ब्लॉग सपने - जीवन के रंग अभिव्यक्ति के साथ, प्रेरक लेख , कहानियाँ , गीत, गजल , दोहे , छंद

Friday, March 21, 2014

नवगीत -- अब्बा बदले नहीं




अब्बा बदले नहीं
न बदली है उनकी चौपाल

अब्बा की आवाज गूँजती
घर आँगन  थर्राते है
मारे भय के चुनियाँ मुनियाँ
दाँतों , अँगुली चबाते है

ऐनक लगा कर आँखों पर
पढ़ लेते है मन का हाल

पूँजी नियम- कायदों की हाँ
नित प्रातः ही मिल जाती है
टूट गया यदि  नियम , क्रोध से
दीवारे हिल जाती है

अम्मा ने आँसू पोंछे गर
मचता  तुरत  बबाल

पूरे  वक़्त रसोईघर  में
अम्मा खटती रहती है
अब्बा के संभाषण अपने
कानों सुनती रहती है

हँसना  भूल गयी है
खुद से करती यही सवाल
--  शशि पुरवार
 २१ /१०/१३


अनुभूति में प्रकाशित  गीत  -----

 अनुभूति में शशि पुरवार की रचनाएँ -
 



Monday, March 17, 2014

होली के रंग छंदो के संग ----





छन्न पकैया  छन्न पकैया, ऋतु बसंत है आयी
फिर कोयल कूके बागों में ,झूम  रही अमराई

२ 
छन्न पकैया छन्न पकैया, उमर हुई है बाली
होली खेलें जीजा - साली, बीबी देती गाली


छन्न पकैया छन्न पकैया ,दिन गर्मी के आये
ठंडा मौसम , ठंडा पानी, होली मनवा भाये।


छन्न पकैया छन्न पकैया ,होली है मनरंगी
कैसे कैसे नखरे करते ,खेले साथी संगी .
५ 
छन्न पकैया छन्न पकैया ,नेट  बड़ा है पापी
थोडा थोडा लिखने आती , होती आपाधापी। 
  ६
छन्न पकैया छन्न पकैया ,मजा फाग का आया
दीवानो की टोली घूमे , रंग गुलाल लगाया
  ७
छन्न पकैया छन्न पकैया ,गाँवो का है  दर्जा
पर्चे  बाँटे  महंगाई ने ,लील रहा है  कर्जा
 ८
छन्न पकैया छन्न पकैया ,गुझिया मन को भायी
भंग मिला कर  पकवानो में , होली खूब मनायी
 ९
छन्न पकैया छन्न पकैया ,रंगा रंग भयी  होली
छंदो के रस में भीगी है , सबकी मीठी बोली
१० 
छन्न पकैया छन्न पकैया ,छंदो का क्या कहना
एक है हीरा  दूजा मोती, बने कलम का गहना
११ 
छन्न पकैया छन्न पकैया ,राग हुआ है  कैसा
प्रेम रंग की होली खेलो ,दोन टके का पैसा
१२ 
छन्न पकैया छन्न पकैया ,रंग भरी पिचकारी
बुरा न मानो होली है ,कह ,खेले दुनिया सारी
१३ 
छन्न पकैया छन्न पकैया , होली खूब मनाये
बीती बाते बिसरा दे ,तो , प्रेम निति अपनाये
१४ 
छन्न पकैया छन्न पकैया ,दुनिया है सतरंगी
क्या झूठा है क्या सच्चा है, मुखड़े है दो रंगी
१५ 
छन्न पकैया छन्न पकैया , बजे हाथ से ताली
छेड़े जीजा साली भागे ,मेरी ,आधी घरवाली .
१६ 
छन्न पकैया छन्न पकैया , सासू जी मुस्कायी
देवर - भाभी होली खेले , सैयां पे बन आयी।
१७ 
छन्न पकैया छन्न पकैया ,प्यारी प्यारी सखियाँ
दूर दूर से मिलने आय़ी ,करती प्यारी बतियाँ
    -- शशि पुरवार 
१६ मार्च २०१४ 

कुछ माहिया
ऐ ,री, सखि तुम आओ
रंगो की मस्ती
मेले में खो जाओ .
भंग चढ़ी है ऐसी
झूम रहे सजना
यह होली है देसी
फिर मुखड़ा लाल हुआ
नयनों  में सजना
मन आज गुलाल हुआ।
पकवानो में होड़ लगी
गुझिया ही जीती
शीरे में  खूब पगी
मनभावन यह होली
दो पल में भूले
वैरी अपनी बोली
रंग भरी पिचकारी
छेड़  रहे सजना
सजनी , आज नहीं हारी।

मित्रो हम जरा देर से आये। … :) पर धमाल हो जाये ,समस्त ब्लोगर परिवार को होली की हार्दिक रंग भरी शुभकामनायें। होली के सभी रंग आपके जीवन में भी उमंग भर दे -- हार्दिक शुभकामनायो सहित -- शशि पुरवार

Sunday, February 16, 2014

राग रंग का रोला .... !

सपन सलोने,
नैनो में

जिया, भ्रमर सा डोला है
छटा गुलाबी, गालो को
होले -हौले  सहलाये
सुर्ख मेंहदी हाथो की
प्रियतम की याद दिलाये

बिना  कहे,
हाल जिया का
दो अँखियो ने, खोला है

हँसी ठिठोली, मंगल-गीत
गूँज  रहे है घर, अँगना
हल्दी,उबटन,तेल हिना
खनके हांथो का कंगना

खिला शगुन के
चंदन  से
चंचल मुखड़ा भोला है

छेड़े सखियाँ, थिरक रही
फिर, पैरों की पैंजनियां
बालो में गजरा महके
माथे झूमर ओढ़नियाँ

खुसुर फुसुर की
बतियों ने
कानो में रस घोला है

सखी- सहेली छूट  रही
कल पिय के घर है जाना
फिर ,रंग भरे सपनो  को
स्नेह उमंगो से सजाना

मधुर,
तरानो से बिखरा
राग रंग का रोला है।
-- शशि पुरवार
३० /१ / २०१४

चित्र -  गूगल से आभार 

Wednesday, February 5, 2014

बासंती रंग



1
सपने पाखी
इन्द्रधनुषी रंग
होरी के संग
2
रंग अबीर
फिजा में लहराते
प्रेम के रंग
3
सपने हँसे
उड़ चले गगन
बासंती रंग
4
दहके टेसू
बौराई अमराई
फागुन डोले
5
अनुरक्त मन
गीत फागुनी गाये
रंगों की धुन .

23.03.13
शशि पुरवार
---------------------------------
सदोका ----
1हवा  उडाती
अमराई की जुल्फे
टेसू हुए आवारा
हिय का पंछी 
उड़ने को बेताब
रंगों का समां प्यारा .

2
  डोले मनवा
 ये  पागल जियरा
 गीत गाये बसंती
 हर डाली  पे
खिल गए पलाश
भीगी ऋतू सुगंधी .

3
 झूमे बगिया
दहके है  पलाश
भौरों को ललचाये
कोयल कूके
कुंज गलियन में
पाहुन क्यूँ न आये .

4
झूम रहे है
हर गुलशन में
नए नवेले फूल
हँस रही है
डोलती पुरवाई
रंगों की उड़े धूल .

5
 लचकी डाल
यह कैसा  कमाल
मधुऋतू है आई
 सुर्ख पलाश
मदमाए फागुन
कैरी खूब मुस्काई .

6
जोश औ जश्न
मन  में  है उमंग 
गीत होरी  के गाओ
भूलो मलाल
उमंगो का त्यौहार
झूमो जश्न मनाओ .
24.03.13
शशि पुरवार

Sunday, January 26, 2014

भारत सुख रंजित हो



भारत को कहते थे
सोने की चिड़िया
सुख से हम रहते थे। 
गोरों को भाया था
माता का आंचल
वह ठगने आया था

याद हमें कुर्बानी 
वीरो की गाथा
वो जोश भरी बानी .
कैसी आजादी थी
भू का बँटवारा
माँ की बरबादी थी .

ये प्रेम भरी बोली
वैरी क्या जाने
खेले खूनी होली
.
सरहद पे रहते है
दुख उनका पूछो
वो क्या क्या सहते है

घर की याद सताती 
प्रेम भरी पाती
उन तक पँहुच न पाती .
८ 
बतलाऊँ कैसे मैं
सबकी चिंता है
घर आऊँ कैसे मैं?

हैं घात भरी रातें
बैरी करते हैं
गोली  से बरसातें।
१०
पीर हुई गहरी सी
सैनिक घायल है
ये सरहद ठहरी सी।
११
आजादी मन भाये
कितनी बहनों के
पति लौट नहीं पाये।
१२
है शयनरत ज़माना
सुरक्षा की खातिर
सैनिक फर्ज निभाना।
१३
एकता से सब मोड़ो
राष्ट्र की धारा
आतंकी को तोड़ो .
१४
स्वर सारे गुंजित हो
गूंजे जन -गन - मन
भारत सुख रंजित हो

-- शशि पुरवार


आप सभी को गणतंत्र दिवस की हार्दिक शुभकामनाएँ -- जय हिन्द जय भारत-- 

Sunday, January 19, 2014

माहिया - बदली ना बरसी



धरती भी तपती है
बदली ना बरसी
वो छिन छिन मरती है .

सपनो में रंग भरो
नैना  सजल हुये
जितने भी जतन करो।

यह चंदा मेरा है
ज्यूँ सूरज निकला
लाली ने आ घेरा है।
माँ जैसी बन जाऊं
छाया हूँ उनकी
कद तक पहुच न पाऊं।
सब भूल रहे बतियाँ
समय नहीं मिलता
कैसे बीती रतियाँ
फिर डाली ने पहने
रंग भरे नाजुक
ये फूलो के गहने .
 डाली डाली  महकी
भौरों की गुंजन
क्यों चिड़िया ना चहकी।
 --------- शशि पुरवार
१/१० / २०१३

Wednesday, January 1, 2014

क्षणिकाएँ --- उगते सूरज की किरणे





क्षणिकाएँ

प्रतिभा --

नहीं रोक सके,
काले बादल
उगते सूरज की किरणें।


सपने --

तपते हुए रेगिस्तान
की बालू में चमकता हुआ
पानी का स्त्रोत, औ
जीने की प्यास.


आशा -

पतझड़ के मौसम में
बसंत के आगमन का
सन्देश देती है,
कोमल प्रस्फुटित पत्तियां।


संस्कार -

रोपे हुए वृक्ष में
मिलायी गयी खाद,
औ खिले हुए पुष्प।


पीढ़ी -

बीत गयी सदियाँ
नही मिट सकी दूरियाँ,
अनवरत चलता हुआ
अंतहीन  रास्ता।


मित्रता -

जीवन के सफ़र में
महकता हुआ
हरसिंगार।
-- शशि पुरवार

Tuesday, December 31, 2013

नये साल की गंध। …… २०१४

नये छंद से, नये बंद से
नये हुए अनुबंध

नयी सुबह की नयी किरण में
नए सपन की प्यास
नव गीतों के रस में भीगी
मन की पूरी आस

लगे चिटकने मन की देहरी
शब्दों के कटिबंध

नयी हवाएँ, नयी दिशाएँ
बरसे नेही, बादल
छोटी छोटी खुशियाँ भी हैं
इन नैनों का काजल

गमक रही है साँस साँस भी
हो कर के निर्बंध

नये वर्ष के नव पन्नों में
नये तराने होंगे
शेष रह गये सपन सलोने
पुनः सजाने होंगे

नयी ताजगी आयी लेकर
नये साल की गंध

--शशि पुरवार
३० दिसंबर २०१३


अनुभूति पत्रिका में प्रकाशित मेरा गीत ---- सभी ब्लोग्गर मित्रो को नव वर्ष की हार्दिक शुभकामनाये , मंगलकामनाये  ....... नव वर्ष आपके जीवन में  खुशियाँ , सुख , समृद्धि लेकर आये। . 

Tuesday, December 24, 2013

एक मुक्तक




इन्तजार कर रहे थे सुख के फूलों का
हिसाब नहीं रखा  दर्द के शूलों का
जिंदगी बीत रही सुबह  कभी तो  होगी
हमने प्यार ही नाम रखा इन गुलों का
--- शशि पुरवार

Tuesday, December 17, 2013

हाइकु -- नवपत्रक



मृदा ही सींचे
पल्लवित ये बीज
मेरा ही अंश।


माटी को थामे
पवन में झूमती
है  कोमलांगी।
 .
ले अंगडाई
बीजों से निकलते
नवपत्रक .
प्रफुल्लित है
ये नन्हे प्यारे पौधे
छूना न मुझे
 ये हरी भरी
झूमती है फसलें
लहकती सी।
तप्त धरती
सब बीजों को मिला
नव जीवन ।
बीजों से झांके
बेक़रार पृकृति
थाम लो मुझे
मुस्कुराती है
ये नन्ही सी कालिया
तोड़ो न मुझे।


 पत्रों पे  बैठे
बारिश के मनके
जड़ा है हीरा।
१०
हवा के संग
खेलती ये लताएँ
पुलकित है

११
संग खेलते
ऊँचे होते पादप
छू लें आसमां

                         -- शशि पुरवार

  नमस्ते मित्रो लम्बे अंतराल के बाद ब्लॉग पर पुनः सक्रियता और वापसी कर रहे है , आशा है आपका स्नेह सदा की  तरह मिलता रहेगा।  -- जल्दी आपसे आपके ब्लॉग पर भी मिलंगे।  स्नेह बनाये रखे -- आप सभी का दिन मंगलमय हो - शशि पुरवार




जेन जी का फंडा सेक्स, ड्रिंक और ड्रग

    आज की युवा पीढ़ी कहती है - “ हम अपनी शर्तों पर जीना चाहते हैं समय बहुत बदल गया है   ….  हमारे माता पिता हमें हर वक़्त रोक टोक करते हैं, क्...

https://sapne-shashi.blogspot.com/

linkwith

🏆 Shashi Purwar — Honoured as 100 Women Achievers of India | Awarded by Maharashtra Sahitya Academy & MP Sahitya Academy