पानी जैसा खून 
अब शाखों को नोच  रहें हैं 
अपनों के नाखून 
बूढ़े बाबा की धड़कन में 
ये ही अपना लोक 

बरसों से जो खड़ा हुआ था
बूढ़ा हुआ अशोक

शशि पुरवार 


हिंदी की चिन्दी

हिंदी दिवस की तैयारी पूरे जोश - खरोश के साथ की जा रही थी। आजकल हर वस्तु  छोटी होती जा रही है।  मिनी कपडे।  मिनी वस्तुएँ।  हर  वस्तु छोटी ...

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