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Saturday, April 5, 2014

अंतर्मन






 अंतर्मन एक ऐसा बंद  घर
जिसके अन्दर रहती है 
संघर्ष करती हुई जिजीविषा,
कुछ ना कर पाने की कसक 
घुटन भरी साँसे 
कसमसाते विचार और
खुद से झुझते हुए सवाल ।
झरोखे की झिरी से आती हुई 
प्रफुल्लित रौशनी में नहाकर
आतंरिक पीड़ा तोड़ देना चाहती है 
इन दबी हुई सिसकती 
बेड़ियों  के बंधन को ,
 सुलगती हुई तड़प
 लावा बनकर फूटना चाहती है 
बदलना चाहती है,उस 
बंजर पीड़ा की धरती को,
जहाँ सिर्फ खारे पानी की 
सूखती नदी है 
वहाँ हर बार वह रोप देती है 
आशा के कुछ बिरबे ,
सिर्फ इसी आस में
कि कभी तो  बंद  दरवाजे के भीतर
ठंडी हवा का ऐसा झोखा आएगा
जो साँसों में ताजगी भरकर 
तड़प को खुले
आसमान में छोड़ आएगा 
और अंतर्मन के घर में होंगी 
झूमती मुस्कुराती हुई खुशियां 
नए शब्दों की महकती व्यंजना 
नए विचारो का आगमन
एवं कलुषित विकारो का प्रस्थान।
एक नए अंतर्मन की स्थापना 
यही तो है अंतर्मन की विडम्बना . 
शशि पुरवार 
२५ /मार्च २०१४

7 comments:

  1. बहुत सुन्दर प्रस्तुति।
    --
    आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा आज शनिवार (05-04-2014) को "कभी उफ़ नहीं की": चर्चा मंच : चर्चा अंक : 1573 में "अद्यतन लिंक" पर भी है!
    --
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
    --
    चैत्र नवरात्रों की शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

    ReplyDelete
  2. कल 06/04/2014 को आपकी पोस्ट का लिंक होगा http://nayi-purani-halchal.blogspot.in पर
    धन्यवाद !

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  3. अन्तर्मन की सोच ....... !!
    कितना खूबसूरत ढंग से अपने शब्दो को प्रेषित किया ...
    साधुबाद !!

    ReplyDelete
  4. अंतर्मन की आस ही जिजीविषा को बचाए रखती है , जीवन को गतिमान भी !
    सुन्दर रचना !

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  5. सकारात्मक सुंदर विचार,सुंदर कविता के लिए आपको हार्दिक बधाई शशि जी!

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  6. मन में विचारों का प्रवाह बना रहे।

    ReplyDelete

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