सपने

सपने मेरे नहीं आपके सपने, हमारे सपने, समाज में व्याप्त विसंगतियां मन को व्यथित करती हैं. संवेदनाओं की पृष्ठभूमि से जन्मी रचनाएँ मेरीनहीं आपकी आवाज हैं. इन आँखों में एक ख्वाब पलता है, सुकून हो हर दिल में इक दिया आश का जलता है. - शशि.
शशि का अर्थ है -- चन्द्रमा, तो चाँद सी शीतलता प्रदान करने का नाम है जिंदगी .
शब्दों की मिठास व रचना की सुवास ताउम्र अंतर्मन महकातें हैं. मेरे साथ सपनों की हसीन वादियों में आपका स्वागत है.

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Friday, December 21, 2012

ताल का जल


बढ़ रहा शैवाल बन
व्यापार काला
ताल का जल
आँखें मूंदे सो रहा

रक्त रंजित हो गए
सम्बन्ध सारे
फिर लहू जमने लगा है
आत्मा पर
सत्य का सूरज
कहीं गुम गया है

झोपडी में बैठ
जीवन रो रहा

हो गए ध्वंसित यहाँ के
तंतु सारे
जिस्म पर ढाँचा कोई
खिरने लगा है
चाँद लज्जा का
कहीं गुम हो गया

मान भी सम्मान
अपना खो रहा .

-- शशि पुरवार

Monday, December 10, 2012

एक सवाल - विकृत दर्पण समाज का .......... ? बाल शोषण




1 -- लघुकथा ---                        ख्वाब

 रोज छोटू को सामने वाली दूकान पर काम करते हुए देखती थी , रोज ऑफिस में चाय देने आता था , हँसता , बोलता  पर आँखों में कुछ  ख्वाब से तैरते थे .एक दिन मैंने उससे कहा
" छोटू पढने नहीं जाते "
"नहीं दीदी समय नहीं मिलता "
"क्यूँ घर में कौन कौन है  "
"माँ ,बापू बड़ी बहन ,छोटी बहन "
"तो सब क्या करते है "
"सभी काम करते है "
"तुम्हे पढना नहीं अच्छा लगता ?"
वह चुप हो गया ,और नीहिर भाव आँखों में था  ,धीरे से बोला ---
" हाँ बहुत मन करता है पढूं , अच्छे अच्छे कपडे पहनू , स्कूल जाऊ  और मै भी एक दिन ऐसे ही नौकरी कर बड़ा इंसान बनू , पर इतने पैसे नहीं है ,जो मिलता है सब मिलकर उससे खाना ले कर आते है ,".........काश  में भी बड़े घर में जन्म लेता .......
             शब्द खामोश हो गए और नयन सजल ,यह सजा भगवान् ने नहीं दी , इंसानों ने ही तो अमीर गरीब बनाये है ,स्वप्न तो सभी की आँखों में एक जैसे ही आते है .
     

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2 लघुकथा ---
स्कूल की अध्यापिका ने बाल शोषण के खिलाफ बहुत कुछ भाषण में कहा , कि बाल श्रम अपराध है , बाल शोषण नहीं करना चाहिए , सबको इसके खिलाफ मिलकर आवाज उठानी चाहिए  .वगैरह ,....!
उनकी बातो से सभी बहुत प्रभावित हुए , सभी बच्चो  के माता पिता ने भी बहुत प्रसन्नता व्यक्त करी कि हमारे बच्चे कितने अच्छे स्कूल में पढ़ते है .मै  उन अध्यापिका से परिचित थी ,बहुत सौम्य स्वाभाव की थी ,हर कोई प्रभावित हो जाता था उनसे , एक दिन किसी कार्यवश एक परिचित के साथ उनके घर जाने का मौका मिला , वह अविवाहित थी और अकेले रहती थी , जब हम पहुचे कोई 10 वर्ष की लड़की ने दरवाजा खोला , ठीक ठाक  कपड़ो में थी वह लड़की , तो वह कोई सदस्य तो नहीं लग रही थी परिवार की ,हम बैठे तो तो उन महोदया ने आवाज  दी ---
"रानी पानी लेकर आओ  और काम हो गया हो तो घर चली जाओ "
" जी मैडम , हो गया "
हम आश्चर्य से देखते रह गए उन्हें , मुझसे रहा नहीं गया मैंने पूछ ही लिया
"क्या यह आपके यहाँ काम करती है ?"
 "अरे नहीं , वह तो मै इसे पढ़ा देती हूँ , स्कूल की फ़ीस भी भरती  हूँ इसकी , कपडे खाना सभी करती हूँ वक़्त आने पर , अब इतना कुछ करती हूँ , तो थोडा घर का काम करा लेने से क्या फर्क पड़ेगा ,आखिर पैसे देती हूँ . इसके माँ -बाप गरीब है , बर्तन का ही काम करते है , वह तो अच्छा है कि यह मेरे पास है तो इसका भला हो गया ,अब यही रहती है मेरे पास , ख़ुशी से ही करती है यह सब   ,वैसे भी तो काम क्या होता है हम दोनों का ....!

मै चकित थी इस दोहरे व्यक्तिव से , एक तरफ बाल श्रम के लिए उनके विचार एवं दूसरी तरफ ऐसा कार्य , क्या समझे इसे  ....दोहरा व्यक्तिव जो आम है आजकल ?

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3 लघु कथा ---  शोषण
 आज आरती के घर में बहुत चहल पहल थी ,9 साल की आरती और 11 प्रकाश  साल का कजिन दोनों अपने नाना के घर पर थे , आज मेहमान भी घर पर आये  थे  , माँ , नानी ,व परिवार के अन्य सदस्य  रिश्तेदारों में व्यस्त थे , बच्चे उधम मचा रहे थे , एक दूर का रिश्तेदार उम्र 24  होगी वह भी था और बीच बीच  में बच्चो  के साथ भी खेल लेता था . इतनी चहलपहल थी कि  ठहाको की आवाजे ही बाहर आती थी . एक दिन सभी आराम कर रहे थे ,बच्चे छत पर खेल रहे थे , आरती वैसे ही खेल रही थी और प्रकाश पतंग उड़ा रहा था ,अपने दोस्त के साथ . थोड़ी देर में  वह लड़का जिसे मामा कह रहे थे बच्चे  ,छत  पर आया और बच्चो के साथ खेलने लगा , फिर खेलते खेलते आरती से बोला ---
 "चलो हम थोड़ी देर बैठते है और चाकलेट खाते है इनको पतग उड़ाने  दो , "
" नहीं मामा यही पर खेलना है , मुझे नहीं बैठना "
" अब यह तो नहीं खेल रहे है फिर ....." बात काट कर आरती बोली --
" नहीं मुझे कहीं नहीं जाना , मै  यही खेलूंगी "
"ओह हो....... तो खेलना है तुम्हे ,चलो हम कुछ और खेलेंगे "
" सच्ची में ......"
"हाँ , चलो वहां छत  के कोने में ,अब प्रकाश  तुम्हे  पतंग नहीं दे रहा है  तो , हम भी उसे नहीं खिलाएंगे "
" ठीक है मामा ,हम क्या खेलेंगे ?
" आओ मै  बताता हूँ , पर किसी से कुछ नहीं कहना , नहीं तो सब मारेंगे  तुम्हे और मै फिर नहीं खेलूंगा ,
" जैसा मै कहता हूँ वैसा ही करो ....."
         और  छत  पर उस तथाकथित मामा ने  जो खेल खेला वह  आरती समझ ही नहीं सकी ,और दर्द ,डर से पीड़ित हो गयी , और मामा ने कहा --
"   अरे डरो मत सब ठीक हो जायेगा , पर किसी से कुछ कहना नहीं ." धीरे से धमकी .
 आज रिश्तो का खून हो चूका था , कैसे अपनों पर भी विश्वास किया जाये ,आज रिश्ते नाते भी कठघरे में है ,जो अपनी गन्दी  विकृत मानसिकता के चलते  मासूम बचपन के मन व जीवन और रिश्तो  पर काले  घाव  के निशाँ अंकित कर  देते है . 
-----       शशि पुरवार


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4 कथा ------  स्वाहा

रामू चाय की दुकान पर काम करता था  पढने का बहुत शोक था  दिन में काम करता  और रात के समय पढता था , पिता ने उसे काम करने के लिए कहा था ,वह कहते थे की पढने से पैसे नहीं मिलते ,पर झुग्गी छोपडी में एक स्कूल था जो मुफ्त शिक्षा देता था ,तो रामू की लगन से वहां उसे दाखिला मिल गया था ,सिर्फ परीक्षा के समय पैसे भरने होते थे फॉर्म के ,तो रामू के पिता ने उसे कह दिया
" ठीक है देखेंगे.......... "
हर महीने की पगार वह आजकर रामू के सेठ से ले जाते थे .आज कप धोते धोते रामू को याद आया कि कल स्कूल में कहा गया है कि  अगर आज रूपये नहीं भरे तो परीक्षा नहीं दे सकते  . उसने सेठ से कहा
 काका जल्दी से आता हूँ घर से .........वह घर की तरफ भागा ,और अपने पिता से बोला --
" बाबा फ़ीस भरनी है आज ,"
" पैसे नहीं है मेरे पास ............. पता नहीं  सा पहाड़ मिल जायेगा पढ़ कर .."कड़कती आवाज में जबाब आया ,फिर वह सड़क पर निकल गए .

रामू को कुछ समझ नहीं आया ,आँखों में आंसू आ गए , सोचा रात को अम्मा  से कहूँगा ,नहीं तो स्कूल वाले भगा देंगे स्कूल से ,
रात को जब  अम्मा घर आई वह  कुछ कह पाता उससे पहले पिता शराब की बोतल पीते  हुए लडखडाते ,गन्दी गलियां देते हुए घर में घुसे  , आज सन्नाटा सा छा गया झोपड़ी में .........आज खाने में लात घुसे ही मिले , निरीह  आँखे तक रही थी अँधेरे को , एक खामोश चीत्कार थी रामू के मन में .आशाएं , इक्छाएं  धू धू कर जल रही थी . शराब में सब कुछ स्वाहा  हो गया .

------- शशि पुरवार


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बाल शोषण ----- एक नजर


          बाल  शोषण यह एक ऐसी समस्या है जिसका निदान ही नहीं निकल रहा  ,अक्सर  इसके बारे में हम  समाचार पत्रों में पढ़ते रहते है  ,यह  शोषण  समाज में बुरी तरफ मकडजाल  के जैसा फैला  हुआ है , बाल  शोषण सिर्फ काम करवाने  से ही नहीं  होता अपितु शारीरिक , मानसिक शोषण भी जघन्य अपराध है एवं शोषण की  श्रेणी में  ही आता है  , इसे आप दबे रूप में कहीं न कहीं देख ही सकते है , गरीब माँ बाप तो इस महंगाई की मार से परेशान होकर अपने बच्चो को काम पर लगा देते है , निम्न वर्ग  को सरकार जो रूपये देती है वह भी उन बच्चो पर खर्च न होकर जेबों में ही जाता है  . निम्न वर्ग तो सभी बच्चो को भीख मांगने के लिए गलियों ,चौराहे  या मंदिर के बार खड़ा कर देते है ,नहीं तो सर्कस या करतब दिखाकर पैसे का कमाने का कार्य सौंप देते है . एक बार जब मुझे कार्य वश होलसेल बाजार में जाने का काम पड़ा , चौराहे पर चाट का एक  ठेला खड़ा था और थोड़ी दूर पर  5, 6 -8 -10 साल के 6-7 बच्चे बैठे थे ,करीब 22  साल  का  एक लड़का कुछ  दूरी पर बैठ  कर सब पर नजर रखे हुए था .  2 -2 बच्चे आगे एक गन्दी सी छोटी सी चादर पर बारी बारी आकर बैठते , एक बाजा बजाता तो दूसरा करतब दिखाता , जब 5-6 साल के बच्चो ने आँखों से सुई उठाई , बांस पर चले , शरीर को तोड़ मोड़ कर प्रस्तुत किया तो वहां ठेले पर खड़े कुछ लोगो ने  1 -1 रूपए डाल  दिए ,परन्तु किसी ने भी उन्हें यह कार्य करने से नहीं रोका , और धीरे धीरे वह पैसा बड़े लड़के की जेब में जा रहा था .इस अपराध के हिस्सेदार वह लोग भी है जो ऐसे खेल को देख आनंदित होते है ,और बढ़ावा देते है . जो इन बातों का विरोध करते है उन्हें स्वयं समाज का विरोध झेलना पड़ता है .
     , बच्चो का शोषण सिर्फ श्रम से ही नहीं होता अपितु स्कूल में  शिक्षक द्वारा , एवं घर में  परिचित या रिश्तेदार भी उनका शोषण कर लेते है ,जो बात सामान्यतः खुलकर बाहर नहीं आ पाती . बच्चो को चाकलेट या मिठाई के बहाने बुलाकर ,फुसलाकर उनका शोषण कर लिया जकता है और उन्हें जान से मरने की धमकी देकर डराया जाता है .....और  उन्हें इस बहाने लगातार शोषित किया जाता है , चाहे लड़का हो या लड़की सभी इसका शिकार होते है ,कई बार सुनने में आया कि फलां टीचर ने विद्यार्थी के साथ अनुचित व्यवहार किया है , कई शिक्षक  ऐसे होते है जो बालउम्र  को  ध्यान  में न रखकर सजा के रूप में उनकी  इतनी पीटाई करते है  ,जिससे कई बार बच्चो की हालत ख़राब हो जाती है  और उन्हें अस्पताल तक ले जाना पडा . कई बार देखने को मिला जैसा कि आरती के साथ हुआ , उसके घर में उसके दूर के मामा ने उसका शारीरिक शोषण किया और डरा कर चुप करा दिया , वह डर के कारण  कुछ नहीं कह पायी और  यह डर हमेशा ही  मुसीबत में डाल  देता है , बाल्यावस्था में आरती के साथ जो कुछ भी  हुआ ,उसका दुःख और  परेशानी की काली छाया उसके जीवन पर सदा के लिए अंकित हो गयी .इसके विपरीत साहसी  नीलम  की  दाद देनी पड़ेगी  ,वह कोचीन क्लास में पढने जाती थी 10 -11 में थी , वहां  पर प्रश्न कक्षा के बाद पूछे जाते थे ,एक दिन उसके टीचर ने उसके साथ अशोभनीय व्यवहार किया , पहले तो वह कुछ नहीं बोली ,पर यह सिलसिला अक्सर होने लगा तो उसने विरोध किया , जबाब में उस शिक्षक ने  उसे धमकी दी यदि ज्यादा आवाज करोगी तो तुम्हे बदनाम कर दूंगा ,पर नीलम की समझदारी उसे कोई कांड होने से पहले ही बचा कर ले गयी . उसने माता -पिता को यह बात बताई और पुलिस की मदद से बालबाल बच गयी .  तो  हर बच्चे को बचपन से ही यह शिक्षा देनी  चाहिए कि डरो मत अपितु अपनों का सहारा लो . अनजान पर विश्वास मत करो .
                      अपराध तो ख़त्म होते ही नहीं , इसका यह अंजाम किसी ने न सोचा होगा .  कुछ न्रहंस्कारी युवको ने शराब  के नशे में न जाने कितनी मासूम  कन्याओ को अपना शिकार बनाया , यह सबसे ज्यादा खेद जनक  है  कि इतने  जघन्य कार्य में  उन्होंने 3-- 6 महीने की  नवजात शिशु  को भी नहीं बक्क्षा , यह जघन्य कार्य सिर्फ  परिचित या जानकार  विकृत मनोदशा वाले लोग ही करते है ,आज नन्हे शिशु अपने घर में भी सुरक्षित नहीं है , कई लोग पुलिस की गिरफ्त में भी आये और सजा भी मिली , पर अपराध इतने है कि सभी की जानकरी नहीं हो पाती . लोग समाज के डर से यह बात ही छुपा लेते है .खासकर जब कन्या हो , कहीं उसकी शादी में ही अड़चन न हो जाये ...ऐसा विचार अपराधी के नीच कार्य को बढ़ावा दे जाता है . कितना नीचे गिर चूका है इंसान , अक्सर ऐसे केस न्यायालाओ में आती  रहती है , क्या अपराध होता है नवजात बच्चो और बच्चियों का जो यह सजा उन्हें मिलती है , कई बार सुनने में आया कि  छोटे बच्चो का शोषण कुछ शिक्षको ने किया है , जब गुरु ही इतना गलत कार्य करेगा तो क्या शिक्षा मिलेगी ......!  शोषण सिर्फ शारीरिक ही नहीं मानसिक भी होता है , एक स्कूल में एक शिक्षिका ने 1-2 बच्चो को बहुत मारा , नंबर भी काट लेने की बात कही ........क्रोध में बहुत ज्यादा होमेवोर्क दिया , सजा दी . एक बार  एक लड़की इस पीड़ा को न सह सकी और डर के कारण घर पर भी किसी को भी नहीं बता सकी , अंत में आत्महत्या कर ली और नोट छोड़ दिया .............. एक जिंदगी हमेशा के लिए मिट गयी . इस तरह के हालात पैदा ही क्यूँ किये जाते है , नन्हे हाथ ,नन्हे कदम जो दुनिया को ठीक तरह से नहीं देख पाते ,यदि ऐसे वक़्त में उनके साथ कोई हादसा हो जाये तो उनके जीवन पर इसका बुरा प्रभाव देखने को मिलता है , वह भी बदला लेने के लिए भविष्य में वही कार्य कर दोहरा देते है . ऐसी कई  घटनाए हमारे समाज में हो चुकी है . आजकल लोग घर में  काम के लिए छोटे बच्चो को  इसीलिए रखते है ,क्यूंकि वह परेशान नहीं करते और सारा काम  चन्द  पैसे और खाने के लालच में  कर देते है .
   बचपन एक फूल के सामन है जिसे प्यार भरे संरक्षण की जरूरत होती है , जब नीव अच्छी रखी  जाएगी तो पौधा बन कर वह अच्छे फल देगा . आज यह शोषण राष्ट्रिय समस्या का रूप ले चूका है जिससे सभी को साथ में मिलकर समाप्त करना होगा .  चंद पंक्तियाँ  कहना चाहूंगी अपने शब्दों में ---

बेटी हो या बेटा ,
बचपन एक समान
न मसलो नन्ही पौधों को 
अधरों पे दो मुस्कान
वर्ना खिलने से पहले
जीवन  मुरझा जायेगा
सीचों इन्हें प्यार से तो
बनेगा सुन्दर गुलिस्तां .

--शशि पुरवार

Wednesday, December 5, 2012

एक भूल और .............................!



1 लघुकथा ----

अनिरुद्ध अपनी पत्नी और दो बच्चो के साथ  हंसी ख़ुशी जीवन  कर रहा था , वह सॉफ्टवेर   मेनेजर था , और अक्सर काम के सिलसिले में बाहर जाता था . इस बार जब वह वापिस आया तो पत्नी नेहा  की तबियत ठीक नहीं दिखी रही थी ,बुखार था व  थोड़ी कमजोरी  दिख रही थी . अनिरुद्ध चिंतित हो गया और उसने  नेहा से पूछा --

"नेहा क्या हुआ , डाक्टर को दिखाया ...?"
" कुछ नहीं , ठीक हूँ , बुखार के कारण  कमजोरी आ गयी है , आजकल वायरल भी तो फैला है "
" हाँ यह तो है  , परन्तु अपना ध्यान रखो ....... "
परन्तु बुखार कभी कम होता तो कभी बढ़ जाता . इधर  आजकल कुछ दिनों से बेटे की तबियत भी बिगड़ने लगी थी , चेहरे और शरीर पर दाने निकलने लगे और बुखार भी बार बार आ रहा था , उधर  निशा का स्वास्थ धीरे -धीरे बिगड़ता जा रहा था , और वह दिन पर दिन कमजोर होती जा रही थी , एक दिन तो वह काम करते करते  गिर गयी ,अनिरुद्ध दोनों को  अस्पताल   लेकर गया तो वहां नेहा एवं बेटे  को एडमिट कर लिया गया ,  सभी प्रकार की जांच शुरू हो गयी .  शाम को डाक्टर ने अनिरुद्ध से कहा कि --

" आप धीरज रखें , और अपनी पत्नी को भी हिम्मत दें , और एक बार आप अपनी और बेटी  के  भी खून की भी जाँच करा लें "
" क्यूँ डाक्टर  ......... क्या हुआ है मेरी नेहा को , और हम सभी भी .........?"
" मै एतिहात के तौर पर सभी की एच . आई , वी टेस्ट करवा रहा हूँ , आपकी पत्नी और बेटे की रिपोर्ट  पॉजिटिव रिपोर्ट आई है और आखिरी स्टेज पर पहुच चुकी है "
" यह सुनते ही अनिरुद्ध जड़  हो गया , उसके मन मस्तिष्क ने जैसे काम करना ही बंद कर दिया हो ..."

        परिवार के सभी सदस्य की जांच हुई तो पता चला कि सभी इस बीमारी से ग्रसित  है , वह ग्लानी से भर गया , उसके रंगीन मिजाज स्वाभाव और असंयम के कारण  आज पूरा परिवार काल के द्वार पर खड़ा था और सभी की निगाहे उससे खामोश  सवाल कर रही थी ...जिससे वह नजर भी नहीं उठा पा रहा था .
-----शशि पुरवार .

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2 लघुकथा ---

सुलोचना स्वयं को बुद्धिमान समझती थी और हमेशा पैसे बचाने  के चक्कर में रहती थी , एक बार उसकी तबीयत  जरा नासाज थी , तो पास में ही डाक्टर को दिखाने  चली गयी .वहां डाक्टर ने उसे दवा  और इंजेक्शन  लेने के लिख कर दिया  , वह कम्पाउंडर  के पास गयी तो देखा वहां बहुत से लोग लाइन में बैठे है और वह सभी को एक एक करके  सुई लगा रहा था , हर सुई को वह वहां के रखें बर्तन में जिसमे गर्म पानी था उसमे  डाल देता और दूसरी को निकालकर उससे इंजेक्शन लगाता .सुलोचना ने सोचा गर्म पानी में तो सभी कीटाणु  मर जाते है तो नयी डिस्पोजेबल सुई में क्यूँ फालतू में पैसे खर्च करना ,
जब  सुलोचना की बारी आई तो कम्पाउंडर ने कहा --
" आपका परचा .........?"
" हाँ यह लीजिये .....आप लगा दीजिये , यह इंजेक्शन है "
" ठीक है ......"
फिर  वह  गर्वित भाव से घर आ गयी ....
".कुछ नहीं होता है , आजकल मेडिकल वालों ने भी सामान बेचने के लिए धंधा बना लिया है ......क्या पहले नहीं लगती थी सभी यह सुई ....... सोचते सोचते घर आ गया "

बिमारी तो ठीक हो गयी , परन्तु जो हुआ उसकी कल्पना किसी को नहीं थी . 2-3 महीने बाद जब सुलोचना थकी थकी सी रहने लगी तो घर वालो को चिंता हुई , उसे डाक्टर के पास ले गए , सारी  जांच हुई तो पता चला की एच . आई .वी . के कीटाणु खून में पाए गए , यह जानकर सभी सदमे में आ गए की यह कैसे हो गया . सुलोचना विचलित हो गयी . डाक्टर ने कहा --
" आप चिंता मत करो शुरुआत है , आपका इलाज हो सकता है "
" पर डाक्टर यह कैसे हो गया ....हम कितनी सावधानी बरतते है , ....."
" यह संक्रमण का रोग है ,  यह किसी से भी हो सकती है ,  इस बीमारी से पीड़ित व्यक्ति  के संपर्क में आने पर , या संक्रमित व्यक्ति का खून यदि दिये जाने पर या संक्रमित व्यक्ति को लगाईं  हुई सुई का उपयोग करने पर भी यह बीमारी  हो जाती है ....अनेक ऐसी सावधानियां हमें बरतनी चाहिए ...    आप ध्यान कीजिये ऐसा कुछ आपके साथ घटित हुआ है क्या ........? "

डाक्टर की बातें सुनकर सुलोचना शांत हो गयी और स्वयं की गलती का अहसास उसे हो गया , थोड़ी सी बचत करने के चक्कर में उसने अपनी ही जान का खतरा मोल ले लिए , शर्म आ गयी स्वयं के शिक्षित होने पर ...........  बुरा वक़्त कभी भी  कह कर नहीं आता , स्वयं सावधानी लेना आवश्यक है .

-----शशि पुरवार 

Thursday, November 29, 2012

अब कर दो विदा




अब कर दो विदा

जकड़ी मान्यताएं

थोथले है विचार
परंपरा के नाम पे
आदमी लाचार
बेगारी का फंदा ,
बना जी का जंजाल,
ऐसे फरमानों को
अब कर दो विदा .

इर्ष्या के कीड़े से
कलुषित हुआ मन
बदले की आग में
सुलगता है तन
साखर में पगा है
धूर्त का संसार
ऐसे मेहमानों को
अब कर दो विदा

सोया हो जमीर ,तो
कैसे उच्च विचार
चील,कौए सा युद्ध
छिछोरा आचार
शैवाल सा बढ़ता
काला व्यापार
ऐसे धनवानों को
अब कर दो विदा

---------शशि पुरवार

Sunday, November 25, 2012

**** नेह की पाती ******



   नेह की पाती 
मै बिटिया को लिखूं
  दिल का हाल 
ममता औ आशीष
 पैगाम लिखूं
सर्वथा  खुश रहे
प्यारी दुलारी
मेरी राजकुमारी
फूलो सी खिले
जीवन भी महके
राहों  में मिले 
मखमली डगर
नर्म बिछोना
बाबुल का अंगना
ख्वाबो की तुम 
उड़ान भी भरना
 दिली तमन्ना  
सुखमय जीवन
सदैव ,पर
दुर्गम यह पथ 
फूल औ शूल
यथार्थ का सफ़र 
पल में धोखा
अपनों से भी रंज 
तूफानों में भी
अडिग हो कदम
जटिल वक़्त  
में फौलादी जिगर 
नारी की जंग
खुद को संभालना 
है  कटु  सत्य
बेदर्द ये  जमाना
परवरिश  
पाषण ह्रदय से
यही  चाहत 
महफूज सफ़र  
नहीं भरोसा
कब तक जीवन
हमारे बाद
सुख भरा संसार 
माता पिता की दुआ .
----------शशि पुरवार 


Tuesday, November 13, 2012

दीप से दीप जलाएं ---------रंगबिरंगी दीपावली ------

गीत ---
1
दीपों की लडिया सजाएँ 
लौ से लौ जलाएं 
आओ खुशियाँ फैलाएं 

द्वार पे रंगोली डले 
असंख दिवली खिले
सुप्त मन , तम में 
दिया औ बाती जले  ,
अंतर्घट की  ज्योत जलाएं
आओ खुशियाँ फैलाएं 

कुटिलता से भरे
शामनी  से  परे 
बांकपन की आग में
तन को स्वाहा  करे ,
दुर्गुणों को  जड़ से मिटाएँ
आओ खुशियाँ फैलाएं

सद्गुणों का चाँद हो
शीतलता  व्याप्त हो 
यतीम ,बेघर ,हिंसा की 
न ऐसी  काली रात हो ,
गली गली चौबारे पे
सज्ञान के दीपक  जलाएं                                                
आओ खुशियाँ फैलाएं .

        ------ शशि पुरवार



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2

गौधुली बेला में
दमकता  दिया
स्नेहिल आबंध 
हर्षित हिया

सोने का कंगन 
चांदी की बिछिया
हीरे जैसे पिया
धडके जिया

विश्वास की बाती 
प्रेम का दिवा 
समर्पण भाव
अर्पण  किया

खील - बताशे
मिठाई, पटाखे
गणेश लक्ष्मी का 
वंदन  किया

घर ,मन दिवाली
पग पग उजेरा
अमावश को भी
रौशन किया .
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3 ---

हाइकू 
रंगों से भरा
सलोना बचपन
फूलपाखरू

रंगबिरंगे
प्रकृति के  नज़ारे
अन्धता मारे .

दीप भी सजे
मोरपंखी रंगों से
लौ इठलाये .

गोधुली बेला
गणेश लक्ष्मी विराजे
शुभ औ लाभ

दिया औ बाती
अटूट है बंधन
तम  का साथी

रंगबिरंगे
बंदनबार सजे
युगसंधि में .

दीपो का पर्व
रौशनी का उत्सव
रैना दमके .

तम गहन
पटाखों की बहार
दीपो उल्लास .

दीपो की लड़ी
मनमोहिनी सखी
बाती  भी जली

पिया का प्यार
दिवाली की मिठास
कुछ  तो  खास .

----शशि  पुरवार
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1 पहना है अब गहना
हार बिंदी कंगना
दीप सजें  है अंगना 

2 खूब हुई मनुहार 
सजन गए ससुराल                      
दिवाली घर द्वार

3 दिवाली का त्यौहार
पिया से तकरार
मिला हीरो का हार .

4 दीपो की है  बहार 
  खास पिय का प्यार 
 सजाओ बंदनबार 

5 सांझ दीप है जलें
 दिल  वाट पाहे 
अब खुशियाँ आन मिले .
--शशि पुरवार 

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चोका -----

रिश्तों में खास
विश्वास की मिठास
प्रेम की बाती 
रौशनी की बहार
बाटें खुशियाँ
हर दिन त्यौहार
हीरे से ज्यादा
अनमोल है प्यार
 है जमा  पूँजी                     
रिश्तों की सौगात
सजन संग  
बसाया है संसार
नए बंधन
स्नेहिल उपहार
दिलों की प्रीत
अमूल्य पतवार
मन ,उमंग
शीतलता व्याप्त
पल  पल हो
घर मने  दिवाली
हर दिन त्यौहार .
-----------शशि पुरवार 
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दीपक कहे बाती से , दूर हो अंधियारा
सज्ञान की जलती ज्योत , फैलाए उजियारा .............................

सभी मित्रो को सपरिवार दीपावली की हार्दिक शुभकामनाये , दीपावली  का यह पर्व आप सभी के जीवन में खुशियाँ लेकर आये -----आपका जीवन सदैव खुशियों से परिपूर्ण हो ,-------शशि पुरवार 

Wednesday, October 31, 2012

व्यंजना को लफ्जों से सजाऊं



तुम उदधि मै  सिंधुसुता सी
गहराई में समां जाऊं

तुम साहिल में तरंगिणी सी 
बहती धारा बन  जाऊं 

तुम अम्बर मै धरती बन
युगसंधि में खो जाऊं

तुम शशिधर  मै गंगा सी 
बस शिरोधार्य  हो  जाऊं

तुम आतप  मै छाँह  सी
प्रतिछाया ही  बन जाऊं

तुम दीपक  मै बाती  बन
नूर दे आपही जल जाऊं

तुम रूह हो मेरे जिस्म की
तुम्हारी अंगरक्षी बन जाऊं  

न होगा  तम जीवन में कभी 
चांदनी बनके खिल जाऊं

तुम धड़कन हो मेरे दिल की
स्मृति बन साँसों में बस जाऊं

मौत भी न  छू सकेगी मेरे माही
हर्षित मै  रूखसत  हो जाऊं

न कोई गीत ,न बहर, न  गजल
व्यंजना  को लफ्जों  से सजाऊं 

      -----शशि पुरवार

Monday, October 22, 2012

माँ का आशीष शुभ दुलार





सब बच्चों को माँ से प्यार
माँ का आशीष
शुभ दुलार

आदिशक्ति मातृभवानी
जगतजननी कृपनिधानी
शक्तिस्वरूपा सिंहवाहिनी
महिषासुर का किया संहार
देवों का बेड़ा पार
माँ का आशीष
शुभ दुलार

कोमलांगी कमलवासिनी
विश्वव्यापी विश्वमोहिनी
शुभमंगल वरदायिनी
तेरे गुण गाए संसार
भक्तों का बेड़ा पार
माँ का आशीष
शुभ दुलार

काली, दुर्गा औ सरस्वती
अनेक रूपों में भगवती
नवरात्रि का त्यौहार
माँ का सोलह शृंगार
मन मंदिर में
बजी झंकार

-शशि पुरवार

Thursday, October 18, 2012

लघुकथा --पतन , माँ का एक यह रूप भी .........

       लघुकथा --   पतन

      भोपाल जाने के लिए बस जल्दी पकड़ी और  आगे की सीट पर सामान रखा था कि  किसी के जोर जोर से  रोने की आवाज आई, मैंने देखा  एक भद्र महिला छाती पीट -पीट  कर जोर जोर से रो रही थी .

" मेरा बच्चा मर गया ...हाय क्या करू........ कफ़न के लिए भी पैसे नहीं है ..
मदद करो बाबूजी , कोई तो मेरी मदद करो , मेरा बच्चा ऐसे ही पड़ा है घर पर ......हाय मै  क्या करूं  ."
                   उसका करूण  रूदन सभी के  दिल को बैचेन कर रहा था , सभी यात्रियों  ने पैसे  जमा करके उसे दिए ,
 " बाई जो हो गया उसे नहीं बदल सकते ,धीरज रखो "
 "हाँ बाबू जी , भगवान आप सबका भला करे , आपने एक दुखियारी की मदद की ".....

ऐसा कहकर वह वहां से चली गयी , मुझसे रहा नहीं गया , मैंने सोचा  पूरे  पैसे देकर मदद कर  देती हूँ , ऐसे समय तो किसी के काम आना ही चाहिए .
  जल्दी से पर्स  लिया और  उस दिशा में भागी जहाँ वह महिला गयी थी . , पर जैसे ही बस के पीछे की दीवाल  के पास  पहुची  तो कदम वही रूक गए .
                     द्रश्य ऐसा था कि  एक मैली चादर पर एक 6-7 साल का बालक बैठा था और कुछ खा रहा था . उस  भद्र महिला ने पहले अपने आंसू पोछे ,  बच्चे को  प्यारी सी मुस्कान के साथ , बलैयां ली  , फिर सारे पैसे गिने और  अपनी पोटली को  कमर में खोसा  फिर  बच्चे से बोली -
  "अभी आती हूँ यहीं बैठना , कहीं नहीं जाना  "
और पुनः उसी  रूदन के साथ दूसरी बस में चढ़ गयी .
        मै अवाक सी देखती रह गयी व  थकित कदमो से पुनः अपनी सीट पर आकर  बैठ गयी . यह नजारा नजरो के सामने से गया ही नहीं  ,लोग  कैसे - कैसे हथकंडे अपनाते है भीख मांगने के लिए , कि  बच्चे की इतनी बड़ी  झूठी कसम भी खा लेते है , आजकल लोगो की मानसिकता में कितना पतन आ गया है .

          --------शशि पुरवार       
    

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मित्रो आप सभी को नवरात्री की हार्दिक शुभकामनाये ...............स्वास्थ परेशानी के चलते ज्यादा समय नहीं दे पा रही हूँ ....पर जितना भी हो सकेगा आपके ब्लॉग पर पढने आती रहूंगी , तब तक के लिए क्षमाप्राथी हूँ , यह सत्य घटना आपके समक्ष .............लघुकथा के रूप में ..... अपना अमूल्य स्नेह बनाये रखें .-शशि 

Friday, October 12, 2012

सिंदूरी आभा


1सिंदूरी आभा
सुनहरा  गहना
साँझ है सजी .

2 अम्बर संग
अवनि का मिलन
संध्या बेला में

3 सुनहरा है
प्रकृति का बंधन
स्वर्णिम पल

4 उषाकाल में
केसरिया चुनर
हिम पिघले . 

5 शूल जो मिले 
 हम तो नहीं हारे
  छु के गगन .


6 छु लिया जहाँ
मिला श्रम का मोल
सुहानी भोर 


7 सुनहरा है
आने वाला सबेरा
नया जीवन

8 पाया है जहाँ 
सुनहरा आसमां
कर्मो से सजा .


9 हरीतिमा की 
भीनी चदरिया 
 सावन भादो 

10 नयना प्यासे 
प्रभु दरसन के 
सुनो अरज 

11 पाखी है मन 
चंचल चितवन 
 नैना सलोने .

 
-शशि पुरवार 


Saturday, October 6, 2012

मेरे सपनो का ताजमहल


मेरे ख्वाबो का
सुन्दर आशियाना
प्यार की रेशमी डोर
विश्वास का खजाना
सतरंगी सपनो से
आने वाले कल की
झालर बनाना
बचपन के पलों को
सहेज पिटारे में रख
पंछी बन उड़ जाना ,
आकांशाओ के वृक्ष पे
आशा का दीपक रखना
पूर्ण ,अपूर्ण अनुभूतियों की
एक ख्वाबगाह बनाना
दीवारों पे अपने नाम का
दुधियाँ रंग सार्थक कर
शशि की शीतलता
को जग में फैलाना
अमावस की काली रात में
कलम से उकेरे शब्दों की
शीतल किरणों सा प्रकाश
दीप प्रज्वलित करना
जीवन की राहो में
पी का साथ निभाना
कांटो को चुन ,उसकी
राहो में फूल बिछाना ,
नहीं कोई चाहत दिल में
बस मेरे जाने के बाद तुम
मेरे सपनो का ताजमहल
मत बनाना , खुश रहना
मुझे मेरी कलम में ही ढूंढ लेना
मै अविरल सी बहती हूँ मेरे
ख्वाबो के ताजमहल में
जब जी चाहे मेरे
सपनो की घाटियों में
एक फूल ले चले आना
सदा अमर रहूंगी
शब्दों के माध्यम से
जब जी चाहे चाहे
आकर मिल जाना .
--शशि पुरवार

Thursday, October 4, 2012

माँ का अंगना प्यारा रे


माँ का अंगना प्यारा रे........
प्यारा सलोना

दुनियां में रखा जब पहला कदम
माँ के आँचल में
खिला बचपन
सपनो को लगे
सुनहरे पंख ........!,
गुरु बनके ज्ञान दे दिया रे
हुआ सफल जीवन,

माँ का आशीष प्यारा रे
प्यारा सलोना

जीवन की राहो में बढ़ते कदम
मुश्किल घडी में
डरता यह मन
कैसे लड़ेंगे
तुफानो से हम .........,
तपते मन को सहला दिया रे
बनके शीतल पवन ,

माँ का साथ लागे प्यारा रे
प्यारा सलोना

स्नेह वात्सल्य से भरा बंधन
शादी कर माँ ने
निभाया धरम
आँखों में मोती
छुपा के किया भ्रम ......... ,
कालजे पे पत्थर रख लिया रे
बेटी बने सुहागन

माँ का प्यार बड़ा न्यारा रे
प्यारा सलोना

पल पल माँ को ढूंढें नयन
माँ की छाया
कैसे बने हम
दिल में महकती
माँ की छुअन......... ,
पीहर की तड़प बढ़ा गयी रे
चली यादों की पवन

माँ का अंगना प्यारा रे
प्यारा सलोना .
3.10.12
--------- शशि पुरवार

Wednesday, September 26, 2012

कैसा संहार .?

-
निति नियमो को
ताक  पे रखकर 
संरक्षक बना भक्षक
ये कैसी हार 

नोच लिए रूह के तार
भेड़िया बन खिंची खाल
थमा के मीठी गोली
खेली है  खुनी होली
टूट गयी विश्वास की डोर
बिखरा है लहु चारो ओर 
अपने जिय के टुकडो का 
 ये कैसा संहार

टूट रही लज्जा की गागर 
फट रहा जिय का सागर
कैसे छुपाये नाजुक काया
पीछे पड़ा  है एक  साया
बीच बाजार बिकती साख
भेद रही गिद्ध  की आंख
खतरा फैला है  चहुँ और 
सफेदपोश है निशाचर 
ये कैसा आधार  

निति नियमो  को
ताक पे रखकर हुआ 
ये  कैसा व्यवहार.
---शशि पुरवार  


Sunday, September 23, 2012

आँखों का धोखा

 
हाइकु
1 तरसे नैना
परदेश सजन
कैसे पुकारू
 
2 नैना प्यासे
प्रभु दरसन के
सुनो अरज .

3 आँखों की हया
लज्जा की चुनर
नारी गहना

4 मोह औ माया
अहंकार का पर्दा
आँखों का धोखा .

5 पाखी है मन
चंचल चितवन
नैना सलोने . 
 
6
अधूरी प्यास
अजन्मी ख्वाहिशे
वक़्त है कम .

7
रीता ये मन
कोख का सूनापन
अतृप्त आत्मा .

8
अधूरापन
ज्ञान के खिले फूल
खिला पलाश .

9
अतृप्त मन
भटकता जीवन
ढूंढें किनारा .
 
10
नन्हे कदम
मोहिनी म्रदुहास्य 
खिला अंगना .
11
अश्क आँखों के
सूख गए है जैसे
रीता झरना .
12
पीर तन की
अब सही न जाती 
 वृद्धा जीवन
13
आँखों में देखा
छलकता पैमाना
अहंकार का .
14
अंतरगित
सन्नाटे में बिखरी
तेज चीत्कार .
15
सुख के सब
होते है संगी- साथी
स्वार्थी जहान .
----शशि पुरवार
 

Tuesday, September 18, 2012

जाने कहाँ आ गए हम



जाने कहाँ आ गए हम
छोड़ी धरती
चूमा गगन .

आकांशाओ  के  वृक्ष  पर  
बारूदो का  ढेर बनाया
तोड़े पहाड़ , कटाये   वन 
दूषित कर पवन ,रोग लगाया
सूखी हरीतिमा की  छाँव
सिमटे  खेत , गाँव
बना  मशीनी इंसान
पत्थर की मूरत भगवान .

जग का बदला स्वरुप
नए उपकरण ,
मशीनी इंसान ,
रोबोट सीखे काम ,
नए नए  आविष्कार
खूब फला कृत्रिम व्यापार 
मशीनी  होते काम
मानव  चाहे पूर्ण  आराम
माथे की मिट जाये  शिकन .

भर बारूद , रोकेट
संग, उड़  चला अंतरिक
विधु  पे पड़े कदम 
मिला नया मुकाम ,
पर धुएं में मिले जहर से 
कम होती ओजोन की  छाँव
सौर मंडल पर भी
प्रदुषण के बढ़ते कदम
यह हार है या जीत
जब खतरा बन रही
जीवन पर , अविष्कारों 
की बढती भीड़
न बच सकी धरणी 
न छूटा  गगन .
-------------शशि पुरवार

Saturday, September 15, 2012

मेहंदी लगे हाथ......!



मेहंदी लगे हाथ ,करते
पिया का इंतजार
सात फेरो संग मिला
उम्र भर का साथ
मिले दो अजनबी

जैसे नदी के दो किनारो
का हुआ संगम
बदल गयी दिशाए
जीवन की हवाए
बहती एक जलधारा .

नाजुक होते ये रिश्ते
कांच से कच्चे धागे
विश्वास की डोर बांधे
दिलो की प्रीत ,पर
कठिन पल
दुर्गम डगर पे
मजबूत हो साथ
एक गाड़ी के हम दो पहिये
चटका न दे कोई कंकर

उलफत कभी न होगी कम
बस इक खलिस
ह्रदय में सनम
अंतिम ख्वाहिश मान के
जिगर में न रखना रंज
पहले रुकसत होंगे
जहान से हम
सुहागन रूप में ही
निकले दम
ना रहे खाली हाथ
करतल पे लगा देना मेहंदी
यह जन्म न मिलेगा बार बार .
----------- शशि पुरवार

Wednesday, September 12, 2012

जग की जननी है नारी ........!

 
जग की जननी है नारी
विषम परिवेश में नहीं हारी 

काली का  धरा रूप , जब
संतान पे पड़ी विपदा भारी
सह लेती काटों का दर्द
पर हरा देता एक मर्द

क्यूँ रूह तक कांप जाती
अन्याय के खिलाफ
आवाज नहीं उठाती
ममता की ऐसी मूरत
पी कर दर्द हंसती सूरत 
छलनी हो रहे आत्मा के तार
चित्कारता ह्रदय करे पुकार
आज नारी के अस्तित्व का सवाल
परिवर्तन के नाम उठा बबाल 
वक़्त की है पुकार
नारी को भी मिले उसके अधिकार
कर्मण्यता , सहिष्णु , उदारचेता
है उसकी पहचान
स्वत्व से मिला  सम्मान .

जग की जननी है नारी 
विषम परिवेश  में नहीं हारी .
---------------- शशि पुरवार

Thursday, September 6, 2012

मेरे मन का अभिमन्यु ,


जीवन चक्र
कठिन है राहो की डगर
खिले जो फूल
शूल का भी सहना होगा दर्द
सुख का छोटा सा पल

बीत रहा है यूँ ,
वक़्त का पहिया
तेजी से घूमता हरपल .

दुःख से रीत जाते
सारे एहसास
निकल जाता है वक़्त
बिखरते है ख्वाब ,पर
कर्म की वेदी पर
नहीं हारता
मेरे मन का अभिमन्यु ,

आशा का छोटा सा दिया
जगमगाता है काली रात में
तम में भी रहता
रौशनी का बसेरा ,
वक़्त का होता पग -फेरा
हर रात के बाद है सबेरा
लिखना है नया इतिहास
रौशन हो कलम से
लिखे एहसास
एक नयी शुरुआत
सुनहरी किरणों का प्रकाश
नए शुन्य की तलाश
एक नया आकाश .

-----शशि पुरवार

Monday, September 3, 2012

जीवन के रंग ...!





यह जीवन
है गहरा गागर
सुख औ दुःख
गाड़ी के दो पहिये
धूप औ छाँव
सुख के दिन चार
आँख के आँसू
छलते हरबार
जो पाँव तले 
खिसकती धरती
अधूरी प्यास
पहाड़ -सा ह्रदय
शोक -विषाद
अत्यंत मंथर हैं
बोझिल पल 
वक़्त की रेतघडी
धीमा है पल
संकल्पों का संघर्ष
फौलादी जंग
आगमन -प्रस्थान
अभिन्न अंग
मुट्ठी से फिसलते
सुखद पल
वक़्त का पग -फेरा
बहता जल 
पतझर -सा झरे
दुर्गम पथ
बदलता मौसम
भोर के  पल
सुनहरी किरण
परिवर्तन
मोहजाल से मुक्त
वर्तमान के
खुशहाल लम्हों का
करो  स्वागत
छिटकी है मुस्कान
जीवन में उदित
नया है रास्ता
खुशियों की तलाश
सुनहरी सौगात .

-------------------

हाइकु ---
1 चांदनी रात
 नयना बहे नीर
  दुःख की पीर .

2 रिश्तो में मिला
पल पल छलावा
  मन का  दर्द .
3 वक़्त के साथ
भर जाते  है जख्म
 रिसते  घाव .
4 सुख खातिर
करे सारे जतन
कठिन तप
5 पतझर से
झरते है नयन
प्रेम अगन
6
रिश्तो की लड़ी
बिताये हुए पल
है जमा पूंजी .
7
अश्क आँखों के
सुख गए है अब
रीता झरना
8 पीर तन की
अब सही न जाती
वृद्धा आश्रम
9 आँखों में देखा
छलकता पैमाना
सुखसागर
10  खामोश रात्र
सन्नाटे में बिखरी
तेज चीत्कार
11 सुख के सब
होते है संगी साथी
स्वार्थी जहान .
12 तीखे संवाद
दबी है सिसकार
मन की हूक .
13
नन्हे कदम
मोहिनी म्रदु हास्य
खिला अंगना .
15 यह जीवन
आत्मा होती अमर
चंचल मन .
16 तेरे आने की
हवा भी दे सूचना
धडके दिल .
17
सूना अंगना
महका गुलशन
खिले जो फूल  .
18 खिली मुस्कान
 मासूम बचपन
  मन मोहन .
 ----शशि पुरवार 



Saturday, September 1, 2012

कुण्डलियाँ

1
  चक्षु ज्ञान के खोलिए,जीवन है अनमोल.
  शब्द बहुत ही कीमती,सोच-समझ कर बोल.
  सोच-समझ कर बोल,बिगड़ जाते हैं नाते.
  रहे सफलता दूर, मित्र भी पास न आते.
   मिटे सकल अज्ञान, ग्रन्थ की बात मान के.
  फैलेगा आलोक,खोल मन चक्षु ज्ञान के.

 2
 संगति का होता असर,वैसा होता नाम.
 सही रहगुजर यदि मिले,पूरे होते काम.
  पूरे होते काम ,कभी अभिमान न करना.
  जीवन कर्म प्रधान,कर्म से कैसा डरना.
 मिले यदि सही साथ,मार्जन होता मति का.
  जीवन बने महान,असर ऐसा संगति का.
3
 समय -शिला पर बैठकर, शहर बनाते चित्र.
सूख गयी जल की नहर, जंगल सिकुड़े ,मित्र.
जंगल सिकुड़े,मित्र,सिमटकर गाँव खड़े हैं .
मिले गलत परिणाम,मानवी-कदम पड़े हैं
बढती जाती भूख,और बढ़ता जाता डर.
लिखें शहर इतिहास,बैठकर समय-शिला पर.
  नेकी अपनी छोड़ कर , बदल गया इंसान 
  मक्कारी का राज है , डोल गया ईमान 
  डोल  गया ईमान  , देखकर रूपया पैसा 
  रहा आत्मा बेच , आदमी यह कैसा 
  दो पैसे के  हेतु  , अस्मिता उसने फेकी 
   चोराहे पर नग्न  , आदमी भूला नेकी
          ----------शशि पुरवार
 
 

Wednesday, August 29, 2012

परिवर्तन --


परिवर्तन --

वक़्त के साथ
अंकित मानस पटल पे
जमा अवशेषों का
एक नया परिवर्तन .

झिरी  से आती
ठंडी हवा का झोखा
प्रीतकर लागे
पर अनंत बेड़ियों में जकड़ी 
आजाद  होने को बेकरार
घुटती साँसे
फडफडाते घायल पंछी सी
मांगे सुनहरी किरणों का
एक  नया रौशनदान
बड़ा परिवर्तन .

आजादी ने बदला
बाहरी आवरण ,पर
सोने के पिंजरें में
कैद है रूढ़िवादियाँ ,
जैसे एक कुंए का मेंढक ,
न जाने समुन्दर की गहराई
उथले पानी का जीवन
बस सिर्फ सडन
चाहे खुला आसमाँ
इक  परिवर्तन .

खंडहर होते  महल
लगे कई पैबंद
विशाल दरवाजो में सीलन
जंग लगे ताले के भीतर
खोखला  तन
पोपली बातें
थोथले विचार
जर्जर मन का
फलता फूलता
विशाल राज पाट
वक़्त की है पुकार
हो नवीनीकरण
बड़ा गहरा परिवर्तन .

आजाद गगन में
उड़ते पंछी
भागते पल
एक नया जहाँ
नई पीढ़ी थामें हाथ
पुरानी पीढ़ी का कदमताल
कर रहा पीढ़ियों का अंतर कम
सभ्यता , संस्कृति
आधुनिकता का अनूठा संगम
संग  ऊंची उडान
खिलखिलाते ,सुनहरे
पलों का अभिवादन
दिनरात का
सकारात्मक परिवर्तन ......!

वक़्त की पुकार ....!
           --------शशि पुरवार

Monday, August 27, 2012

दर्द जब बढ़ जाये ........!


दर्द  जब बढ़ जाये
एक नशा बन कर
तन को पीता जाये
इस बेदर्द दुनिया से
दर्द कभी न बांटा जाये.

सुख के सभी होते है साथी
दुःख में कभी काम न आये
हमेशा नेकी ही डूबे दरियां में
हाँथो में सिर्फ पत्थर नजर आये .

कांच के शीशमहल में


सुन्दर ऊँची दीवारों में
दिखती है सिर्फ चमक
लाश तो किसी को भी
 नजर ही न आये  .

यह वक़्त भी बड़ा बेदर्द  
अच्छाई को सदा छुपा जाये
कर्म किसी को भी न दिखे 
जनाजा निकल जाने के बाद ही
हवा  के रूख में थोड़ी नमी आये .


घूमते है महल में लाश बनकर
शरीर दफनाने पे अब तो
हँसी भी न आये .



बेदर्द दुनिया में ,
नजर आते है सिर्फ  बंकर 
प्यारा सा सीधा साधा दिल
कभी भी किसी को
नजर न आये .
-------- शशि पुरवार

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